एससी-एसटी एक्ट में नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत, सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज

Jitendra Shrivastava | Sept 22, 2026, 20:31 IST
Photograph: (THESOOTR)
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के 2018 संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अग्रिम जमानत पर रोक बरकरार रहेगी। कोर्ट ने कहा, 2020 में फैसला हो चुका है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत पर रोक बरकरार रखी है।
  • 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है।
  • कोर्ट ने रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन की दलील नहीं मानी।
  • SC/ST एक्ट में अग्रिम जमानत का जानें पूरा मामला।

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। इस संशोधन से अग्रिम जमानत पर रोक फिर लगी थी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला 2020 में पहले ही तय हो चुका है। इसलिए दोबारा सुनवाई की जरूरत नहीं है।



कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को SC/ST एक्ट (Scheduled Castes and Scheduled Tribes Act) में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। मामले की सुनवाई CJI (Chief Justice of India) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने की।



बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना भी शामिल रहे। बेंच ने साफ कहा कि इस संशोधन को कोर्ट 2020 में ही बरकरार रख चुका है। इसलिए पुराने फैसले पर दोबारा विचार की जरूरत नहीं है।



2018 के संशोधन के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक बहाल की गई थी। इसके साथ ही FIR (First Information Report) से पहले प्रारंभिक जांच की शर्त भी हटा दी गई थी। आरोपी की गिरफ्तारी से पहले मंजूरी लेने की जरूरत भी खत्म कर दी गई थी।



याचिकाकर्ता की दलील क्या थी

यह याचिका बृजभूषण सैनी ने दायर की थी। उनकी तरफ से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर रोक रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन है।



रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन का सीधा मतलब है उल्टा भेदभाव। जब किसी एक वर्ग को खास सुविधा दी जाती है, तो दूसरा वर्ग खुद को भेदभाव का शिकार मानता है। जैन ने दलील दी कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है।



एडवोकेट जैन ने इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या का भी जिक्र किया। उन्होंने मुआवजा बांटने के तरीके पर भी सवाल उठाए। राज्यसभा सदस्य के एक भाषण का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि मुआवजे के तौर पर 493 करोड़ रुपए बांटे गए। उनका कहना था कि इससे FIR दर्ज कराने को बढ़ावा मिल सकता है।



2018 में क्या बदला था

मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी होगी। सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी के लिए भी सक्षम अधिकारी की अनुमति जरूरी की गई थी।



कोर्ट ने यह भी कहा था कि विशेष परिस्थितियों में आरोपी को अग्रिम जमानत दी जा सकती है। इस फैसले के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। दलित संगठनों ने इसे एक्ट को कमजोर करने वाला कदम बताया था।



संसद ने बनाया नया कानून

विरोध के बाद संसद हरकत में आई। सरकार ने 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018' पारित किया। इस कानून के जरिए एक्ट में नई धारा 18A जोड़ी गई।



धारा 18A ने कोर्ट की तय की गई शर्तों को खत्म कर दिया। प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले अनुमति की जरूरत हट गई। अग्रिम जमानत पर रोक फिर से बहाल हो गई। इसी संशोधन को अब चुनौती दी गई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।



क्यों लगाई गई थी याचिका, जानें मामला...

अंतरिम जमानत

दिल्ली की एक अदालत ने जंतर मंतर पर मारपीट मामले में आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी है। उन पर निशु आजाद के पिता संजय आजाद से मारपीट का आरोप है। मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत भी कार्रवाई हुई थी।



पॉडकास्ट के बाद बढ़ा विवाद

स्वतंत्र भारद्वाज ने एक पॉडकास्ट में मारपीट को लेकर दावा किया था। इसके बाद मामले ने दोबारा तूल पकड़ा और पुलिस कार्रवाई के साथ अदालत में सुनवाई हुई।



FAQ

  1. SC/ST एक्ट में 2018 का संशोधन क्या है?
    SC/ST एक्ट में संशोधन से अग्रिम जमानत पर रोक फिर लगाई गई थी। FIR से पहले प्रारंभिक जांच की शर्त हटा दी गई। गिरफ्तारी से पहले मंजूरी की जरूरत भी खत्म कर दी गई।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में क्या कहा?
    कोर्ट ने 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा 2020 में ही तय हो चुका है। इसलिए दोबारा सुनवाई की जरूरत नहीं है।
  3. याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी थी?
    याचिकाकर्ता ने कहा कि अग्रिम जमानत पर रोक रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन है। उन्होंने मुआवजा बांटने के तरीके पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की।

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