हाईकोर्ट का फैसला: धर्म परिवर्तन करने के बाद नहीं मिलेगा आरक्षण

Jitendra Shrivastava | Jun 26, 2026, 19:34 IST
Photograph: (THESOOTR)
MADRAS. हाईकोर्ट ने अपने में फैसले में कहा कि इस्लाम अपनाने से कोई पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय का सदस्य नहीं बनता। तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश असंवैधानिक घोषित किया।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • इस्लाम अपनाया पर आरक्षण नहीं मिलेगा, हाईकोर्ट का साफ फैसला।
  • धर्म बदलने से समुदाय नहीं बदलता, मद्रास हाईकोर्ट ने समझाया।
  • TN सरकार का 2024 का आदेश असंवैधानिक, कोर्ट ने किया रद्द।
  • हिंदू से मुस्लिम बना, फिर मांगा OBC कोटा- कोर्ट ने ठुकराया।
  • आरक्षण के लिए धर्म बदलना कानूनी दांव नहीं, जानिए क्यों।

मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि केवल इस्लाम अपनाने से कोई व्यक्ति पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय का सदस्य नहीं बन जाता। तमिलनाडु के समीर अहमद ने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया और मुस्लिम पिछड़ा वर्ग आरक्षण मांगा।



अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। साथ ही राज्य सरकार के 9 मार्च 2024 के उस सरकारी आदेश को भी असंवैधानिक घोषित किया जो धर्मांतरितों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग का प्रमाणपत्र देने की अनुमति देता था। अदालत ने कहा कि समुदाय की सदस्यता जन्म से तय होती है, धर्म बदलने से नहीं।



तमिलनाडु में एक शख्स ने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया। फिर मुस्लिम पिछड़ा वर्ग का आरक्षण मांगा। मद्रास हाईकोर्ट ने यह मांग ठुकरा दी। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है। इसने आरक्षण, धर्म परिवर्तन और संविधान के बीच की लकीर को एक बार फिर साफ कर दिया है।



क्या था पूरा मामला?

समीर अहमद का पहले नाम परमासिवम था। वे हिंदू धर्म में थे। साल 2015 में उन्होंने इस्लाम कबूल किया। धर्म बदलने के बाद उन्होंने तमिलनाडु सरकार से मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा। इस प्रमाणपत्र से उन्हें पिछड़ा वर्ग मुस्लिम आरक्षण का फायदा मिलता।



तहसीलदार ने आवेदन खारिज कर दिया। उनका कहना था कि समीर ने धर्म बदला है, समुदाय नहीं। इसके बाद समीर मद्रास हाईकोर्ट पहुंचे।



islam reservation ruling


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. बी. बालाजी की पीठ ने मामला सुना। अदालत ने कहा कि साल 1951 के एक पुराने फैसले में यह बात पहले ही तय हो चुकी है। इस्लाम अपनाने से कोई मुस्लिम तो बन जाता है, लेकिन किसी विशेष मुस्लिम समुदाय का सदस्य नहीं बनता।



सरकारी आदेश भी असंवैधानिक घोषित

समीर ने अदालत में तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के सरकारी आदेश का हवाला दिया। इस आदेश में कहा गया था कि धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में से किसी एक का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। अदालत ने इस आदेश को असंवैधानिक करार दिया।



कोर्ट ने साफ कहा कि राज्य सरकार किसी न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय को सरकारी आदेश के जरिए बदल या निष्प्रभावी नहीं कर सकती। यह कानून के शासन यानी रूल ऑफ लॉ (Rule of Law) के खिलाफ है।



समुदाय जन्म से तय होता है, धर्म बदलने से नहीं

अदालत ने इस्लाम की बात करते हुए कहा कि यह धर्म समानता का संदेश देता है। लेकिन मुस्लिम समाज में भी सामाजिक समुदाय और जातियां मौजूद हैं।



तमिलनाडु में लेब्बाई, रौथर, मरक्कायर और दक्कनी मुस्लिम जैसे समुदाय पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल हैं। इन समुदायों की सदस्यता जन्म से तय होती है। धर्म बदलने से कोई इनका सदस्य नहीं बन जाता।



धर्म की आजादी है, पर आरक्षण की गारंटी नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म अपनाने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह आजादी यह गारंटी नहीं देती कि धर्म बदलने के बाद व्यक्ति किसी आरक्षित समुदाय का सदस्य भी बन जाएगा। दोनों बातें अलग-अलग हैं।



राज्य सरकारों को भी बड़ा संदेश

यह फैसला सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। इससे देश के दूसरे राज्यों को भी एक साफ संदेश मिला है। आरक्षण नीतियां बनाते समय न्यायिक फैसलों और संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करना जरूरी है।



कार्यपालिका यानी सरकार के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अदालती फैसले को सरकारी आदेश से पलट दे।



FAQ

  1. क्या धर्म परिवर्तन करने के बाद आरक्षण का लाभ मिल सकता है?
    मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले के अनुसार केवल धर्म परिवर्तन से किसी आरक्षित समुदाय की सदस्यता नहीं मिलती। समुदाय की सदस्यता जन्म से तय होती है। इसलिए इस्लाम अपनाने के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।
  2. तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश क्या था और क्यों रद्द हुआ?
    तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक आदेश जारी किया था जिसमें धर्मांतरितों को सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों का प्रमाणपत्र देने की अनुमति दी गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया क्योंकि यह पुराने न्यायिक फैसलों के विरुद्ध था।
  3. क्या धर्म बदलना संविधान में मना है?
    नहीं। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म अपनाने की आजादी है। लेकिन धर्म बदलने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति किसी आरक्षित सामाजिक समुदाय का सदस्य भी बन जाए।

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