ड्रग रूल बदला, बिना फार्मेसी डिग्री दुकान खोलना होगा आसान, फार्मासिस्ट विरोध में
NEWS IN SHORT
- ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड ने ड्रग रूल 1945 के नियम 64 में बदलाव का प्रस्ताव दिया है।
- नए नियम के तहत साइंस ग्रेजुएट भी खुदरा दवा दुकान चला सकेंगे।
- उनके पास सिर्फ दो साल का अनुभव और 6 महीने का सर्टिफिकेट जरूरी होगा।
- एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने केंद्र को पत्र लिखकर इस फैसले का विरोध किया है।
- फार्मासिस्टों का कहना है कि यह बदलाव मरीजों की सेहत के साथ खिलवाड़ है।
NEWS IN DETAIL
अब दवा दुकान के लिए क्या बदलेगा?
देश में दवाइयां बेचने के नियम बदलने वाले हैं। ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (Drug Technical Advisory Board) यानी डीटीएबी की 93वीं बैठक में एक अहम प्रस्ताव आया। प्रस्ताव यह है कि ड्रग रूल 1945 के नियम 64 में बदलाव किया जाए।
अभी तक खुदरा दवा दुकान चलाने के लिए रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट होना जरूरी था। नए प्रस्ताव के मुताबिक अब साइंस ग्रेजुएट भी यह काम कर सकेंगे। उनके पास सिर्फ दो साल का अनुभव और 6 महीने का सर्टिफिकेट होना काफी होगा। फार्मेसी की पूरी पढ़ाई की जरूरत नहीं होगी।
क्या है ड्रग रूल 1945 के नियम ?
फार्मासिस्टों ने क्यों किया विरोध?
मध्य प्रदेश फार्मासिस्ट एसोसिएशन (mp pharmacy council) ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध जताया है। एसोसिएशन का कहना है कि यह फैसला मरीजों की सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ है।
एसोसिएशन के मीडिया प्रभारी राजवीर त्यागी ने साफ कहा कि फार्मासिस्ट लाइफ सेविंग ड्रग (जीवन रक्षक दवाइयां) बेचते हैं। इन दवाओं के साइड इफेक्ट, डोजिंग और इंटरेक्शन बेहद जटिल होते हैं। बिना पूरी फार्मेसी ट्रेनिंग के दवा वितरण अनुमति देना पब्लिक हेल्थ के लिए बड़ा जोखिम है।
43% फार्मासिस्ट पहले से बेरोजगार
यह मसला सिर्फ नियम का नहीं है। मध्य प्रदेश में 60 हजार से ज्यादा रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट हैं। सरकारी भर्तियां बेहद सीमित हैं। इसलिए ज्यादातर फार्मासिस्ट खुदरा दवा दुकानों पर ही रोजगार के लिए निर्भर हैं।
देशभर में 35 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट हैं। इनमें से 73% पहले से ही बेरोजगार या पार्ट टाइम रोजगार में हैं। हर साल करीब 2 लाख नए छात्र फार्मेसी की पढ़ाई पूरी करके इस क्षेत्र में आते हैं। अगर साइंस ग्रेजुएट को भी दुकान चलाने की अनुमति मिल गई तो फार्मासिस्टों के रोजगार का संकट और गहरा हो जाएगा।
बिना पूरी ट्रेनिंग दवा देना कितना खतरनाक?
फार्मेसी की पढ़ाई में दवाओं के केमिकल स्ट्रक्चर, डोज कैलकुलेशन, ड्रग इंटरेक्शन और साइड इफेक्ट की गहरी जानकारी दी जाती है। एक प्रशिक्षित फार्मासिस्ट यह भी जानता है कि कौन सी दवाइयां एक साथ नहीं दी जानी चाहिए।
सिर्फ 6 महीने के सर्टिफिकेट से यह पूरी जानकारी देना संभव नहीं है। जानकारों का कहना है कि गलत दवा या गलत डोज से मरीज की जान भी जा सकती है। खासकर बुजुर्गों और बच्चों में दवाओं का असर बेहद संवेदनशील होता है।
एसोसिएशन ने केंद्र से क्या मांगा?
एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लिया जाए। एसोसिएशन का तर्क है कि देश में पहले से ही पर्याप्त संख्या में रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट मौजूद हैं।जरूरत है तो उन्हें रोजगार के अवसर दिए जाएं, न कि उनकी जगह अप्रशिक्षित लोगों को लाया जाए।
अब यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इस विरोध पर क्या रुख अपनाती है। डीटीएबी का यह प्रस्ताव अभी सिर्फ सुझाव के स्तर पर है। लेकिन अगर इसे लागू किया गया तो देश के दवा वितरण तंत्र में बड़ा बदलाव आ सकता है।
MP Pharmacists
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