भारत का रुख साफ, रूसी तेल खरीदते रहेंगे, अमेरिकी छूट से कोई फर्क नहीं
समझें क्या है पूरा मामला
- भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा, यह सरकार ने साफ कहा।
- अमेरिका की प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) खत्म होने के बाद भी खरीद रुकेगी नहीं।
- पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को यह बयान दिया।
- तेल खरीद का आधार सिर्फ व्यावसायिक फायदा और बाजार भाव है।
- सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल बेचने पर रोज करीब 750 करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है।
रूसी तेल पर भारत का फैसला
नई दिल्ली। भारत ने एक बार फिर अपना रुख साफ कर दिया है। अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर कुछ देशों को जो छूट (Sanctions Waiver) दी थी, वो 16 मई 2026 को खत्म हो गई। अमेरिका ने अभी तक उसे नहीं बढ़ाया है। इसके बावजूद भारत सरकार ने कहा है कि रूस से तेल खरीदना बंद नहीं होगा।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने सोमवार को मीडिया को बताया कि भारत अमेरिकी प्रतिबंध छूट की परवाह किए बिना रूस से तेल खरीदता आया है। उन्होंने साफ कहा कि यह नीति आगे भी जारी रहेगी।
भारत की ऊर्जा जरूरतें पहले
सुजाता शर्मा ने कहा कि हमारी प्राथमिकता देश की ऊर्जा जरूरत पूरी करना है। उन्होंने यह भी बताया कि खरीद का फैसला तकनीकी और व्यावसायिक कारणों से होता है। यानी जो तेल सस्ता पड़े, जो रिफाइनरी के लिए सही हो और जो आसानी से आ सके, वही खरीदा जाएगा।
शर्मा ने कहा, "अमेरिकी छूट के बारे में मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि हम छूट से पहले भी रूस से खरीद रहे थे, छूट के दौरान भी और अब भी।" इससे साफ है कि भारत की खरीद नीति किसी बाहरी दबाव से नहीं चलती।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि खरीद का आधार व्यावसायिक समझ है। शर्मा के मुताबिक भारत के पास कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है और पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा चुकी है। उन्होंने कहा, "छूट हो या न हो, इससे कोई असर नहीं पड़ेगा।"
अमेरिकी वेवर की पूरी कहानी
अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद पर ताजा छूट 16 मई 2026 तक दी थी। यह उन जहाजों पर लादे गए तेल के लिए थी जो 17 अप्रैल या उससे पहले जहाज पर चढ़ा दिए गए थे। अभी तक अमेरिका ने इसे नहीं बढ़ाया है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग (US Treasury Department) ने मार्च में पहली बार यह छूट दी थी। उसके बाद से यह दो बार बढ़ाई जा चुकी है। आखिरी बार अप्रैल के अंत में दो हफ्ते के लिए बढ़ाई गई थी।
उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि अगर यह छूट नहीं मिलती, तो भुगतान संबंधी दिक्कतों की वजह से भारतीय तेल कंपनियों को रूसी तेल की खरीद घटानी पड़ सकती है। ICRA (Investment Information and Credit Rating Agency) के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने कहा कि वेवर की वजह से ही रूस के सबसे बड़े तेल उत्पादक रोजनेफ्ट (Rosneft) से तेल खरीदना संभव हो पाया था।
मार्च में रिकॉर्ड खरीद
मार्च 2026 में भारत ने रूस से औसतन 1.98 मिलियन (19.8 लाख) बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा। यह जून 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। यह आंकड़ा बताता है कि भारत ने उस दौरान रूसी तेल की खरीद में जबरदस्त तेजी लाई।
हालांकि अप्रैल में यह औसत घटकर 1.57 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। इसकी बड़ी वजह थी नायारा एनर्जी (Nayara Energy) की 4 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी का अस्थायी रूप से कम उत्पादन पर जाना।
मई 2026 में भी रूसी तेल की आवक करीब 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। यह 10 महीनों का उच्चतम स्तर होगा। रूस के ईएसपीओ ब्लेंड (ESPO Blend) जैसे हल्के कच्चे तेल की मांग भारतीय रिफाइनरियों में तेजी से बढ़ी है।
रूस क्यों बना भारत का पसंदीदा?
