भारत में स्वास्थ्य महंगाई 12-13%, इलाज के लिए बिक रहे घर और जेवर
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- भारत में मेडिकल महंगाई हर साल 12 से 13 फीसदी बढ़ रही है।
- एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 34 हजार रुपए खर्च होते हैं।
- 30 फीसदी से ज्यादा मामलों में लोग कर्ज लेकर या जेवर बेचकर इलाज कराते हैं।
- सिर्फ 47 फीसदी ग्रामीण और 44 फीसदी शहरी परिवारों के पास बीमा है।
- सरकारी बीमा केवल अस्पताल में भर्ती का खर्च उठाती है, दवाएं बाहर हैं।
इलाज हुआ तो कर्ज हुआ
भारत में अगर घर का कोई सदस्य गंभीर बीमार पड़ जाए या कोई दुर्घटना हो जाए, तो परिवार आर्थिक संकट में आ सकता है। मेडिकल महंगाई हर साल तेज रफ्तार से बढ़ रही है। सरकारी मदद के बाद भी लाखों परिवारों को अपनी जेब से भारी खर्च उठाना पड़ता है।
सरकार के 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) के अनुसार स्वास्थ्य महंगाई दिसंबर 2025 में घटकर 3 फीसदी पर आई। यह 2023 में 6 फीसदी थी। लेकिन एऑन की ग्लोबल मेडिकल ट्रेंड्स रेट 2026 रिपोर्ट और दूसरी रिपोर्टें बताती हैं कि असल मेडिकल महंगाई 12 से 13 फीसदी के बीच है। यह अंतर बड़ी चिंता की बात है।
जेब से निकलते हैं हजारों रुपए
भारत में ज्यादातर लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है। इसलिए उन्हें अपनी जेब से यानी ओओपीई (Out Of Pocket Expenditure) खर्च करना पड़ता है। 2025 में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर (बच्चे के जन्म को छोड़कर) औसत ओओपीई करीब 34 हजार 064 रुपए था।
ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 31 हजार 484 रुपए और शहरों में 38 हजार 688 रुपए था। यह आंकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (National Sample Survey) के 80वें दौर की स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट पर आधारित हैं। बड़ी आबादी के लिए यह उनकी पूरे महीने की आमदनी से भी ज्यादा है।
सरकारी अस्पतालों में भी खर्च कम नहीं। यहां भर्ती होने पर औसतन 6 हजार 631 रुपए खर्च होते हैं। धर्मार्थ या एनजीओ संचालित अस्पतालों में यह 39 हजार 530 रुपए और निजी अस्पतालों में 50 हजार 508 रुपए तक पहुंच जाता है।
महंगाई के पीछे कौन से कारण?
आईसीएमआर (ICMR) के राष्ट्रीय क्षय रोग अनुसंधान संस्थान में स्वास्थ्य अर्थशास्त्र विभाग की प्रमुख डॉ. एम. मुनियंदी कहती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में नई तकनीक आने से शुरुआती खर्च बहुत बढ़ जाता है। महंगे मेडिकल उपकरणों और दवाओं का आयात भी खर्च बढ़ाता है।
वैश्विक सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) में बाधाएं भी इसमें योगदान देती हैं। डॉ. मुनियंदी यह भी कहती हैं कि तकनीक के स्थानीयकरण और उत्पादन से धीरे-धीरे यह खर्च कम किया जा सकता है।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ से जुड़ी डॉ. आशना मेहता कहती हैं कि दवाओं की बढ़ती कीमतें यानी फार्मास्युटिकल महंगाई भी एक बड़ा कारण है। बढ़ती उम्र की आबादी और गैर-संचारी रोगों की बढ़ती संख्या भी खर्च को ऊपर धकेल रही है।
निजीकरण और मुनाफे का खेल
2025 में 61.25 फीसदी भर्ती मामले निजी अस्पतालों में हुए। सरकारी अस्पतालों में भीड़ और सुविधाओं की कमी के कारण मजबूरन लोगों को निजी अस्पताल जाना पड़ता है। वहां कई बार जांच और ऑपरेशन के लिए कहा जाता है, जो हमेशा जरूरी नहीं होते।
जब सरकारी व्यवस्था कमजोर पड़ी तो बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल इस खाली जगह में आ गए। 2023 में भारत में निजी इक्विटी निवेश (Private Equity Investment) स्वास्थ्य क्षेत्र में 5.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। मुनाफे की इस दौड़ में सुविधाओं की असमानता और पहुंच की कमी बढ़ती गई।
