क्या ईसाई समुदाय भाजपा की चुनावी नैया पार लगाएगा, केरल की हवाओं में तैर रहा बड़ा सवाल
Thiruvananthapuram: केरल में चुनावी पारा चरम पर है। 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए कोना-कोना पोस्टरों से पटा है, लेकिन इस बार सबसे दिलचस्प जंग चर्च के गलियारों और उन ईसाई परिवारों के ड्राइंग रूम में लड़ी जा रही है, जो दशकों से कांग्रेस (यूडीएफ) और वामपंथ (एलडीएफ) के वफादार रहे हैं।
सवाल बड़ा है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्नेहा यात्रा अभियान और विकास की गारंटी केरल के 18.38 फीसदी ईसाई समुदाय के दिलों में पैठ बना पाएगी? या फिर धर्मांतरण विरोधी कानून और एफसीआरए विधेयक जैसी आशंकाएं भाजपा के मिशन केरल के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी रहेंगी?
अनिल एंटनी की हार और भाजपा का प्लान बी
कहानी शुरू होती है 2023 से, जब कांग्रेस के दिग्गज नेता एके एंटनी के बेटे अनिल एंटनी ने भगवा दुपट्टा ओढ़ा। भाजपा के लिए यह एक ट्रॉफी जैसा था। उम्मीद थी कि एक प्रभावशाली ईसाई चेहरा समुदाय का भरोसा जीतेगा। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में पथानामथिट्टा की जमीन ने उन्हें हकीकत का आईना दिखा दिया-वे तीसरे स्थान पर रहे। लेकिन भाजपा हार मानने वालों में से नहीं है। अब, 2026 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने अपनी रणनीति बदली है। इस बार केवल चेहरों पर नहीं, बल्कि अस्तित्व के वादों पर दांव लगाया गया है।
घोषणापत्र का मास्टरस्ट्रोक
इस बार भाजपा के घोषणापत्र में एक लुभावना वादा है, ईसाई समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा और कल्याणकारी योजनाओं तक समान पहुंच। पार्टी का तर्क है कि सूक्ष्म अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में लाना जरूरी है, जिससे उन्हें सामाजिक हाशिए पर धकेलने से बचाया जा सके।
हालांकि, जमीन पर तस्वीर धुंधली है। कालीकट में विमानन अकादमी चलाने वाली 46 वर्षीय मंजू शमीम कहती हैं, हम भाजपा को लेकर संशय में हैं, लेकिन उत्सुक भी। हम बदलाव चाहते हैं, पर उनकी विचारधारा डराती भी है।
ईसाई समुदाय की यह उत्सुकता तब आशंका में बदल जाती है, जब विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए 2026 की बात आती है। केरल के चर्च और उनसे जुड़े एनजीओ बड़े पैमाने पर विदेशी दान पर निर्भर हैं। ईसाइयों को डर है कि यह कानून उनकी सेवा संस्थाओं की रीढ़ तोड़ देगा। भाजपा के ही एक सांसद ने दबे स्वर में स्वीकार किया, एफसीआरए विधेयक का समय सही नहीं था, इसने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा भर दी है।
लेंट का आत्मचिंतन और खामोशी
केरल में चुनावी शोर के बीच हाल ही में लेंट (45 दिनों का उपवास) और ईस्टर का समय बीता। यह वह समय है, जब ईसाई समुदाय आत्मचिंतन करता है। राजनीतिक दलों ने भी अपनी रैलियों की गति धीमी रखी। लेकिन अब ईस्टर बीत चुका है और चुनावी शतरंज की बिसात बिछ गई है।
कोट्टायम के छात्र टीजे जैकब युवाओं की नब्ज टटोलते हुए कहते हैं, हम विचारधारा के पीछे नहीं भाग रहे। हमें अपना भविष्य सुरक्षित चाहिए। जो पार्टी रोजगार और विकास देगी, वोट उसे ही जाएगा।
हिंदुत्व बनाम विकास, एक कठिन संतुलन
भाजपा के लिए केरल में रास्ता इसलिए कठिन है, क्योंकि यहां उसकी पहचान हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ी है। उत्तर भारत में चर्चों पर हमले और धर्मांतरण विरोधी कानूनों की खबरों ने केरल के कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के मन में संदेह पैदा किया है। छत्तीसगढ़ में ननों की गिरफ्तारी ने आग में घी डालने का काम किया था।
