क्या होता है पल्मोनरी एम्बोलिज्म, जिसने ली 38 साल के फिट प्रतीक यादव की जान?
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक यादव की 38 साल की उम्र में पल्मोनरी एम्बोलिज्म और दिल से जुड़ी जटिलताओं के कारण हुई मौत ने पूरे देश को चौंका दिया है। फिटनेस को लेकर सजग रहने वाले प्रतीक की अचानक मौत ने एक बार फिर उस खतरनाक मेडिकल इमरजेंसी की तरफ ध्यान खींचा है, जो बिना ज्यादा चेतावनी के हमला करती है और समय पर इलाज न मिले तो कुछ ही मिनटों में जान ले सकती है।
नई दिल्ली स्थित फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के प्रिंसिपल डायरेक्टर (कार्डियोलॉजी) डॉ. निशिथ चंद्र कहते हैं, पल्मोनरी एम्बोलिज्म हार्ट अटैक से अलग बीमारी है। हार्ट अटैक में दिल तक खून पहुंचाने वाली नस ब्लॉक होती है, जबकि पल्मोनरी एम्बोलिज्म में खून का थक्का फेफड़ों तक खून ले जाने वाली धमनी को बंद कर देता है। डॉक्टर इसे शरीर के सबसे अहम ब्लड हाईवे पर अचानक लगने वाले जाम जैसा बताते हैं।
आखिर शरीर में क्या होता है?
इंसान का दिल हर मिनट करीब 60 से 70 बार धड़कता है। इस दौरान शरीर का लगभग पूरा खून फेफड़ों तक जाकर ऑक्सीजन लेकर वापस लौटता है। शरीर से ऑक्सीजन की कमी वाला खून दिल के दाहिने हिस्से में पहुंचता है। वहां से वह फेफड़ों में जाता है, जहां कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलती है और ऑक्सीजन मिलती है। इसके बाद यही खून दिल के बाएं हिस्से से पूरे शरीर में पहुंचता है। यह पूरी प्रक्रिया कुछ सेकंड में पूरी हो जाती है।
लेकिन जब फेफड़ों तक जाने वाली धमनी में खून का थक्का फंस जाता है तो यह पूरा सिस्टम बिगड़ जाता है। खून फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाता, शरीर में ऑक्सीजन कम होने लगती है और दिल पर अचानक बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है। यदि थक्का बड़ा हो तो दिल का दाहिना हिस्सा कुछ ही मिनटों में फेल हो सकता है।
यह खतरनाक थक्का आता कहां से है?
डॉक्टरों के मुताबिक ज्यादातर मामलों में यह थक्का पैरों, पेल्विस या कभी-कभी हाथों की नसों में बनता है। इसे डीप वेन थ्रॉम्बोसिस (DVT) कहा जाता है। नसों में बना यह थक्का टूटकर खून के साथ दिल तक पहुंचता है और वहां से फेफड़ों की धमनियों में जाकर फंस जाता है।
लंबे समय तक बिस्तर पर रहना, बड़ी बीमारी, सर्जरी, कैंसर का इलाज, घंटों तक लगातार बैठे रहना... जैसे लंबी फ्लाइट और शरीर में पानी की कमी, ये सभी वजहें खून के थक्के बनने का खतरा बढ़ाती हैं। डॉक्टर बताते हैं कि पैरों में खून का बहाव पहले से थोड़ा धीमा होता है। ऐसे में अगर शरीर की गतिविधि कम हो जाए या खून गाढ़ा होने लगे, तो थक्का बनने का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
क्या जिम भी वजह बन सकता है?
प्रतीक यादव फिटनेस को लेकर बेहद सजग थे। नियमित वर्कआउट करते थे, लेकिन डॉक्टर साफ कहते हैं कि सिर्फ फिट दिखना, शरीर के अंदर सबकुछ ठीक होने की गारंटी नहीं है। डॉक्टरों के मुताबिक, कई बार बहुत ज्यादा वर्कआउट, जरूरत से ज्यादा पसीना निकलना, तेजी से वजन घटाने की कोशिश या पर्याप्त पानी न पीना शरीर में पानी की कमी पैदा कर देता है। इससे खून गाढ़ा होने लगता है और थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है।
इसके अलावा बिना डॉक्टर की सलाह के मसल्स बढ़ाने वाले इंजेक्शन, एनाबॉलिक स्टेरॉयड, टेस्टोस्टेरोन बूस्टर और परफॉर्मेंस बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल भी बेहद खतरनाक हो सकता है। ये शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं बढ़ा देते हैं, खून को गाढ़ा कर देते हैं और नसों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
कुछ लोग हाई-प्रोटीन डाइट, ज्यादा प्री-वर्कआउट सप्लीमेंट और कम रिकवरी के साथ एक्सट्रीम फिटनेस रूटीन अपनाते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामले अब लगातार सामने आ रहे हैं। हालांकि सुरक्षित तरीके से किया गया नियमित व्यायाम शरीर के लिए फायदेमंद माना जाता है।
इसके लक्षण क्या हैं?
पल्मोनरी एम्बोलिज्म अचानक हमला करता है। मरीज को अचानक सांस फूल सकती है, सीने में तेज दर्द हो सकता है, दिल की धड़कन तेज हो सकती है, पसीना आ सकता है, चक्कर आ सकते हैं, होंठ नीले पड़ सकते हैं और वह अचानक गिर सकता है। कई मामलों में कुछ ही मिनटों में मौत हो जाती है।
छोटे थक्के पहले से संकेत भी देते हैं। कई दिनों तक बिना वजह सांस फूलना, पिंडली में दर्द, सूजन, ज्यादा थकान या हल्का सीने का दर्द इसके शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। लेकिन लोग इन्हें अक्सर जिम की थकान, गैस, चिंता या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी की सबसे खतरनाक बात यह है कि एक थक्का दूसरे थक्कों को बनने के लिए बढ़ावा देता है और देखते ही देखते बड़ा क्लॉट बन सकता है।
क्या इसका इलाज संभव है?
डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय रहते बीमारी पकड़ में आ जाए तो पल्मोनरी एम्बोलिज्म का इलाज संभव है। छोटे थक्कों में ब्लड थिनर दवाएं दी जाती हैं, ताकि नया थक्का न बने और पुराना धीरे-धीरे घुल जाए। गंभीर मामलों में थक्का घोलने वाली दवाएं तुरंत दी जाती हैं।
बड़े अस्पतालों में अब कैथेटर आधारित तकनीक से थक्का सीधे निकाला भी जाता है। पेनुम्ब्रा जैसी तकनीक थक्के को खींचकर बाहर निकालती है, जबकि एंजियोजेट हाई-प्रेशर सलाइन जेट से उसे तोड़कर हटाती है। डॉक्टरों के मुताबिक, इस बीमारी में सबसे अहम चीज समय है। इलाज में जितनी देरी होगी, खतरा उतना बढ़ता जाएगा।
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