SC की तल्ख टिप्पणी: पत्नी नौकरानी नहीं, महिलाएं देश की नेशन बिल्डर हैं

Anjali Dwivedi | Jun 11, 2026, 16:56 IST
महिलाएं देश की नेशन बिल्डर हैं
सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को नेशन बिल्डर बताते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया है। सड़क हादसे में उनकी मौत या घायल होने पर मुआवजे के लिए घरेलू काम की कीमत कम से कम 30 हजार रुपए महीना मानी जाएगी।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा- घर संभालने वाली महिलाएं राष्ट्र निर्माता हैं।
  • हादसे में मौत पर गृहिणियों का काल्पनिक वेतन 30 हजार महीना माना जाएगा।
  • मुआवजा तय करते समय गृहिणी की उम्र, योग्यता और काम का ध्यान रखें।
  • कोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटना के दावों का निपटारा 1 साल में होना चाहिए।
  • तय समय में मामलों के निपटारे के लिए चीफ जस्टिस खुद निगरानी करें।

देशभर में सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों के परिवारों को मुआवजा देने पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता (नेशन बिल्डर) का दर्जा मिलना चाहिए। कोर्ट के अनुसार गृहिणियों के कार्यों की तुलना किसी पेशेवर से करके उनका योगदान कम नहीं आंक सकते हैं।



जस्टिस संजय करोल और न्यायाधीश एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने इस संबंध में नए दिशा-निर्देश तय किए हैं। पीठ ने कहा कि हादसे में गृहिणी की मौत पर उनके घरेलू काम की कीमत कम से कम 30 हजार रुपए प्रति महीना मानी जाएगी। वार्षिक आधार पर यह राशि 3.6 लाख रुपए होगी, जो प्रणय सेठी मामले के तय नियमों के अतिरिक्त जोड़ी जाएगी।



क्या थे पुराने नियम और उनमें बदलाव?

सड़क हादसों के मामलों में अब तक देश की अदालतें और ट्रिब्यूनल मुआवजा तय करने के लिए एक काल्पनिक आय मानती थीं। इसके लिए संबंधित राज्य के न्यूनतम वेतन को आधार बनाया जाता था, जो आमतौर पर बहुत कम होता था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए गृहिणियों के योगदान को बड़ा सम्मान दिया है।



सुप्रीम कोर्ट की 5 मुख्य बातें

  • गृहिणी का काम सिर्फ खाना बनाना या बच्चे संभालना नहीं है, वह पूरे परिवार की मजबूत नींव तैयार करती है।
  • मुआवजा तय करते समय गृहिणी की उम्र, शिक्षा, कौशल, पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक हालात का ध्यान रखना जरूरी है।
  • दुर्घटना में मौत या घायल होने पर परिवार को केवल आय न होने के आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
  • मुआवजे की रकम न तो छप्परफाड़ लॉटरी जैसी हो और न ही इतनी कम हो कि पीड़ित का मजाक बने।
  • सड़क दुर्घटना के दावों का निपटारा आमतौर पर किसी भी हाल में एक साल के भीतर हो जाना चाहिए।
supreme court judgement


25 साल पुराने पंजाब के मामले पर आया निर्णय

यह ऐतिहासिक फैसला पंजाब के एक मोटर एक्सीडेंट दावे की लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया है। नवंबर 2001 में रेशमा नामक महिला की सड़क हादसे में मौत हुई थी, जिसके बाद पति और बच्चों ने ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। ट्रिब्यूनल ने साल 2003 में मुआवजा दिया था, लेकिन यह मामला कानूनी पेचीदगियों में सालों तक उलझा रहा।



पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने दिसंबर 2024 में 8 लाख रुपए से ज्यादा मुआवजा देने का आदेश जारी किया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां दो दशक से अधिक समय लगने पर कोर्ट ने गहरी आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दावे पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला आ जाना चाहिए। पीठ ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से खुद ऐसे मामलों की निगरानी करने की विशेष अपील भी की है।



क्या है प्रणय सेठी मामला?

प्रणय सेठी केस मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून का एक मील का पत्थर है, जिसे संविधान पीठ ने 2017 में तय किया था। दरअसल, अलग-अलग अदालतें मुआवजा तय करने के लिए भिन्न तरीके अपना रही थीं, जिससे मुआवजे की राशि में भारी अंतर आता था। सुप्रीम कोर्ट ने इस विसंगति को दूर करने के लिए देशभर में एक समान और न्यायसंगत सिद्धांत प्रतिपादित किया था।



इस सिद्धांत के तहत मुआवजा तय करते समय वर्तमान आय ही नहीं, बल्कि भविष्य में आय बढ़ने की संभावना भी जोड़ी जाती है। इसके अलावा अंतिम संस्कार, संपत्ति की हानि और जीवनसाथी के जुड़ाव की हानि के लिए भी तय मानक निर्धारित किए गए हैं।



FAQ

  1. सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के अनुसार गृहिणियों का मासिक मुआवजा कितना तय किया गया है?
    सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, किसी सड़क हादसे में गृहिणी की मौत होने पर उनके घरेलू काम और योगदान की कीमत कम से कम 30 हजार रुपए प्रति महीना (3.6 लाख रुपए सालाना) मानी जाएगी।
  2. मुआवजा तय करते समय अदालतें गृहिणी के किन पैमानों का आकलन करेंगी?
    कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गृहिणियों की आय का आकलन करते समय केवल उनके काम को नहीं, बल्कि उनकी उम्र, शैक्षणिक योग्यता, कौशल (स्किल), पारिवारिक जिम्मेदारियों और उनके परिवार के आर्थिक हालात को भी विशेष रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  3. मोटर एक्सीडेंट क्लेम के निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या समय-सीमा तय की है?
    सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सड़क दुर्घटना से जुड़े दावों का निपटारा आमतौर पर एक साल के भीतर अनिवार्य रूप से हो जाना चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से खुद इन मामलों की निगरानी करने की अपील की है।

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