NCERT की किताब विवाद में नया खुलासा: 15 लोगों की टीम ने बनाई बुक
News In Short
- NCERT की 8वीं क्लास की किताब में न्यायपालिका भ्रष्टाचार वाला चैप्टर जोड़ा गया था।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस चैप्टर पर आपत्ति जताई और NCERT को फटकार लगाई थी।
- किताब वापस लेने का आदेश दिया गया और तीन एक्सपर्ट्स को ब्लैकलिस्ट किया गया था।
- ब्लैकलिस्ट एक्सपर्ट्स ने 06 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में अपनी सफाई दी थी।
- एक्सपर्ट्स ने कहा कि यह किताब 15 सदस्यों की टीम ने मिलकर तैयार की थी।
News In Detail
किताब में क्या था विवादित?
NCERT (National Council of Educational Research and Training) की नई किताब एक्सप्लोरिंग सोसायटी में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक से एक टॉपिक जोड़ा गया था। इसमें लिखा था कि लोग अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करते हैं।
किताब में चार करोड़ 70 लाख से ज्यादा लंबित मामलों का जिक्र था। इसके साथ इंसाफ में देरी और इंसाफ न मिल पाने जैसी बातें भी कही गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस चैप्टर में न्यायपालिका को अधिकारों के रक्षक के रूप में बिल्कुल पेश नहीं किया गया है। यही मुख्य आपत्ति थी।
किताब में CPGRAMS (Centralized Public Grievances Redress and Monitoring System) के जरिए शिकायतें दर्ज करने की प्रक्रिया भी बताई गई थी। 2017 से 2021 के बीच इस सिस्टम पर एक हजार 600 से ज्यादा शिकायतें दर्ज होने का उल्लेख था। साथ ही जजों के खिलाफ संसद में इंपीचमेंट मोशन (महाभियोग) की प्रक्रिया भी समझाई गई थी।
कोर्ट ने क्यों लिया एक्शन?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया था। कोर्ट ने NCERT को आदेश दिया कि किताब वापस ली जाए। इसके साथ ही तीन एक्सपर्ट्स पर सख्त कार्रवाई हुई है। प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार को भविष्य में किसी भी स्कूली या अन्य सिलेबस तैयार करने से रोक दिया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन्हें किसी सरकारी संस्था में एकेडमिक सेवाएं देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने तीनों को अपनी सफाई देने का मौका खुला रखा है।
एक्सपर्ट्स ने कोर्ट में क्या कहा?
06 अप्रैल को तीनों एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था। इसमें सबसे पहली बात यह कही गई कि यह किताब सिर्फ तीन लोगों ने नहीं बनाई थी। इसे 15 सदस्यों की एक पूरी टीम ने मिलकर तैयार किया था।
एक्सपर्ट्स ने यह भी कहा कि इस चैप्टर का मकसद अदालत या किसी भी संस्था का अपमान करना नहीं था। उनके अनुसार यह चैप्टर दरअसल सकारात्मक था। इसमें मानवाधिकारों की रक्षा और गलत कानूनों को रद्द करने के उदाहरण शामिल थे। पर्यावरण से जुड़े मामलों में जस्टिस कुलदीप सिंह के काम का भी जिक्र इसमें था।
40 सदस्यों का था गूगल ग्रुप
प्रोफेसर मिशेल डैनिनो ने NCERT के डायरेक्टर दिनेश प्रसाद सक्लानी के दावे को चुनौती दी है। सक्लानी ने कहा था कि ड्राफ्ट कमेटी के सदस्यों के बीच शेयर किया गया था। डैनिनो ने बताया कि सिलेबस बनाने की शुरुआत में ही 40 से ज्यादा सदस्यों का एक गूगल ग्रुप बनाया गया था। यह पूरी प्रक्रिया एक सामूहिक निर्णय पर आधारित थी, न कि किसी एक व्यक्ति के फैसले पर।
सुपर्णा दिवाकर की भूमिका पर सफाई
हलफनामे में यह भी स्पष्ट किया गया कि सुपर्णा दिवाकर की किताब का ड्राफ्ट तैयार करने में कोई सीधी भूमिका नहीं थी। वह केवल रिसर्च, एडिटिंग और कॉर्डिनेशन में मदद कर रही थीं। यानी ड्राफ्टिंग का काम उनके जिम्मे नहीं था।
पद्म भूषण सम्मानित विदुषी कर रही थीं निगरानी
मिशेल डैनिनो ने बताया कि पद्म भूषण से सम्मानित NCERT की सह-अध्यक्ष मंजुल भार्गव भी इस कंटेंट की मॉनिटरिंग कर रही थीं। इसके अलावा NSTC (National Steering Committee) और NOC (National Oversight Committee) के कई सदस्य भी इस पूरी प्रक्रिया में लगातार शामिल थे। यानी यह कोई लापरवाही से तैयार की गई किताब नहीं थी।
किताब का सकारात्मक पक्ष क्या था?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक किताब में न्यायपालिका की कमियों के साथ-साथ उसकी खूबियां भी बताई गई थीं। यह दिखाया गया था कि जज एक आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) के तहत काम करते हैं। यह संहिता कोर्ट के अंदर और बाहर दोनों जगह उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है। किताब में यह भी लिखा था कि राज्य और केंद्र सरकारें पारदर्शिता बढ़ाने के लिए काम कर रही हैं। इसमें टेक्नोलॉजी का उपयोग और भ्रष्टाचार के मामलों पर त्वरित कार्रवाई जैसी बातें शामिल थीं।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट अब तीनों एक्सपर्ट्स के हलफनामे पर विचार करेगा। इसके बाद तय होगा कि इन पर लगे प्रतिबंध जारी रहेंगे या हटाए जाएंगे। यह मामला सिर्फ एक किताब का नहीं है। यह इस बात की भी बहस है कि स्कूली पाठ्यक्रम में किन विषयों को कितनी गहराई से और किस नजरिए से पढ़ाया जाना चाहिए।
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