एक देश एक चुनाव की तैयारी: चुनाव के हर खर्च का लगाया जा रहा हिसाब, MP, CG और राजस्थान के 10 विभागों से मांगी जानकारी
एक देश एक चुनाव पर राज्यों से सवाल
दरअसल वन नेशन वन इलेक्शन पर बनी संसदीय समिति ने राज्यों से हिसाब मांगा है। सवाल सीधा है। बार-बार चुनाव का खर्च कितना आता है? सूत्रों के मुताबिक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को भी पत्र मिला है। समिति जानना चाहती है कि हर चुनाव में कितना पैसा लगता है। साथ ही, कितने विभाग इसमें जुटते हैं। सूत्रों के मुताबिक, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों तरह का बोझ पूछा गया है।
यानी खर्च के साथ कामकाज पर पड़ा असर भी गिना जाएगा। एक देश एक चुनाव की बहस में यह आंकड़ा अहम होगा।
इन 10 विभागों से मांगी जानकारी
सूत्रों के मुताबिक, गृह, स्कूल शिक्षा, नगरीय निकाय और पंचायत विभाग सूची में हैं। कृषि, तकनीकी शिक्षा, पर्यटन और राजस्व विभाग से भी जानकारी मांगी गई है। स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास विभाग से भी ब्योरा मांगा गया है।
मध्य प्रदेश चुनाव खर्च में किसका कितना बोझ?
चुनाव में सबसे बड़ी जिम्मेदारी गृह विभाग की होती है। सुरक्षा के लिए पूरा पुलिस अमला लगता है।
तकनीकी शिक्षा विभाग के संस्थान भी चुनाव में काम आते हैं। इनकी इमारतों में मतपेटियां रखी जाती हैं। स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षक मतदान कराने जाते हैं।
स्वास्थ्य विभाग से डॉक्टर ड्यूटी पर लगते हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भी ड्यूटी लगती है। मध्य प्रदेश चुनाव खर्च का असली हिसाब इन्हीं विभागों के आंकड़ों से बनेगा।
खेती पर भी पड़ता है चुनाव का असर
दिलचस्प है कि कृषि विभाग से भी जानकारी मांगी गई है। सूत्रों के मुताबिक, विभाग से खेती पर असर पूछा गया है। सूत्रों का कहना है कि चुनाव के मौसम में कई किसान बोनी छोड़कर प्रचार में लग जाते हैं। इसका असर फसल पर पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सबसे ज्यादा चुनाव ग्रामीण क्षेत्र में ही होते हैं। जैसे सरपंच, मंडी, जनपद और जिला पंचायतों के चुनावों में कृषि से जुड़े हुए लोग ही शामिल होते हैं। सिर्फ नगरीय निकाय के चुनावों में ही ग्रामीणों की सीधी भागीदारी नहीं होती है।
गृह विभाग का डेटा अब तक नहीं पहुंचा
सूत्रों के मुताबिक, सबसे अहम मप्र के गृह विभाग का डेटा अब तक नहीं पहुंचा है। इस पर सामान्य प्रशासन विभाग (GAD - General Administration Department) ने रिमाइंडर भेजा है।बड़ा सवाल यह है कि जिस विभाग का पूरा अमला चुनाव में लगता है, उसी का हिसाब बाकी है।
केंद्र के मंत्रालयों से 27 सवाल
यह कवायद सिर्फ राज्यों तक सीमित नहीं है। ONOE JPC केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों से भी राय ले रही है। इसके लिए 27 सवालों वाली प्रश्नावली तैयार की गई है।
लोकसभा सचिवालय ने आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय से भी जवाब मांगा है। अंग्रेजी में इसे एमओएचयूए (MoHUA - Ministry of Housing and Urban Affairs) कहते हैं। मंत्रालय के एक विभाग को कार्यालय ज्ञापन भेजा गया। उसे 15 सितंबर तक जवाब देने को कहा गया था।
जेपीसी प्रश्नावली में क्या पूछा गया?
JPC questionnaire में पिछले 10 साल का हिसाब मांगा गया है। सवाल है कि अलग-अलग समय पर हुए चुनावों से कामकाज कैसे प्रभावित हुआ। जेपीसी प्रश्नावली में परियोजनाओं और सार्वजनिक सेवाओं पर असर भी पूछा गया है।
समिति ने उदाहरण और असर का मात्रात्मक आकलन (आंकड़ों में हिसाब) भी मांगा है। क्या कोई योजना टली, बदली या टुकड़ों में लागू हुई?
आदर्श आचार संहिता का असर भी जांच में
प्रश्नावली में आचार संहिता पर अलग सवाल है। इसे एमसीसी (MCC - Model Code of Conduct) भी कहते हैं। पूछा गया है कि क्या इससे नीति बनाने में रुकावट आई। मंजूरियों और योजनाओं को लागू करने पर असर भी पूछा गया है। यानी आदर्श आचार संहिता का असर भी आंकड़ों में दर्ज होगा।
चुनाव ड्यूटी में कर्मचारी कितने लगे?
समिति ने चुनाव ड्यूटी में कर्मचारी तैनाती का ब्योरा भी मांगा है। पूछा गया है कि इससे नियमित कामकाज पर असर पड़ा या नहीं। यह भी जानना है कि बाकी कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ा या नहीं।
कब पेश हुए वन नेशन वन इलेक्शन बिल?
One Nation One Election के दो विधेयक 17 दिसंबर 2024 को लोकसभा में आए। पहला संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 है। दूसरा केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 है।
बाद में दोनों विधेयक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजे गए। इस समिति के अध्यक्ष लोकसभा सांसद पी.पी. चौधरी हैं। समिति simultaneous elections यानी एक साथ चुनाव के फायदे और चुनौतियां परख रही है।
क्या राज्यों के आंकड़े election cost India की पूरी तस्वीर साफ करेंगे? इसका जवाब समिति की रिपोर्ट में मिलेगा।
यह खबर क्यों जरूरी है:
चुनाव लोकतंत्र की नींव हैं, पर इनका खर्च जनता के टैक्स से चलता है। हर चुनाव में शिक्षक, डॉक्टर और पुलिस अपना नियमित काम छोड़कर ड्यूटी करते हैं। एक साथ चुनाव के समर्थक इसे खर्च और समय की बचत मानते हैं। विरोध करने वालों को संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों पर असर की चिंता है। राज्यों से आए आंकड़े इस बहस को तथ्यों पर टिकाएंगे। इसलिए हर विभाग का सही डेटा जरूरी है।
FAQs
- वन नेशन वन इलेक्शन पर जेपीसी राज्यों से क्या जानकारी मांग रही है?
जेपीसी बार-बार चुनाव से होने वाले खर्च और कामकाज पर असर की जानकारी मांग रही है। सूत्रों के मुताबिक, विधानसभा के साथ पंचायत, नगरीय निकाय और मंडी चुनाव का ब्योरा भी मांगा गया है। - किन विभागों से चुनाव खर्च की जानकारी मांगी गई है?
सूत्रों के मुताबिक, 10 विभागों से जानकारी मांगी गई है। इनमें गृह, स्कूल शिक्षा, नगरीय निकाय, पंचायत, कृषि, तकनीकी शिक्षा, पर्यटन, राजस्व, स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास विभाग शामिल हैं। - वन नेशन वन इलेक्शन बिल कब पेश हुए?
दोनों विधेयक 17 दिसंबर 2024 को लोकसभा में पेश हुए थे। बाद में इन्हें पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया।