पीएम मोदी का महिलाओं के नाम पत्र: नारी वंदन अधिनियम पर कहा- बेटियों को हक के लिए इंतजार नहीं करा सकते
News In Short
- PM मोदी ने 14 अप्रैल को महिलाओं के नाम खुला पत्र लिखा है।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर संसद में 18 सितंबर से चर्चा होगी।
- पीएम ने 2029 के चुनावों में महिला आरक्षण लागू करने की बात कही है।
- PM ने महिलाओं से सांसदों को पत्र लिखने का आग्रह किया है।
- तीन दशकों की कोशिशों के बाद भी यह कानून अधूरा रहा है।
News In Detail
PM मोदी का महिलाओं के नाम पत्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल को देशभर की महिलाओं के नाम एक खुला पत्र लिखा है। आज डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती है। ऐसे में पीएम ने पत्र की शुरुआत में अंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की है।
पीएम मोदी ने लिखा कि संवैधानिक मूल्यों की इसी भावना के साथ संसद में 18 सितंबर से नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) पर चर्चा शुरू होने जा रही है। उन्होंने महिलाओं से इस ऐतिहासिक कदम के लिए आशीर्वाद मांगा है।
2029 चुनाव और महिला आरक्षण
PM मोदी ने पत्र में साफ कहा कि यदि 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण के साथ होते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र और भी मजबूत बनेगा।
उन्होंने लिखा कि इस विधेयक के पारित होने में किसी भी तरह की देरी दुर्भाग्यपूर्ण होगी। उनके शब्द थे कि देश की बेटियों को उनके हक के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं कराया जा सकता।
तीन दशकों की अधूरी कोशिश
PM मोदी ने पत्र में इतिहास का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि करीब सौ साल पहले सरदार वल्लभभाई पटेल ने अहमदाबाद नगरपालिका में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की पहल की थी। आजादी के बाद से ही महिलाओं को मतदान का समान अधिकार मिला, जबकि दुनिया के कई देशों में यह अधिकार पाने में सदियां लग गईं।
पीएम ने यह भी स्वीकार किया कि पिछले तीन से चार दशकों में विधायी संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिशें हुईं, लेकिन वे सफल नहीं हो सकीं। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
हर क्षेत्र में आगे हैं महिलाएं
मोदी ने पत्र में महिलाओं की उपलब्धियों का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि विज्ञान, इनोवेशन, स्टार्टअप, शिक्षा, साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा और खेल हर जगह महिलाएं अपनी पहचान बना रही हैं।
खेल के मैदान पर भारतीय महिला खिलाड़ी अधिक मेडल जीत रही हैं। वे नए रिकॉर्ड बना रही हैं और पुरानी सोच को बदल रही हैं। जमीनी स्तर पर काम करने वाले सेल्फ हेल्प ग्रुप और लखपति दीदियों ने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है।
महिलाओं से खास अपील
PM मोदी ने पत्र के अंत में महिलाओं से सीधी अपील की। उन्होंने कहा कि वे अपने स्थानीय सांसदों को पत्र लिखें। उन्हें इस ऐतिहासिक संसद सत्र में उत्साह के साथ हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करें।
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि इस संविधान संशोधन को सदियों तक याद किया जाएगा। उन्होंने विश्वास जताया कि पूरा सदन मिलकर इस बदलाव को पारित करेगा।
विकसित भारत और नारी शक्ति
PM ने 2047 का भी जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जब देश अपनी आजादी के 100 साल पूरे करेगा, तब तक विकसित भारत के निर्माण में नारी शक्ति की पूरी भागीदारी जरूरी है। जब महिलाएं नीति-निर्माण में सक्रिय होंगी, तब यह यात्रा और तेज होगी।
2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ था। अब जो संविधान संशोधन आने वाला है, वह उसी कानून को जमीन पर उतारने की दिशा में अगला कदम है।
महिला आरक्षण से जुड़ी खास बात...
