सबरीमाला केस: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धर्म तब मजबूत होगा जब मंदिरों में सब आएंगे
News In Short
- मंदिर एंट्री रोकने से समाज बंटेगा: सुप्रीम कोर्ट।
- 9 जजों की बेंच 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई।
- 2018 में महिलाओं की एंट्री पर रोक हटाई गई थी।
- केंद्र बोला- धार्मिक मामलों में अदालत दखल न दे।
- आर्टिकल 17 छुआछूत को संवैधानिक अपराध मानता है।
News In Detail
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस (Sabarimala Case) की सुनवाई जारी है। 9 जजों की संविधान बेंच लगातार तीसरे दिन सुनवाई की। जस्टिस नागरत्ना ने कहा- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा। यह हिंदू धर्म के लिए नुकसानदेह है। केंद्र सरकार ने धार्मिक मामलों में अदालती दखल का विरोध किया।
मंदिर एंट्री और समाज पर असर
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को अहम टिप्पणी हुई। जस्टिस नागरत्ना ने मंदिर प्रवेश (Temple Entry) पर बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि खास समुदाय को ही मंदिर में आने देना गलत है। बाहरी लोगों को रोकने से समाज में बंटवारा होगा। यह हिंदू धर्म के लिए नुकसानदेह है।
जस्टिस नागरत्ना ने उदाहरण दिया कि अगर सिर्फ गौड़ सारस्वत समुदाय एक मंदिर में जाए तो यह ठीक नहीं। कांची मठ के लोग सिर्फ कांची जाएं, शृंगेरी न जाएं, यह भी सही नहीं। जितने ज्यादा लोग अलग-अलग मंदिरों में जाएंगे, धर्म उतना मजबूत होगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
संविधान और धार्मिक अधिकार
कोर्ट ने आर्टिकल 17 (Article 17) का जिक्र किया। यह प्रावधान छुआछूत को खत्म करता है। यह सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि संवैधानिक अपराध है। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार के कानून धार्मिक प्रथाओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसका असर आर्टिकल 26 (Article 26) पर भी पड़ सकता है।
आर्टिकल 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने मामले खुद तय करने का अधिकार देता है। कोर्ट ने माना कि यह सवाल हर केस के हिसाब से तय होगा। सिर्फ थ्योरी से इसका जवाब नहीं दिया जा सकता।
केंद्र सरकार के तर्क
केंद्र की तरफ से सीनियर एडवोकेट वैद्यनाथन ने दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि धार्मिक विवाद (Religious Dispute) संवेदनशील होते हैं। इतिहास में अदालतें ऐसे मामलों में दखल नहीं देतीं। केरल में पुर्तगालियों ने सीरियन ईसाइयों को कैथोलिक बनाने की कोशिश की। आयरलैंड में कैथोलिकों के साथ भेदभाव हुआ था।
ये उदाहरण बताते हैं कि धार्मिक मामले कितने जटिल होते हैं। केंद्र ने यह भी कहा कि जो मंदिर सिर्फ अपने समुदाय के लिए हो, वो सरकारी फंड न ले। अगर दूसरों को बाहर रखते हैं तो उनसे मदद भी नहीं ली जा सकती।
26 साल पुराना मामला
यह मामला 26 सालों से अदालतों में है। 2018 में 5 जजों की बेंच ने 4:1 बहुमत से महिलाओं की मंदिर में एंट्री की अनुमति दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं (Review Petition) दायर हुईं। अब 9 जजों की संविधान बेंच इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
7 से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई होगी। याचिकाकर्ता 7 से 9 अप्रैल तक दलीलें दे रहे हैं। विरोधी पक्ष 14 से 16 अप्रैल तक अपनी बात रखेगा। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) और संवैधानिक अधिकारों की सीमा तय करेगा।
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