30% मामलों में कर्ज लेकर या जेवर बेचकर हुआ इलाज
2026 में ग्लोबल हार्ट (Global Heart) जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दिल की बीमारी जैसी गंभीर बीमारी में भारत में 70 फीसदी से ज्यादा मरीजों के पास महंगे इलाज और अस्पताल में भर्ती होने के लिए बीमा नहीं था। कुल स्वास्थ्य खर्च का 90 फीसदी ओओपीई से आता था। प्रति मरीज औसत ओओपीई 1 लाख 6 हजार 566 रुपए था।
30 फीसदी से ज्यादा मामलों में परिवारों को कर्ज लेना पड़ा, जेवर बेचने पड़े, यहां तक कि संपत्ति भी बेचनी पड़ी। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं है, यह लाखों परिवारों की त्रासदी है।
बीमा है, पर काफी नहीं
2025 तक सिर्फ 47.4 फीसदी ग्रामीण और 44.3 फीसदी शहरी परिवारों के पास किसी तरह का बीमा था। और जिनके पास है, उनका बीमा सब कुछ नहीं कवर करता।
डॉ. मेहता कहती हैं कि ज्यादातर बीमा योजनाएं (स्वास्थ्य बीमा योजना) सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने का खर्च देती हैं। दवाओं पर खर्च बाहर रहता है, जिसे लोगों को खुद चुकाना पड़ता है।
सरकार की आयुष्मान भारत योजना PMJAY शहरी और ग्रामीण गरीब परिवारों को पांच लाख रुपए तक का बीमा देती है। लेकिन गलत दस्तावेज, देरी से भुगतान, अस्पतालों की धोखाधड़ी और डिजिटल सुविधाओं पर अत्यधिक निर्भरता इस योजना की राह में रोड़ा बनती है।
मिसिंग मिडल की समस्या
डॉ. मेहता एक और बड़े संकट की ओर इशारा करती हैं, इसे वे मिसिंग मिडल (Missing Middle) कहती हैं। जो बहुत गरीब हैं, वे सरकारी योजना में आते हैं। जो बहुत अमीर हैं, वे निजी बीमा खरीद सकते हैं। लेकिन बीच का तबका, जो न इतना गरीब है कि सरकारी मदद मिले और न इतना अमीर कि महंगा बीमा खरीदे, वह सबसे ज्यादा मुश्किल में है।
सुप्रीम कोर्ट ने 4 मार्च 2025 को सभी राज्यों से कहा कि वे निजी अस्पतालों में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश बनाएं ताकि मरीजों का शोषण न हो। डॉ. मेहता कहती हैं कि इसे लागू करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि निजी क्षेत्र बड़ा और विविध है।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन एक्ट 2010 के तहत निजी और सरकारी अस्पतालों को हर इलाज के लिए तय दर से फीस लेना है। लेकिन इसे लागू करने में राज्य सरकारें पिछड़ रही हैं।
क्या हो सकता है समाधान?
भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2 फीसदी से कम है। केंद्रीय बजट 2026-27 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 1 लाख 4 हजार 559 करोड़ रुपए आवंटित हुए, जो जीडीपी का केवल 0.26 फीसदी है।
डॉ. मुनियंदी कहती हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नेटवर्क को मजबूत करना जरूरी है। मरीज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से बड़े अस्पताल तक आसानी से जा सके, ऐसी व्यवस्था हो। सरकार को बड़े पैमाने पर जांच और डायग्नोस्टिक सुविधाएं देनी होंगी।
पोलियो, HIV और टीबी के लिए जो मुफ्त इलाज की व्यवस्था है, उसे गैर-संचारी रोगों तक बढ़ाना होगा।
दवाओं की महंगाई रोकने के लिए जरूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची 2022 को और बड़ा करना होगा। अभी इसमें 384 दवाएं हैं और इनकी कीमतें बाजार आधारित फॉर्मूले से तय होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की आवश्यक दवाओं की सूची में 520 दवाएं हैं। कई जरूरी दवाएं भारत की राष्ट्रीय सूची में नहीं हैं।
डॉ. मेहता कहती हैं कि जो लोग खर्च उठा सकते हैं, उन्हें ज्यादा कवरेज वाला निजी बीमा लेना चाहिए। साथ ही एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट 1955 को दवाओं के अलावा स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ाना होगा ताकि बाजार की परिस्थितियों की परवाह किए बिना जरूरी इलाज मिल सके।
यह खबर क्यों जरूरी है?