रूसी तेल की कीमतें कम हैं और इससे रिफाइनरियों को ज्यादा फायदा होता है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बाद रूसी तेल सस्ते में मिलने लगा। साथ ही बिना प्रतिबंध वाले टैंकरों की उपलब्धता भी बढ़ी।
भारत ने फरवरी 2025 में पश्चिमी देशों के नए प्रतिबंधों के बावजूद कहा था कि रूसी तेल की खरीद जारी रहेगी, बशर्ते कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से कम हो, जहाज प्रतिबंधमुक्त हो और लेनदेन में कोई प्रतिबंधित इकाई शामिल न हो।
सरकारी कंपनियों को भारी घाटा
पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह भी बताया कि सरकारी ईंधन रिटेलर कंपनियों को पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर रोज करीब 750 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद सरकार ने इन कंपनियों को कोई वित्तीय सहायता देने की योजना नहीं बनाई है।
यह नुकसान इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकारी कंपनियां बाजार भाव से कम दाम पर उपभोक्ताओं को ईंधन बेचती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर इन कंपनियों की जेब पर पड़ता है।
भारत-रूस का ऊर्जा रिश्ता
भारत और रूस के बीच ऊर्जा क्षेत्र में संबंध यूक्रेन संकट के बाद से और मजबूत हुए हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में भारत को ऊर्जा आपूर्ति में कोई बाधा न आने देने का वादा किया था।
भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव (Denis Alipov) ने भी पुष्टि की थी कि भारत रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा ग्राहक बना हुआ है। उन्होंने रूसी टेलीविजन को बताया था कि भारत में रूसी तेल की खरीद स्थिर बनी हुई है।
विदेश मंत्रालय का रुख
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी दोहराया है कि भारत की ऊर्जा खरीद नीति राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और बाजार की स्थितियों के आधार पर तय होती है। यह देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर भारत की ऊर्जा स्वायत्तता (Energy Sovereignty) और विदेश नीति की समझ के लिए बेहद अहम है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ऊर्जा आपूर्ति पर टिकी है। जब अमेरिका जैसी महाशक्ति प्रतिबंध और छूट के जरिए भारत की खरीद नीति को प्रभावित करने की कोशिश करती है, तो भारत का स्पष्ट जवाब यह बताता है कि देश अपने राष्ट्रीय हित में स्वतंत्र फैसले लेता है। यह खबर भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप है जो देश की संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च मानती है। इसके साथ-साथ सरकारी तेल कंपनियों के 750 करोड़ रुपए रोजाना के घाटे की जानकारी आम नागरिक के लिए भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि इसका असर अंततः पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है।
जरूरी FAQ
क्या भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल खरीद सकता है?
हां, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिकी प्रतिबंधों या उनकी छूट (Sanctions Waiver) की परवाह किए बिना रूस से कच्चा तेल खरीदता रहेगा। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने 18 मई 2026 को मीडिया से बात करते हुए यह बात कही। भारत की खरीद नीति व्यावसायिक फायदे और देश की ऊर्जा जरूरतों पर आधारित है। हालांकि यह जरूर ध्यान रखा जाता है कि तेल $60 प्रति बैरल से कम पर मिले, जहाज प्रतिबंधमुक्त हो और लेनदेन में कोई प्रतिबंधित संस्था शामिल न हो।
अमेरिकी प्रतिबंध छूट क्या थी और यह क्यों खत्म हुई?
जवाब: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने रूसी कच्चे तेल की खरीद पर मार्च 2026 में एक अस्थायी छूट दी थी। इसे दो बार बढ़ाया गया और आखिरी बार यह 16 मई 2026 को खत्म हुई। यह छूट उन तेल खेपों के लिए थी जो 17 अप्रैल 2026 या उससे पहले जहाज पर लादी जा चुकी थीं। इस छूट का मकसद पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष की वजह से बढ़े तेल भाव पर दबाव कम करना था। 16 मई के बाद अमेरिका ने अभी तक इसे नहीं बढ़ाया है, लेकिन भारत ने साफ किया है कि इससे उसकी खरीद पर असर नहीं पड़ेगा।
सरकारी तेल कंपनियों को रोज 750 करोड़ रुपए का घाटा क्यों हो रहा है?
जवाब: भारत की सरकारी ईंधन रिटेलर कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (Indian Oil Corporation), भारत पेट्रोलियम (Bharat Petroleum) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (Hindustan Petroleum) उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल बाजार भाव से कम दाम पर बेचती हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है लेकिन घरेलू खुदरा दाम नहीं बढ़ाए जाते, तो इन कंपनियों को नुकसान होता है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया है कि यह घाटा अभी रोज करीब 750 करोड़ रुपए का है। सरकार ने इन कंपनियों को अभी कोई वित्तीय मदद देने की योजना नहीं बनाई है।
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