इस्तीफा नहीं दूंगी- ममता से पहले मांझी, केजरीवाल, सिद्धारमैया समेत 5 मुख्यमंत्री कर चुके हैं इनकार

Jitendra Shrivastava | May 05, 2026, 18:23 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. ममता बनर्जी ने हार के बाद इस्तीफे से इनकार कर दिया है। इससे पहले मांझी, केजरीवाल, सिद्धारमैया, बीरेन सिंह और चंपई सोरेन भी CM पद छोड़ने से मुकर चुके हैं।

News In Short

  • ममता ने कहा- इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।
  • जीतन राम मांझी ने 2015 में इनकार किया था।
  • केजरीवाल जेल से भी CM बने रहे महीनों तक।
  • सिद्धारमैया ने MUDA घोटाले में पद नहीं छोड़ा।
  • बीरेन सिंह ने 2 साल तक हिंसा में पद रखा।

News In Detail

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee Resignation) ने हार के बाद भी सीएम पद से इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी मुख्यमंत्री ने कुर्सी छोड़ने से मना किया हो। भारतीय राजनीति (Indian Politics) में यह परंपरा पुरानी है। जानिए किन 5 सीएम ने पहले ऐसा किया और क्या रहा उनका अंजाम।



ममता का इस्तीफे से इनकार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है। विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भी उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया। कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह भी कहा कि वे राजभवन यानी लोकभवन जाकर इस्तीफा नहीं देंगी।



ममता बनर्जी ने इस मौके पर कहा कि नैतिक रूप से उनकी ही जीत हुई है। उन्होंने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे अब सड़कों पर संघर्ष करेंगी। ममता ने चुनाव आयोग पर भी निशाना साधा और कहा कि उनका मुकाबला बीजेपी से नहीं बल्कि चुनाव आयोग से था। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने भाजपा के लिए काम किया।



वरिष्ठ वकील शेखर नाफड़े के अनुसार यदि ममता इस्तीफा नहीं देतीं तो राज्यपाल सरकार बर्खास्त कर सकते हैं। संविधान के तहत यह अधिकार राज्यपाल के पास होता है। हालांकि इससे सरकार गठन पर तत्काल असर नहीं पड़ेगा। यह स्थिति एक संवैधानिक संकट (Constitutional Crisis) की ओर इशारा करती है।



केजरीवाल की जेल से सरकार

मार्च 2024 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) को एक्साइज पॉलिसी मामले में गिरफ्तार किया गया। वे तिहाड़ जेल में बंद रहे लेकिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से उन्होंने साफ मना कर दिया। उनका तर्क था कि इस्तीफा देने से भाजपा को विपक्षी मुख्यमंत्रियों को निशाना बनाने का एक खतरनाक नजीर मिल जाएगा। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।



दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल सरकार की तीखी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल ने व्यक्तिगत हित को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखा। विपक्ष यानी भाजपा ने लगातार इस्तीफे की मांग की। आम आदमी पार्टी (AAP) ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया। केजरीवाल ने जेल से ही सरकार चलाने का दावा किया और इसे अपनी लड़ाई का हिस्सा बताया।



सितंबर 2024 में जमानत मिलने के बाद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि जब दिल्लीवासी उन्हें ईमानदारी का प्रमाण-पत्र देंगे तब वे वापस CM बनेंगे। विश्लेषकों का कहना था कि यह फैसला जेल में ही सोच-समझकर तय किया गया था ताकि सत्ता की भूख का आरोप न लगे।



सिद्धारमैया का MUDA मामला

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (Siddaramaiah) पर 2024 में MUDA यानी मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (Mysuru Urban Development Authority) घोटाले के गंभीर आरोप लगे। इस मामले में उनके परिवार का नाम भी सामने आया। लोकायुक्त पुलिस ने जांच शुरू की और कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए। भाजपा और जेडीएस ने उनके इस्तीफे की जोरदार मांग उठाई।



सितंबर 2024 में सिद्धारमैया ने स्पष्ट कह दिया कि वे इस्तीफा नहीं देंगे। उनका कहना था कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। उन्होंने एचडी कुमारस्वामी का उदाहरण देते हुए कहा कि आरोप लगने पर सीएम को इस्तीफा नहीं देना होता। उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया और विपक्षी प्रदर्शनों के बावजूद अपने पद पर बने रहे।



