साउथ कोरिया में AI कैमरों से बच रही इंसानी जानें, क्या है इस यूनिक टेक्नोलॉजी का सच
समझें क्या है पूरा मामला
- सियोल की हान नदी पर एआई कैमरे लोगों की जान बचाने का काम कर रहे हैं।
- यह एआई सिस्टम किसी इंसान के असामान्य व्यवहार को पहचानकर अलर्ट भेजता है।
- अलर्ट मिलते ही रेस्क्यू टीम केवल 5 मिनट के भीतर मौके पर पहुंच जाती है।
- इस नई तकनीक के कारण सियोल में रेस्क्यू रेट बढ़कर 99 फीसदी हो गया है।
- तकनीक से मदद तो मिल रही है, लेकिन समाज में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जरूरत है।
सियोल में AI कैमरों से बच रही हैं जिंदगियां
साउथ कोरिया की राजधानी सियोल एक बहुत खूबसूरत शहर है। यहां सियोल की हान नदी पूरी दुनिया में काफी मशहूर है। किन इस नदी का एक दुखद पहलू भी रहा है। हर साल कई लोग यहां निराशा में आते हैं। वे अपनी जिंदगी खत्म करने का कदम उठाते हैं। ऐसे में अब सियोल प्रशासन ने एक नई तकनीक अपनाई है।
उन्होंने हान नदी के पुलों पर एआई कैमरे लगाए हैं। यह कैमरे लोगों की जान बचाने का काम कर रहे हैं। एआई तकनीक अब एक जीवन रक्षक के रूप में उभर रही है। सियोल की हान नदी के पुलों पर AI कैमरे लगाए गए हैं। ये कैमरे खतरे में फंसे लोगों को पहचान लेते हैं।
पहचान होते ही रेस्क्यू टीम को तुरंत अलर्ट मिलता है। कैमरे लगातार पुलों की निगरानी करते हैं। अगर कोई व्यक्ति असुरक्षित मानी जाने वाली जगह पर रुकता है, तो सिस्टम अलर्ट भेजता है। पुलों पर लगे खास फोन का इस्तेमाल भी अलार्म ट्रिगर कर सकता है। आइए इस खास सिस्टम के बारे में डिटेल से जानें....
कैसे काम करता है ये सिस्टम
हांगांग ब्रिज सीसीटीवी इंटीग्रेटेड कंट्रोल सेंटर के मेजर किम जुन-यंग (Kim Jun-young) ने इस सिस्टम को बेहद असरदार बताया है। उनका कहना है कि टीम का मकसद व्यक्ति को सोचने का एक और मौका देना है। कई बार यही एक पल फैसला बदल देता है।
आपातकालीन टीमें ज्यादातर पुलों तक पांच मिनट में पहुंच जाती हैं। ये समय बचाव के लिए बेहद अहम माना जाता है। किम के मुताबिक जिन लोगों ने मन बना लिया होता है, उन्हें रोकना आसान नहीं होता। कई बार वे रेस्क्यू टीम से बचने की कोशिश भी करते हैं।
वहीं कुछ लोग सायरन की आवाज सुनते ही आखिरी वक्त में अपना फैसला बदल देते हैं। पिछले साल 17 पुलों पर लगे करीब 900 कैमरों ने 12 सौ से ज्यादा मामले पहचाने। हालांकि इनमें से कुछ लोगों को बचाया नहीं जा सका।
एक बड़ा राष्ट्रीय संकट
हान नदी का यह AI सिस्टम 2021 से काम कर रहा है। लेकिन साउथ कोरिया अब भी एक गहरे संकट से जूझ रहा है। राष्ट्रपति Lee Jae Myung (ली जे माइउंग) ने इसे देश के लिए शर्मनाक स्थिति बताया है। 2024 में देश की आत्महत्या दर हर एक लाख लोगों पर 29 से ज्यादा दर्ज हुई।
यह साल 2011 के बाद की सबसे ऊंची दर है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 10 से 49 साल की उम्र के लोगों में यह मौत की सबसे बड़ी वजह बनी हुई है। सियोल सेंट मैरी हॉस्पिटल में सुसाइड प्रिवेंशन डायरेक्टर यू जे-ह्यून का कहना है कि पढ़ाई का दबाव और काम का बोझ बड़ी वजह हैं।
समाज में असफलता को लेकर सख्त नजरिया भी लोगों को अकेला कर देता है। इससे लोग मुश्किल वक्त में मदद मांगने से भी हिचकते हैं। उनके मुताबिक कई मरीज खुद को परिवार पर बोझ मानने लगते हैं। 20 से 29 साल के युवा इमरजेंसी वार्ड में सबसे ज्यादा दर्ज होने वाला समूह हैं।
एक जिंदगी, जो दोबारा शुरू हुई
