180 रुपए की जमीन के लिए 47 साल चली कानूनी जंग, खर्च हुए 16 लाख

Anjali Dwivedi | Apr 13, 2026, 18:10 IST
Lucknow land dispute 47 years case
लखनऊ के गोसाईंगंज में 180 रुपए की जमीन पाने के लिए एक परिवार ने 47 साल तक मुकदमा लड़ा और 16 लाख खर्च किए। दिसंबर 2025 में कोर्ट ने हक में फैसला सुनाया।

न्याय के लिए इंसान किस हद तक जा सकता है, इसकी एक बानगी उत्तर प्रदेश के लखनऊ में देखने को मिली। यहां 180 रुपए में खरीदी गई जमीन के टुकड़े को वापस पाने के लिए एक परिवार को 47 साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।



इस मुकदमे के दौरान जमीन की मूल कीमत से हजारों गुना ज्यादा यानी 16 लाख रुपए खर्च हो गए। दुखद बात यह रही कि केस शुरू करने वाले वादी (Plaintiff) और प्रतिवादी (Defendant) दोनों ही आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन न्याय की यह मशाल उनकी अगली पीढ़ी ने थामे रखी।



1965 में शुरू हुई थी कहानी

गोसाईंगंज के बस्तिया गांव निवासी ब्रजेश वर्मा ने बताया कि उनके पिता राम सागर ने 16 सितंबर, 1965 को यह जमीन खरीदी थी। उन्होंने पड़ोस की शिवरानी के साथ मिलकर तीन बिस्वा यानी करीब 4050 से 4083 वर्गफुट की यह खरीदारी की थी। इसमें राम सागर का हिस्सा करीब पौने दो बिस्वा था, जिसके लिए उन्होंने उस समय महज 180 रुपए चुकाए थे। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटी सी रकम एक दिन आधी सदी लंबे विवाद (जमीनी विवाद) का कारण बनेगी।



ऐसे पता चला धोखाधड़ी का

9 मार्च, 1973 को शिवरानी ने चालाकी दिखाते हुए राम सागर की जगह किसी और व्यक्ति को खड़ा कर दिया और फर्जी तरीके से उनके हिस्से की जमीन भी अपने नाम करा ली। इस धोखाधड़ी (Fraud) का पता राम सागर को तब चला, जब 1977 में इस फर्जीवाड़े में शामिल एक गवाह का शिवरानी से झगड़ा हो गया और उसने गुस्से में आकर राम सागर को सारा सच बता दिया।



आधी सदी तक चला इंसाफ का सफर

रजिस्ट्री दफ्तर में जांच के बाद फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई और राम सागर ने 1978 में गोसाईंगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। यहीं से कोर्ट-कचहरी का चक्कर शुरू हुआ। साल 2003 में पिता राम सागर और 2013 में प्रतिवादी शिवरानी की मौत हो गई। बावजूद इसके दोनों पक्षों के वारिसों के बीच मुकदमा जारी रहा। आखिरकार दिसंबर 2025 में अदालत ने ब्रजेश वर्मा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए फर्जी रजिस्ट्री को निरस्त कर दिया।



खर्च हुए लाखों, पर जीत गया सम्मान

ब्रजेश के मुताबिक, इस जमीन को पाने की जिद में उनके करीब 16 लाख रुपए खर्च हुए। कोर्ट ने सबूतों के आधार पर शिवरानी की फर्जी रजिस्ट्री को रद्द कर दिया। कागजी कार्यवाही पूरी होने के बाद मार्च 2026 में यानी फैसले के तीन महीने बाद ब्रजेश को जमीन पर कब्जा मिल पाया। ब्रजेश के लिए यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके पिता के सम्मान की जीत है।



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