कांग्रेस हाई कमांड ने सिद्धारमैया का साथ दिया और वे अडिग बने रहे। उन्होंने पूरे मामले को भाजपा की राजनीतिक साजिश करार दिया। यह मामला कर्नाटक की राजनीति में एक बड़ा विवाद बनकर उभरा और अभी भी कानूनी लड़ाई जारी है।



चंपई सोरेन की अनिच्छा

झारखंड में चंपई सोरेन (Champai Soren) का मामला थोड़ा अलग तरह का है। जनवरी 2024 में हेमंत सोरेन की ईडी द्वारा गिरफ्तारी से पहले उन्होंने इस्तीफा देकर चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया था। जून-जुलाई 2024 में हेमंत सोरेन को जमानत मिली तो गठबंधन ने उन्हें वापस सत्ता में लाने का निर्णय किया।



3 जुलाई 2024 को जेएमएम विधायक दल की बैठक में चंपई सोरेन ने शुरुआत में इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने पद पर बने रहने की इच्छा जाहिर की लेकिन किसी भी विधायक ने उनका साथ नहीं दिया। पार्टी और गठबंधन के सामूहिक दबाव के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। बाद में वे जेएमएम छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।



एन बीरेन सिंह और मणिपुर संकट

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह (N. Biren Singh) का मामला सबसे लंबे संकट का उदाहरण है। मई 2023 से मणिपुर में मेइती और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा (Ethnic Violence Manipur) भड़क उठी। बीरेन सिंह पर पक्षपात के आरोप लगे और हिंसा को नियंत्रित न कर पाने के लिए उनकी तीखी आलोचना हुई। विपक्ष के साथ-साथ पीड़ित समुदायों ने भी उनके इस्तीफे की मांग की।



2023 में बीरेन सिंह ने खुद इस्तीफा देने की कोशिश की थी लेकिन उनके समर्थकों ने पत्र फाड़ दिया। इसके बाद उन्होंने हर बार कहा कि संकट के इस दौर में वे इस्तीफा नहीं देंगे। केंद्र सरकार और गृहमंत्री अमित शाह का समर्थन उन्हें मिलता रहा। भाजपा के अंदर असंतोष के बावजूद वे पद पर बने रहे और 2025 तक हिंसा जारी रही।



फरवरी 2025 में आखिरकार बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। भाजपा का अंदरूनी दबाव, एनपीपी का समर्थन वापसी और अविश्वास प्रस्ताव ने उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर किया। करीब दो साल तक पद पर टिके रहने के बाद अंततः राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।



जीतन राम मांझी का विद्रोह

बिहार में वर्ष 2015 में जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) का मामला भारतीय राजनीति का एक क्लासिक उदाहरण बन गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू की बुरी हार के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा था। उनकी जगह महादलित समुदाय से आने वाले जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। शुरुआत में उन्हें अस्थायी व्यवस्था माना जा रहा था।



जब 2015 में नीतीश कुमार वापस मुख्यमंत्री पद संभालना चाहते थे तो मांझी ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने खुद को "रबर स्टैंप" कहलवाने से मना कर दिया। जेडीयू के दबाव को उन्होंने खारिज करते हुए विधानसभा में बहुमत साबित करने का ऐलान कर दिया। 9 फरवरी 2015 को पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया लेकिन मांझी नहीं झुके।



मांझी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। उन्हें भाजपा का समर्थन भी मिला और उन्होंने फ्लोर टेस्ट का सामना करने की तैयारी की। हालांकि 20 फरवरी 2015 को विश्वास मत से ठीक पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने दावा किया कि उनके समर्थक विधायकों को जान से मारने की धमकी दी जा रही थी। यह मामला पार्टी आंतरिक संकट (Party Internal Crisis) का बड़ा उदाहरण बन गया।



भारतीय राजनीति का सबक

इन सभी मामलों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति (Indian Politics) में इस्तीफा न देने का रुख अब एक आम चलन बन गया है। मुख्यमंत्री अपनी सत्ता बचाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः बहुमत, पार्टी का आंतरिक दबाव या कानूनी परिस्थिति तय करती है कि कुर्सी बचेगी या नहीं। ममता बनर्जी का यह रुख भी उसी लंबी परंपरा की एक नई कड़ी है।



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