वर्कप्लेस पर जाने के लिए आज भी पैदल चलने को मजबूर हैं कामकाजी महिलाएं, राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वे में हुआ खुलासा
क्या आपने कभी सोचा है कि महिलाएं वर्कप्लेस पर कैसे पहुंचती हैं? सुबह की धूप में पैदल चलती महिला को तो आपने देखा होगा। उसके चेहरे पर पसीना और हाथों में बैग होता है। वह हर रोज कई किलोमीटर पैदल चलती है। यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है। देश की आधी आबादी का यही हाल है। केंद्र सरकार ने एक खास सर्वे कराया है।
इस सर्वे का नाम राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वे (National Domestic Travel Survey) है। इस रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले सच खोले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में औसतन 51 फीसदी कामकाजी महिलाएं आज भी काम पर जाने के लिए पैदल ही सफर तय करती हैं। एमपी में तो ये स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। यहां 100 में से 79 महिलाएं पैदल काम पर जाती हैं और राज्य पूरे देश में तीसरे नंबर पर है।
नगालैंड 86 फीसदी और बिहार 81 फीसदी के साथ इस लिस्ट में सबसे आगे हैं। इस सर्वे में ये बात भी साफ हुई है कि दोपहिया वाहनों की चाबी आज भी घर के पुरुषों के पास ही रहती है। वर्कप्लेस तक पहुंचने का ये संघर्ष लैंगिक समानता (Gender Equality) पर बड़े सवाल खड़े करता है।
वाहनों की चाबी पुरुषों के पास
महिलाओं से इसकी वजह पूछी गई तो जवाब चौंकाने वाला था। कई महिलाएं अपनी खुशी से गाड़ी नहीं चलाना चाहतीं। लेकिन इससे भी बड़ी एक और वजह सामने आई है। घर की गाड़ियों की चाबी आज भी पुरुषों के पास है।
इस रिपोर्ट में एमपी के मंदसौर की एक सच्ची घटना सामने आई। लोक अदालत में पति-पत्नी का एक विवाद पहुंचा। दोनों कपड़े की एक ही दुकान पर काम करते थे। पत्नी ने अपनी सैलरी जोड़कर पर्पल रंग की स्कूटी खरीदी। वह घर का काम निपटाकर निकलने लगती थी।
लेकिन पति स्कूटी लेकर अकेला निकल जाता था। पत्नी को पैदल या बस से जाना पड़ता था। इस बात पर विवाद बढ़ा और बात तलाक तक पहुंच गई। हालांकि बाद में जज ने दोनों का समझौता करा दिया गया।
गांव और शहर में बड़ा अंतर
सर्वे में गांव और शहर का अंतर भी साफ दिखता है। एमपी के गांवों में 89 फीसदी महिलाएं पैदल चलती हैं। सिर्फ पांच फीसदी महिलाएं दोपहिया का यूज करती हैं। शहरों में स्थिति थोड़ी बेहतर नजर आती है।
शहरों में 41 फीसदी महिलाएं पैदल चलती हैं। वहीं 30 फीसदी महिलाएं दोपहिया से काम पर जाती हैं। यानी शहर की महिलाएं गांव से छह गुना आगे हैं। छत्तीसगढ़ के गांवों में 83 फीसदी महिलाएं पैदल जाती हैं।
शहरों में यह संख्या घटकर 39 फीसदी रह जाती है। राजस्थान के गांवों में 72 फीसदी महिलाएं पैदल चलती हैं। शहरों में 27 फीसदी महिलाएं ही पैदल जाती हैं। गुजरात के गांवों में 59 फीसदी महिलाएं पैदल चलती हैं। शहरों में यह आंकड़ा 22 फीसदी ही है। हर राज्य में गांव की महिलाएं पिछड़ी हुई हैं।
बस और ऑटो का इस्तेमाल
पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल में भी अंतर दिखता है। एमपी के गांवों में केवल चार फीसदी महिलाएं बस-ऑटो लेती हैं। शहरों में 26 फीसदी महिलाएं इनका यूज करती हैं। पुरुष इस मामले में महिलाओं से पीछे हैं।
दोपहिया वाहनों के मामले में पुरुष काफी आगे हैं। गुजरात में 57 फीसदी पुरुष दोपहिया से जाते हैं। जबकि वहां सिर्फ 27 फीसदी महिलाएं दोपहिया चलाती हैं। राजस्थान में 56 फीसदी पुरुष दोपहिया का प्रयोग करते हैं। वहां केवल 25 फीसदी महिलाएं ही दोपहिया चलाती हैं।
छत्तीसगढ़ में 43 फीसदी पुरुष दोपहिया का उपयोग करते हैं। वहां सिर्फ 14 फीसदी महिलाएं ही दोपहिया चलाती हैं। एमपी में 40 फीसदी पुरुष दोपहिया से सफर करते हैं। एमपी में सिर्फ 18 फीसदी महिलाएं दोपहिया चलाती हैं।
चारों राज्यों में पुरुष महिलाओं से काफी आगे हैं। महिलाओं को आज भी खुद के साधन की जरूरत है। क्या आने वाले सालों में यह तस्वीर बदलेगी? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर इसलिए जरूरी है क्योंकि बराबरी सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं होती। काम पर पहुंचने का साधन भी मायने रखता है। इससे तय होता है कि महिला कितना समय और पैसा बचा पाती है। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी को बराबरी का अधिकार देता है। चाबी एक ही हाथ में रहे, तो सवाल बराबरी का बन जाता है। सार्वजनिक परिवहन की योजनाओं के लिए भी ये संख्याएं काम की हैं।
FAQs:
- भारत में महिलाएं वर्कप्लेस पर कैसे पहुंचती हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में औसतन 51 फीसदी महिलाएं काम पर जाने के लिए पैदल चलकर जाती हैं। - कौन से राज्य में सबसे अधिक महिलाएं पैदल काम पर जाती हैं?
मध्य प्रदेश (एमपी) में 100 में से 79 महिलाएं पैदल काम पर जाती हैं, जो कि सबसे अधिक है। - महिलाओं के वाहन चलाने में पुरुषों की भूमिका क्या है?
सर्वे से यह स्पष्ट हुआ है कि अधिकांश घर की गाड़ियों की चाबी पुरुषों के पास होती है, जिससे महिलाओं को अपने परिवहन के साधनों की कमी का सामना करना पड़ता है।