हाइब्रिड और ईवी कारें होंगी सस्ती, पेट्रोल-डीजल वाले वाहन मिलेंगे महंगे!
समझें क्या है पूरा मामला...
- केंद्र सरकार ने कारों के लिए नई फ्यूल इकोनॉमी पॉलिसी का मसौदा जारी किया है।
- यह नई नीति 1 अप्रैल 2027 से देश भर में लागू होगी।
- हाइब्रिड, ईवी और एथेनॉल कारें अब सस्ती हो सकती हैं।
- ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली पेट्रोल-डीजल कारें महंगी हो सकती हैं।
- सरकार का लक्ष्य ईंधन बचाना और प्रदूषण घटाना है।
केंद्र सरकार ने यात्री वाहनों के लिए नए कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी यानी CAFE (Corporate Average Fuel Economy) मानकों का मसौदा जारी किया है। ये नए नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे।
इस पॉलिसी का मकसद कारों की ईंधन दक्षता यानी माइलेज बढ़ाना है। साथ ही पर्यावरण को प्रदूषण से बचाना भी बड़ा लक्ष्य है। इससे एथेनॉल, हाइब्रिड और ईवी यानी Electric Vehicle कारें सस्ती हो सकती हैं। वहीं ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली पेट्रोल-डीजल कारें महंगी हो सकती हैं।
कैसे सस्ती होंगी कारें
नई पॉलिसी में सरकार कंपनियों को खास फायदा देगी। ईवी और हाइब्रिड कारें बेचने पर कंपनियों को सुपर क्रेडिट मिलेगा। अगर कोई कंपनी एक इलेक्ट्रिक कार बेचती है, तो कागजों पर उसे तीन कारों के बराबर गिना जाएगा।
एक हाइब्रिड कार को 1.6 कार के बराबर माना जाएगा। इससे कंपनियों के लिए प्रदूषण घटाने का लक्ष्य पूरा करना आसान होगा। कंपनियां इसी वजह से इन कारों को कम कीमत या बेहतर ऑफर्स के साथ बेच सकती हैं। इससे ग्राहकों को सीधा फायदा मिलेगा। बाजार में हाइब्रिड और ईवी कारों की मांग भी बढ़ सकती है।
क्यों महंगी होंगी कारें
कम माइलेज वाली यानी ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली कारें कंपनियों के लिए मुश्किल बनेंगी। अगर किसी कंपनी की कारों का औसत प्रदूषण तय सीमा से ज्यादा निकला, तो उसे घाटा होगा। इस घाटे को पूरा करने के लिए कंपनी को क्रेडिट खरीदना होगा। यह क्रेडिट दूसरी कंपनियों से या सरकार से खरीदा जा सकेगा।
इसकी कीमत दो हजार 500 रुपए से चार हजार 500 रुपए प्रति ग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड यानी CO2 (Carbon Dioxide) तक हो सकती है। कंपनियां यह भारी जुर्माना अपनी जेब से नहीं भरेंगी। वे इसका बोझ ज्यादा प्रदूषण वाली कारों की कीमत बढ़ाकर ग्राहकों पर डालेंगी। यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल की कुछ कारें महंगी हो सकती हैं।
एथेनॉल कारों को फायदा
फ्लेक्स फ्यूल कारें भी इस पॉलिसी में फायदे में रहेंगी। ये वो कारें हैं जो 85 से 100 फीसदी एथेनॉल पर चल सकती हैं। इन्हें 22.3 फीसदी की छूट मिलेगी। अगर कंपनी एक फ्लेक्स फ्यूल कार बेचती है, तो कागजों पर उसे 1.1 कार के बराबर गिना जाएगा।
इसी तरह ई20 पेट्रोल वाली कारों को भी राहत मिलेगी। यदि कोई ग्राहक ई20 कार खरीदता है, तो कंपनी के खाते में उस कार से निकलने वाला धुआं आठ फीसदी कम मानी जाएगी।
इससे कंपनियों को अपना प्रदूषण लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी। हालांकि ई20 कारों की शुरुआती कीमत बढ़ सकती है। इसकी वजह टायर प्रेशर मॉनिटरिंग, एलईडी लाइट्स और बेहतर गियरबॉक्स जैसी नई तकनीकें अनिवार्य होना है।
पासबुक और क्रेडिट सिस्टम
इस पॉलिसी में हर कंपनी का एक अलग खाता बनेगा। इसे पासबुक नाम दिया गया है। इसमें कंपनी के अच्छे प्रदर्शन को क्रेडिट में गिना जाएगा। खराब प्रदर्शन को डेबिट में गिना जाएगा। पॉलिसी में पूलिंग का विकल्प भी दिया गया है।
इसका मतलब है कि ज्यादा क्लीन कारें बेचने वाली कंपनी अपना क्रेडिट दूसरी कंपनी को बेच सकेगी। हालांकि जो कंपनियां साल में एक हजार से कम कारें बेचती हैं, उन्हें इस नियम से छूट मिलेगी। इससे छोटी कंपनियों पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा।
क्या पुरानी कार पर असर
यह नियम पुरानी कारों पर लागू नहीं होगा। यह सिर्फ 1 अप्रैल 2027 के बाद बनने वाली नई कारों पर लागू होगा। इसके अलावा विदेश से आयात होने वाली नई कारों पर भी यह नियम लागू होगा। यह नियम सिर्फ M1 कैटेगरी की कारों के लिए है, यानी आठ सीट तक की यात्री कारें।
साथ ही भारत अब माइलेज नापने का तरीका भी बदलेगा। पुराने MIDC सिस्टम की जगह अब वैश्विक स्तर का WLTP (Worldwide Harmonised Light Vehicle Test Procedure) सिस्टम अपनाया जाएगा। यह तरीका असली माइलेज के ज्यादा करीब माना जाता है।
क्या डीजल कारें बंद होंगी
नई पॉलिसी सीधे तौर पर डीजल कारें बंद करने की बात नहीं कहती। वहीं, यह डीजल कंपनियों के लिए घाटे का सौदा बना सकती है। डीजल को पेट्रोल जैसा फिक्स्ड फ्यूल नहीं माना जाता। इसे ज्यादा ईंधन पीने वाला ईंधन माना जाता है।
जुर्माने से बचने के लिए कंपनियां डीजल कारों की संख्या घटा सकती हैं। इसका असर आने वाले सालों में डीजल कारों की बिक्री पर पड़ सकता है। ग्राहकों को डीजल कारों के विकल्प भी कम मिल सकते हैं।
पॉलिसी का असली मकसद
सरकार का मकसद भारत की तेल आयात पर निर्भरता कम करना है। साथ ही देश की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना भी बड़ा लक्ष्य है। सरकार 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना चाहती है। इसी वजह से कंपनियों को पर्यावरण के अनुकूल कारें बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
आने वाले समय में ऑटो कंपनियां ज्यादा हाइब्रिड और ईवी मॉडल लॉन्च कर सकती हैं। वहीं पेट्रोल-डीजल के पुराने मॉडल धीरे-धीरे पीछे छूट सकते हैं। इससे भारत के ऑटो बाजार की दिशा भी बदल सकती है।
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