मिडिल-ईस्ट संकट पर भारत की चुप्पी पर सोनिया गांधी ने सरकार को घेरा, शशि थरूर ने किया बचाव
मध्य-पूर्व (Middle East crisis) में चल रहे युद्ध और ईरान पर हो रहे हमलों के बीच भारत सरकार की चुप्पी को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। खासकर कांग्रेस के नेताओं ने इस चुप्पी की आलोचना की है।
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर इस मामले में अपनी पार्टी से अलग नजर आ रहे हैं। उन्होंने हाल ही में अपने एक लेख में सरकार के रुख का बचाव किया और इसे ‘जिम्मेदार रणनीति’ करार दिया।
कांग्रेस की आलोचना
कांग्रेस पार्टी लगातार भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठा रही है। उनका मानना है कि सरकार की यह खामोशी भारत के पुराने सिद्धांतों और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है।
कांग्रेस के नेता यह तर्क देते हैं कि इस चुप्पी का अर्थ भारत की कमजोरी और कायरता को दर्शाता है। खासकर इस युद्ध में ईरान पर हो रहे हमले को लेकर भारत की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया न आना, कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है।
क्या बोले शशि थरूर
शशि थरूर ने अपनी पार्टी से अलग होकर एक अलग ही तर्क दिया है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में चुप रहना 'नैतिक हार' नहीं है, बल्कि यह एक 'जिम्मेदार रणनीति' है।
इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखे अपने लेख में थरूर ने ये साफ किया कि जो लोग सरकार की चुप्पी को 'कायरता' कह रहे हैं, उन्हें डिप्लोमेसी की असली मुश्किलें समझ में नहीं आ रही हैं।
उनका कहना है कि इस वक्त भारत के लिए ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की नीति सबसे सही है। यानी, भारत को हर बड़े देश के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहिए, और यही सबसे फायदेमंद होगा।
चुप्पी 'कायरता' नहीं
थरूर ने यह भी कहा कि अगर किसी बड़े प्रभाव के बिना चुप रहना, तो ये एक रणनीति हो सकती है, और इसे हमेशा 'कायरता' नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने ये भी माना कि युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ये संप्रभुता और शांति से समाधान के सिद्धांतों के खिलाफ है, जिनके लिए भारत हमेशा खड़ा रहा है।
सरकार को दोषी नहीं ठहराऊंगा: थरूर
थरूर ने कहा कि विदेश नीति किसी 'अकादमिक सेमिनार' की तरह नहीं होती, जहां सिर्फ सिद्धांतों पर चर्चा हो। विदेश नीति के फैसले सीधे तौर पर करोड़ों लोगों की जिंदगी पर असर डालते हैं।
उन्होंने कहा कि मैं सरकार को टकराव के बजाय चुप्पी अपनाने के लिए दोषी नहीं ठहराऊंगा।
उन्होंने यह भी कहा कि खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं, जिनकी सुरक्षा और उनसे होने वाली मनी ट्रांसफर भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
पुरानी घटनाओं का किया जिक्र
उन्होंने अपने लेख में कुछ पुरानी घटनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने पहले भी कई बार राष्ट्रीय हित को सिद्धांतों से ऊपर रखा है।
उन्होने 1956 के हंगरी संकट, 1968 में चेकोस्लोवाकिया में सोवियत हस्तक्षेप और 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले का उदाहरण दिया। इन मामलों में भारत ने खुलकर आलोचना नहीं की थी, क्योंकि उस वक्त सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और रणनीतिक साझेदार था।
ऐसे में चुप रहना भी एक रणनीति का हिस्सा था। इसी तरह, यूक्रेन युद्ध और ईरान से जुड़े मौजूदा हालात में भी यही रणनीति अपनाई जा रही है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा
भारत खाड़ी देशों से तेल और गैस आयात पर निर्भर है। इस क्षेत्र में अस्थिरता से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
इस क्षेत्र से हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है, और इसमें कोई भी अस्थिरता भारत के लिए गंभीर खतरे का कारण बन सकती है।
अमेरिका के साथ रिश्ते
थरूर ने कहा कि आज का अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून को उसी तरह तरजीह नहीं देता जैसा भारत चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार अमेरिका के उद्देश्य में रुकावट डालने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।
ऐसे में भारत को अमेरिका के साथ अपने रक्षा और तकनीकी रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए उसे नाराज नहीं करना चाहिए।
क्या था सोनिया गांधी का बयान
जहां शशि थरूर ने सरकार का समर्थन किया है, वहीं इससे पहले सोनिया गांधी ने सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने भारत सरकार की चुप्पी पर हैरानी जताई थी।
सोनिया गांधी ने सरकार की खामोशी पर हैरानी जाहिर करते हुए कहा कि जब विदेश में किसी नेता (सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई) की लक्षित हत्या की जाती है और भारत इस पर संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का कोई स्पष्ट बचाव नहीं करता, तो यह हमारे विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
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