संसद में बार-बार अटका महिला आरक्षण
भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा तीन दशकों से सत्ता, सहमति और सामाजिक सोच के टकराव की कहानी बना हुआ है। 1990 के दशक में जब यह सवाल पहली बार गंभीरता से उठा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए, तब से लेकर वर्ष 2023 तक यह विषय हर सरकार के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा रहा। हर बार उम्मीद जगी, हर बार बहस हुई, लेकिन हर बार राजनीति की खींचतान ने इसे रोक दिया।
1. पहली बार: एच. डी. देवेगौड़ा सरकार (1996)
12 सितंबर 1996 को महिला आरक्षण विधेयक पहली बार लोकसभा में पेश हुआ था। इसे 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में लाया गया। यह वह समय था, जब देश गठबंधन राजनीति के दौर में प्रवेश कर चुका था और हर बड़े फैसले के लिए व्यापक सहमति जरूरी हो गई थी।
जैसे ही यह विधेयक सदन में आया, वैसे ही इसका विरोध भी तेज हो गया। कई दलों ने इसे सामाजिक संतुलन के नजरिए से अधूरा बताया तो कुछ ने इसमें पिछड़े वर्गों के लिए अलग कोटे की मांग उठाई। स्थिति इतनी जटिल हो गई कि सरकार को इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजना पड़ा।
यहीं से साफ हो गया कि यह मुद्दा महिला सशक्तिकरण का नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बन चुका है। यह वह बिंदु था, जहाँ से महिला आरक्षण की लंबी और उलझी हुई यात्रा शुरू हुई।
2. दूसरी बार: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (1998–2003)
1998 से 2003 के बीच का दौर महिला आरक्षण के लिए सबसे ज्यादा राजनीतिक हलचल वाला रहा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने कई बार इस विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन हर बार यह सियासी असहमति की भेंट चढ़ गया।
- 1998: 12वीं लोकसभा में इसे 84वें संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता के कारण सदन भंग हो गया और विधेयक स्वतः निरस्त हो गया।
- 1999: 13वीं लोकसभा में इसे फिर पेश किया गया। बहस भी हुई, लेकिन सर्वसम्मति नहीं बन सकी।
- 2002 और 2003: सरकार ने एक बार फिर प्रयास किए, लेकिन हर बार विरोध और हंगामे ने रास्ता रोक दिया।
इस दौर में संसद के भीतर कई बार तीखी नोकझोंक और हंगामे की स्थिति बनी। कुछ सांसदों ने विधेयक की प्रतियां तक फाड़ दीं। यह साफ संकेत था कि मुद्दा जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही विवादास्पद भी हो चुका था। राजनीतिक दलों के बीच यह सहमति नहीं बन पा रही थी कि आरक्षण का स्वरूप कैसा हो, किन वर्गों को कितना हिस्सा मिले और क्या इसमें अन्य सामाजिक समीकरणों को भी शामिल किया जाए। परिणाम यह हुआ कि बार-बार कोशिशों के बावजूद विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।
3. तीसरी बार: मनमोहन सिंह सरकार (2008–2010)
यूपीए सरकार के दौर में महिला आरक्षण को लेकर ठोस प्रगति देखने को मिली। मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार ने रणनीति बदली और विधेयक को राज्यसभा में पेश किया। मई 2008 में 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में इसे राज्यसभा में पेश किया गया। इस कदम के पीछे सोच यह थी कि राज्यसभा एक स्थायी सदन है, इसलिए लोकसभा भंग होने पर भी विधेयक समाप्त नहीं होगा।
इसके बाद 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने ऐतिहासिक मतदान के बाद इस विधेयक को पारित कर दिया। यह महिला आरक्षण के इतिहास का सबसे बड़ा क्षण था। ऐसा पहली बार हुआ जब यह विधेयक संसद के किसी सदन से पास हुआ, लेकिन इसके बाद भी रास्ता आसान नहीं हुआ। लोकसभा में इसे पेश करने से पहले ही राजनीतिक माहौल बिगड़ गया।
कई दलों का विरोध जारी रहा और सरकार को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। आखिरकार यह विधेयक लोकसभा में पेश ही नहीं हो पाया। जब 2014 में लोकसभा भंग हुई, तो यह विधेयक एक बार फिर लैप्स हो गया। यह वह मोड़ था, जहां उम्मीदें सबसे ज्यादा थीं, लेकिन परिणाम फिर अधूरा रह गया।
4. आखिरकार मंजिल: नरेंद्र मोदी सरकार (2023)
करीब 27 साल तक चली राजनीतिक खींचतान, बहस और असहमति के बाद 2023 में महिला आरक्षण विधेयक को उसका मुकाम मिला। नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे नए संसद भवन में विशेष सत्र के दौरान पेश किया, जो अपने आप में एक प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक कदम था।
- 19 सितंबर 2023: 128वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश।
- 20 सितंबर 2023: लोकसभा में भारी बहुमत (454 पक्ष में, 2 विरोध में) से पारित।
- 21 सितंबर 2023: राज्यसभा ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी।
- 29 सितंबर 2023: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद यह 106वां संविधान संशोधन अधिनियम बन गया।
इस बार जो सबसे बड़ा अंतर दिखा, वह था व्यापक राजनीतिक समर्थन। जिन मुद्दों पर पहले सहमति नहीं बन पाती थी, वे इस बार बड़े स्तर पर सुलझते नजर आए। यह एक विधेयक के पारित होने की घटना नहीं थी, बल्कि यह उस लंबी राजनीतिक यात्रा का अंत था, जो 1996 में शुरू हुई थी।
ये खबर भी पढ़िए...
देश की संसद नया इतिहास रचने के करीब है, नारी शक्ति वंदन सम्मेलन में पीएम मोदी बोले
पीएम मोदी ने TMC पर साधा निशाना, बोले-मदरसों के लिए 6 हजार करोड़ रुपए दिए
पीएम मोदी का बड़ा बयान: 'बंगाल की जनता TMC का अहंकार चकनाचूर करेगी