स्वास्थ्य का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया है। जब इलाज के लिए लोगों को जेवर बेचने पड़ें या कर्ज में डूबना पड़े, तो यह अधिकार खोखला हो जाता है।
यह खबर बताती है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़ा संकट पनप रहा है, जो चुपचाप करोड़ों परिवारों को गरीबी की तरफ धकेल रहा है। 30 फीसदी से ज्यादा परिवारों का कर्ज लेकर इलाज कराना, डिजिटल और सामाजिक नैतिकता के नजरिए से भी गंभीर है क्योंकि सरकारी योजनाएं तकनीकी खामियों की वजह से लोगों तक नहीं पहुंच पातीं। नीति निर्माताओं, नागरिकों और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए यह एक जरूरी जागरण है।
साभार: thehindu
FAQ
- भारत में मेडिकल महंगाई इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
भारत में मेडिकल महंगाई के कई कारण हैं। नई तकनीक के आने से अस्पतालों में उपकरणों और दवाओं का खर्च बढ़ा है। विदेश से महंगे मेडिकल उपकरणों का आयात और वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाएं भी इसमें भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा निजी अस्पतालों की संख्या बढ़ने से मुनाफे की दौड़ में इलाज महंगा हुआ है। दवाओं की बढ़ती कीमतें और बढ़ती उम्र की आबादी में गैर-संचारी रोगों की बढ़ोतरी भी बड़े कारण हैं। एऑन की 2026 रिपोर्ट के अनुसार यह दर 12 से 13 फीसदी सालाना है। - आयुष्मान भारत योजना के बावजूद लोगों को इतना खर्च क्यों उठाना पड़ता है?
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) 12 करोड़ गरीब परिवारों को 5 लाख रुपए तक का बीमा देती है, लेकिन इसमें कई सीमाएं हैं। यह योजना केवल अस्पताल में भर्ती होने का खर्च देती है, दवाओं पर खर्च इसमें शामिल नहीं है। गलत दस्तावेज, भुगतान में देरी, अस्पतालों की धोखाधड़ी और डिजिटल सेवाओं पर निर्भरता इसकी राह में बाधाएं हैं। इसके अलावा एक बड़ा "मिसिंग मिडल" वर्ग है जो न सरकारी योजना में आता है और न महंगा निजी बीमा खरीद सकता है। - मेडिकल महंगाई से बचने के लिए आम आदमी क्या करे?
विशेषज्ञों के अनुसार जो लोग खर्च उठा सकते हैं, उन्हें ज्यादा कवरेज वाला निजी स्वास्थ्य बीमा लेना चाहिए। नियमित स्वास्थ्य जांच और स्वस्थ जीवनशैली से बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें क्योंकि वहां खर्च कम होता है। आयुष्मान भारत योजना में पात्र हैं तो जरूर नामांकन कराएं। सरकार से मांग करें कि आवश्यक दवाओं की सूची बढ़े और निजी अस्पतालों में दरें नियंत्रित हों।
ये खबरें भी पढ़ें...
मोदी, ममता और मुफ्त की राजनीति: 2026 के चुनाव में किन 10 फैक्टर ने काम किया!
क्यों लड़ रहीं दीदी अपने जीवन की सबसे बड़ी जंग, जानिए क्या होने जा रहा है बंगाल चुनाव में
खराब हेयरकट के बहाने निकाला था नौकरी से, अब पांच सितारा होटल को देना होगा 22.5 लाख का हर्जाना
इलाज के नाम पर सेहत से खिलवाड़, खांसी और इंफेक्शन की 7 दवाएं फेल, सरकार ने बिक्री पर लगाई रोक