33 साल की कार्टूनिस्ट स्माइलिंग स्टोन ह्वांग को कुछ साल पहले रेस्क्यू टीम ने बचाया था। 2014 में उनके पिता की मौत आत्महत्या से हुई थी। इसके बाद उन्हें पिता का कर्ज और कानूनी परेशानियां विरासत में मिलीं। अपने 20 के दशक में उन्होंने कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं।
काम के घंटे लंबे और मुश्किल होते थे। उस दौर को याद करते हुए वे कहती हैं कि तब यह फैसला उन्हें दुखद नहीं, बल्कि सामान्य लगने लगा था। आज वे एक नई जिंदगी जी रही हैं। उन्होंने अपने अनुभवों पर एक कार्टून आधारित मेमॉयर भी लिखी है। इसका शीर्षक है "I am a suicide loss survivor."। मेंटल हेल्थ
दुनियाभर में तकनीक का इस्तेमाल
सिर्फ साउथ कोरिया ही नहीं, दुनिया के कई देशों में CCTV सिस्टम अब AI तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। जापान की कंपनी असिल्ला (Asilla) का सिस्टम भी असामान्य हरकतों को पहचान सकता है। इसमें गिरना या ऊंचाई से कूदने जैसी स्थिति शामिल है।
कंपनी की चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर युका सुजुकी बताती हैं कि दो अलग घटनाओं में सिस्टम ने छत पर खड़े लोगों को पहचाना। इसके बाद सुरक्षाकर्मी समय रहते उन्हें समझाने पहुंच सके।
सुजुकी का कहना है कि यह तकनीक इंसानों की जगह नहीं ले सकती। यह अकेले जापान की आत्महत्या दर भी कम नहीं कर सकती। लेकिन अगर यह कुछ जिंदगियां भी बचा पाए, तो यह अहम उपलब्धि है।
सियोल में किम को एक ऐसा मामला भी याद है, जहां शुरुआती बचाव के बावजूद व्यक्ति की जान नहीं बचाई जा सकी। यह बताता है कि तकनीक (mental health) मददगार जरूर है, लेकिन यह पूरा समाधान नहीं है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि South Korea की येतकनीक के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य सहायता को मजबूत करना जरूरी है। समय पर काउंसलिंग और सामाजिक सहयोग मिलने से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। सियोल का यह मॉडल दुनिया के अन्य शहरों के लिए एक उदाहरण बन सकता है।
एआई कैमरे सियोल में लोगों को दूसरा मौका दे रहे हैं। यह तकनीक (SUICIDE PREVENTION POLICY) जीवन बचाने का एक बेहतरीन जरिया बनी है। तकनीक और मानवीय प्रयास मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं। संकट के समय सही मदद मिलना सबसे ज्यादा जरूरी होता है।
NOTE: यदि आप या आपका कोई परिचित मानसिक तनाव से जूझ रहा है, तो कृपया सरकारी हेल्पलाइन (Tele-MANAS) के नंबर 14416 पर संपर्क करें।
Reference Links:
- Agence France-Presse (AFP), सियोल रिपोर्ट
- सियोल मेट्रोपॉलिटन सरकार एवं हानगांग ब्रिज सीसीटीवी इंटीग्रेटेड कंट्रोल सेंटर डेटा
- सियोल सेंट मैरी अस्पताल - मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्महत्या रोकथाम विभाग
- टेली-मानस राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन भारत (Tele-MANAS Helpline: 14416)
FAQ
- सियोल में AI कैमरे कैसे काम करते हैं?
ये कैमरे पुलों पर लगातार निगरानी करते हैं। अगर कोई व्यक्ति खतरे वाली जगह पर रुकता है, तो सिस्टम रेस्क्यू टीम को अलर्ट भेजता है। इससे तुरंत मदद पहुंचाई जाती है। - इस सिस्टम से बचाव दर कितनी बढ़ी है?
2012 में बचाव दर सिर्फ 56% थी। AI सिस्टम लगने के बाद यह बढ़कर 99% से ज्यादा हो गई है। - क्या यह तकनीक अकेले समस्या हल कर सकती है?
नहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक तकनीक सिर्फ मदद पहुंचाने में सहायक है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सामाजिक सहयोग भी उतना ही जरूरी है।
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