इसे भांपते हुए भाजपा ने सुरेश गोपी जैसे सितारों को मैदान में उतारा, जिन्होंने त्रिशूर में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। सुरेश गोपी की जीत ने साबित किया कि अगर भाजपा ईसाई-हिंदू गठजोड़ बनाने में सफल रही, तो वह केरल के दो-ध्रुवीय राजनीतिक ढांचे (एलडीएफ-यूडीएफ) को ध्वस्त कर सकती है।
वक्फ बोर्ड विवाद और मुनंबम का मोर्चा
भाजपा ने एक और मोर्चे पर चाल चली है। वह वक्फ (संशोधन) अधिनियम है। एर्नाकुलम के मुनंबम गांव में जब वक्फ बोर्ड ने 600 परिवारों की जमीन पर दावा किया, तो भाजपा ने इसे ईसाइयों और हिंदुओं के अधिकारों का मुद्दा बनाया। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और अमित शाह ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया।
लेकिन मुनंबम के स्थानीय निवासी बेनी जोसेफ अब भी संशय में हैं। वे कहते हैं, भाजपा इसे ध्रुवीकरण का जरिया बना रही है। हमें जमीन चाहिए, राजनीति नहीं। मुनंबम में भाजपा का समर्थन अब घटता दिख रहा है, जिससे संकेत मिलता है कि समुदाय केवल नारों पर नहीं, बल्कि समाधान पर वोट देगा।
उम्मीदवारों की फौज, भाजपा के 7 योद्धा
भाजपा ने इस बार सात ईसाई उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जिनमें पीसी जॉर्ज, शोन जॉर्ज और केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन जैसे नाम शामिल हैं। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह ईसाइयों को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि नेतृत्व का हिस्सा मानती है।
वहीं, कांग्रेस भी पीछे नहीं है। उसने 20 से अधिक ईसाई उम्मीदवारों को टिकट दिया है। कांग्रेस को भरोसा है कि पारंपरिक रूप से उसका वोट बैंक भाजपा की ओर नहीं भटकेगा।
कोशी रिपोर्ट के सहारे साधा समीकरण
चुनावों से ठीक पहले वामपंथी एलडीएफ सरकार ने जस्टिस जेबी कोशी की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया। यह रिपोर्ट तीन साल से ठंडे बस्ते में थी। रिपोर्ट में ईसाइयों की घटती आबादी और सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व की बात कही गई है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इसे चुनाव से पहले लागू कर ईसाइयों को यह बताने की कोशिश की है कि उनकी असली हितैषी वामपंथी सरकार है।
क्या होगा परिणाम?
कोट्टायम के सेंट थॉमस मलंकरा कैथोलिक चर्च के फादर अब्राहम इरिम्बिनिकल के अनुसार, केरल में भाजपा अब तीसरा मोर्चा बनकर उभर रही है। हालांकि इसकी सफलता पर संशय है, लेकिन इसकी प्रासंगिकता बढ़ गई है।
केरल की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहां धर्म और विकास के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। ईसाई समुदाय, जो 18 फीसदी की ताकत रखता है। फिलहाल वेट एंड वॉच की स्थिति में है। भाजपा के लिए यह चुनाव केवल जीत-हार का नहीं, बल्कि उस भरोसे को जीतने का है, जिसे वह दशकों से नहीं पा सकी।
9 अप्रैल को जब केरल के लोग वोट डालेंगे, तो वे केवल एक प्रतिनिधि नहीं चुनेंगे, बल्कि यह तय करेंगे कि क्या केरल की धर्मनिरपेक्ष मिट्टी में कमल खिलने के लिए 'क्रॉस' का आशीर्वाद मिलेगा या नहीं।
चुनाव में भाजपा के लिए खास बातें:
चुनौती: उत्तर भारत में चर्चों पर हमले और एफसीआरए विधेयक।
रणनीति: अल्पसंख्यक दर्जा का वादा और स्थानीय ईसाई चेहरों को टिकट।
विवाद: वक्फ बोर्ड भूमि विवाद और धर्मांतरण विरोधी कानून।
लक्ष्य: त्रिशूर की तरह अन्य सीटों पर ईसाई-हिंदू ध्रुवीकरण का लाभ उठाना।
क्या भाजपा का यह 'मिशन केरल' सफल होगा? जवाब 9 अप्रैल के बाद के परिणामों में छिपा है।
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