कैंसर नहीं, अब Mental Health बनी सबसे बड़ी चिंता, Ipsos Survey 2025 ने 30 देशों के सर्वे में किया खुलासा
मानसिक स्वास्थ्य बड़ी समस्या
कैंसर से भी बड़ी चिंता अब मन की सेहत बन गई है। Ipsos सर्वे 2025 में 45% लोगों ने इसे चुना है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या माना है। यह 30 देशों का सर्वे है। इसमें कैंसर 41% के साथ दूसरे नंबर पर रहा है।
सोचिए एक बार, कल तक लोग इस बीमारी पर चुप रहते थे। आज वही सबसे ऊपर है।
समझें क्या है पूरा मामला
रिसर्च कंपनी Ipsos ने जुलाई-अगस्त 2025 में 30 देशों में सर्वे किया। इसमें 75 साल से कम उम्र के 23,172 वयस्कों की राय ली गई। 45% लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या बताया। कैंसर 41% पर दूसरे और तनाव 31% पर तीसरे नंबर पर रहा। Statista की Mental Health 2026 रिपोर्ट भी इसे आज की बड़ी चुनौती मानती है।
मेंटल हेल्थ संकट कितना बड़ा?
सर्वे में लोगों से एक सीधा सवाल पूछा गया है। आपके देश में सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या कौन सी है? जवाब में मानसिक स्वास्थ्य 45% के साथ सबसे ऊपर रहा।इसके बाद मोटापा 25% पर रहा है। नशीली दवाओं का सेवन 23% और डायबिटीज 19% पर दर्ज हुई है। शराब की लत और दिल की बीमारी, दोनों 16-16% पर रहीं।
यानी मेंटल हेल्थ संकट अब सिर्फ डॉक्टरों की चिंता नहीं है। आम लोग भी इसे सबसे ऊपर रख रहे हैं।
कैंसर को पीछे क्यों छोड़ा?
यह नतीजा चौंकाता है। 2023 में OECD के 37 देशों में मौत की दो सबसे बड़ी वजहें थीं। Statista के मुताबिक ये कैंसर और दिल की बीमारी थीं। OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) विकसित देशों का एक समूह है। फिर भी लोगों ने कैंसर से आगे मानसिक स्वास्थ्य को रखा है।
इसकी एक बड़ी वजह खुलापन है। मानसिक बीमारी से जुड़ी शर्म अब घट रही है। लोग इस पर खुलकर बात करने लगे हैं।
2018 में 27%, अब 45% पर आंकड़ा
Ipsos ने यह सर्वे 2018 में शुरू किया था। तब सिर्फ 27% लोगों ने इसे बड़ी समस्या माना था। उस वक्त यह तीसरे नंबर पर थी। अब यह आंकड़ा 45% पर पहुंच गया है।
आप सोच रहे होंगे, समस्या बढ़ी या सिर्फ जागरूकता? सीधे बात करें तो दोनों बातें साथ चल रही हैं। मामले बढ़ रहे हैं और लोग इन्हें पहचान भी रहे हैं।
तनाव तीसरे नंबर पर क्यों?
तनाव को सर्वे में अलग से 31% लोगों ने चुना है। यानी हर 10 में से करीब 3 लोग इसे बड़ी समस्या मानते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और तनाव को साथ देखें, तो तस्वीर साफ है। मन की सेहत लोगों की सबसे बड़ी फिक्र बन चुकी है।
भारत की तस्वीर क्या कहती है?
