भूपेंद्र यादव टीम पर एक्शन तो सचिव जवाबदेह क्यों नहीं, अशोक खेमका का बड़ा सवाल
समझें क्या है पूरा मामला
- पूर्व आईएएस अशोक खेमका ने भूपेंद्र यादव टीम पर एक्शन को लेकर सवाल उठाया।
- उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को अरावली से जोड़ा है, जिसकी नई परिभाषा तय की गई।
- रिटायर्ड आईएएस ने कहा, कार्रवाई सिर्फ मंत्री के स्टाफ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
- पूछा, उस सचिव को क्यों रहना चाहिए, जिसने अरावली पर बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट दी।
- कहा, अरावली पर लचर कानून से खनन और रियल एस्टेट लॉबी को लाभ की आशंका।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की टीम से चार मुख्य सहायकों को हटाए जाने का मामला अभी छाया हुआ है।
पूर्व सीनियर आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने इस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया पर एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने इस मामले को अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा से जोड़ा है।
खेमका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस संदेश को सही अर्थों में लागू किया जा रहा है तो एक्शन केवल मंत्री के स्टाफ तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए।
पर्यावरण सचिव के खिलाफ एक्शन क्यों नहीं?
भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े रुख के लिए पहचान बनाने वाले रिटायर्ड आईएएस अशोक खेमका ने भूपेंद्र यादव मामले पर पोस्ट अपनी दो हिस्सों में जारी की है।
उन्होंने लिखा कि पर्यावरण मंत्री के स्टाफ के खिलाफ यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है तो पर्यावरण मंत्रालय का सचिव को भी जवाबदेह बनाना चाहिए।
उन्होंने पूछा कि वह सचिव क्यों बचा रहना चाहिए, जिसके नेतृत्व वाली समिति ने सुप्रीम कोर्ट में अरावली पर बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।
खनन और रियल एस्टेट लॉबी को फायदा पहुंचाने की आशंका
पूर्व आईएएस अधिकारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट जमा करने का सीधा असर देश के पर्यावरण पर पड़ा है। इस लापरवाही या जानबूझकर उठाए गए कदम के कारण पर्यावरण सुरक्षा उपाय कमजोर हुए हैं।
खेमका ने आशंका जताई कि इस लचर रिपोर्ट का सीधा फायदा खनन और रियल एस्टेट से जुड़े बड़े हितों या माफियाओं को मिल सकता है।
अरावली क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर समेत कई राज्यों के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है। वहां होने वाला अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण हमेशा से विवादों और अदालती कार्रवाइयों के केंद्र में रहा है।
खेमका ने लिखा कि जवाबदेही आधी अधूरी नहीं रुक सकती। उनका सीधा इशारा इस बात पर है कि यदि मंत्रियों के निजी स्टाफ पर कार्रवाई हो सकती है तो नीतिगत फैसले लेने वाले बड़े अधिकारियों को ढील क्यों दी जा रही है?
प्रशासनिक हलकों में मची हलचल
अशोक खेमका के इस बयान के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। पर्यावरण और अरावली संरक्षण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने खेमका के इस रुख का समर्थन किया है।
जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट जमा करना सिर्फ तकनीकी भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है, ताकि बाद में कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाया जा सके।
क्या है स्टाफ हटाने का मामला?
केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव राजस्थान में अलवर लोकसभा सीट से सांसद हैं। वे केंद्र सरकार में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री हैं। हाल ही में उनके चार मुख्य सहायकों को एक साथ उनके पदों से हटा दिया है। आमतौर पर किसी मंत्री की टीम से एक साथ चार बड़े अधिकारियों का हटना बेहद दुर्लभ माना जाता है।
अचानक हुए इस बदलाव की वजह प्रशासनिक बताई गई है, लेकिन यह किसी गंभीर आंतरिक विषय की ओर इशारा करता है। यह फैसला 3 जुलाई को अलग-अलग सरकारी आदेश जारी करके लिया गया।
इस मामले की खबरें चार जुलाई को पीएम नरेंद्र मोदी के राजस्थान दौरे के बाद मीडिया में आई। अभी तक हटाने की असल वजह सामने नहीं आई है। लेकिन, चार करीबी लोगों पर एक्शन केंद्रीय मंत्री के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
दो अधिकारी मूल विभाग भेजे, दो की छुट्टी
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के निजी सचिव अमर सिंह को उनके मूल कैडर राजस्व विभाग में भेजा गया है। दो अतिरिक्त सचिवों में शैलेश कुमार सिंह को भी उनके मूल विभाग डीओपीटी में लौटा दिया है।
अतिरिक्त निजी सहायक आयुष शरण और सहायक निजी सहायक सिद्धार्थ यादव को टर्मिनेट किया गया है। मंत्री की च्वॉइस पर नियुक्त हुए ये दोनों लोग उनके महत्वपूर्ण काम संभालते थे।
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