भारत की कहानी थोड़ी अलग है। Ipsos रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कैंसर को सबसे बड़ी समस्या माना गया है। बेल्जियम, इटली, पोलैंड और जापान भी इसी सूची में हैं।
दूसरी तरफ 30 में से 18 देशों में मानसिक स्वास्थ्य पहले नंबर पर रहा। चिली में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा 68% दर्ज हुआ।
भारत में डॉक्टर से बात करने वाले ज्यादा
Mental Health First Aid India ने एक और आंकड़ा सामने रखा है। उसके मुताबिक 26% भारतीयों ने मानसिक हालत पर जीपी से बात की। जीपी (GP – General Practitioner) यानी सामान्य डॉक्टर। संस्था इसे सर्वे वाले देशों में सबसे ज्यादा बताती है। (यह आंकड़ा अभी confirm नहीं हुआ है)
दफ्तर और अस्पताल पर बढ़ा बोझ
मानसिक बीमारी मरीज की पूरी दिनचर्या बदल देती है। रोज के छोटे काम भी पहाड़ जैसे लगने लगते हैं। लेकिन असर यहीं नहीं रुकता। इससे जुड़ी छुट्टियों से कंपनियों पर पैसे और कामकाज का दबाव बढ़ता है।
हेल्थ सिस्टम पर दबाव क्यों बढ़ा?
Statista के मुताबिक कई देशों के हेल्थ सिस्टम पहले से भारी दबाव में हैं। वहां डॉक्टरों और स्टाफ की लगातार कमी है। बढ़ते मामलों से निपटने के लिए वे तैयार नहीं हैं।
और यहीं से असली सवाल खड़ा होता है।
Statista रिपोर्ट में क्या खास?
Statista Mental Health 2026 रिपोर्ट दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य की पड़ताल करती है। इसमें बीमारी का फैलाव, आर्थिक असर और मुख्य दबाव शामिल हैं। डिजिटल जिंदगी का असर और इलाज तक पहुंच भी परखी गई है।
मानसिक विकार और भलाई में क्या फर्क?
रिपोर्ट दो चीजों को अलग-अलग देखती है। पहली है मानसिक विकार, यानी ऐसी बीमारी जिसे डॉक्टर पहचान सकें। दूसरी है मानसिक भलाई, यानी आप रोज कैसा महसूस करते हैं। आप अपना रोज का काम कैसे कर पाते हैं, यह भी इसी में आता है।
रिपोर्ट हेल्थकेयर, बीमा, डिजिटल हेल्थ और नीति बनाने वालों के लिए है। मकसद मानसिक सहायता को सबकी पहुंच में लाना है। साथ ही उसे असरदार और टिकाऊ बनाना है।
क्या हमारे अस्पताल और दफ्तर इसके लिए तैयार हैं? Ipsos सर्वे 2025 का संदेश साफ है। मन की सेहत अब सिर्फ निजी मामला नहीं रही है। यह हर देश की बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह सर्वे बताता है कि लोग अब मन की सेहत को शरीर जितना जरूरी मान रहे हैं। भारत में कैंसर की चिंता सबसे ऊपर है, पर मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट इसमें स्वास्थ्य के अधिकार को भी शामिल मान चुका है। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 इलाज तक पहुंच को हर नागरिक का हक बनाता है। इसलिए सरकार, दफ्तर और परिवार, तीनों की जिम्मेदारी बनती है।
FAQ
- Ipsos के 2025 के सर्वे में मानसिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या क्यों माना गया है?
Ipsos के 2025 के सर्वे में 45% लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या बताया है, जो कि चिंता का एक प्रमुख कारण बन गया है। - भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति क्या है, और इसे अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से कैसे तुलना की गई है?
भारत में मानसिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ी समस्या नहीं माना गया, बल्कि कैंसर को पहले स्थान पर रखा गया है। लेकिन वैश्विक स्तर पर 30 में से 18 देशों ने मानसिक स्वास्थ्य को सबसे बड़ी चिंता माना है। - मानसिक स्वास्थ्य की चिंता बढ़ने के पीछे के मुख्य कारण क्या हैं?
मानसिक स्वास्थ्य की चिंता बढ़ने के पीछे जागरूकता में वृद्धि और लोगों के बीच इस विषय पर खुलापन है। पहले की तुलना में लोग अब मानसिक बीमारी पर खुलकर बात कर रहे हैं, जिसके कारण इसे एक बड़ी समस्या माना जा रहा है।