​सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामला: 22 आरोपियों को बरी करने के फैसले पर लगी मुहर

Mukesh Sharma | May 07, 2026, 15:00 IST
Photograph: (the sootr)
बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में 22 आरोपियों को बरी करने के विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। इस मामले में पंजाब के गवर्नर गुलाबचंद कटारिया और आईपीएस अधिकारी दिनेश एम.एन. को पहले ही राहत मिल चुकी है।

News In Short

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में दिया फैसला।
  • 22 आरोपियों को बरी करने के विशेष अदालत के फैसले को रखा बरकरार।
  • राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश के 21 पुलिसकर्मियों समेत सभी आरोपियों को राहत।
  • पंजाब गवर्नर गुलाबचंद कटारिया और आईपीएस दिनेश एम.एन. हो चुके हैं आरोपमुक्त।
  • कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन शेख की अपीलों को किया खारिज।

News In Detail

दो दशक तक भारतीय कानूनी और सियासी गलियारों में चर्चा का विषय रहे सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को अपना फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अनखड की बैंच ने 2018 के विशेष अदालत के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसमें सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया था। कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन शेख की पिछले सात साल से लंबित अपीलों को खारिज कर दिया है।



इस निर्णय के साथ ही राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश के उन 21 पुलिसकर्मियों समेत सभी आरोपियों को बड़ी राहत मिली है, जिन पर साजिश और हत्या के गंभीर आरोप थे।



​वीआईपी डिस्चार्ज और राजनीतिक प्रभाव

​हाई कोर्ट के इस फैसले से पहले ही इस मामले में कई हाई-प्रोफाइल हस्तियों को आरोप मुक्त किया जा चुका था। इनमें वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (जो उस समय गुजरात के गृह राज्य मंत्री थे), राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी दिनेश एम.एन., राजकुमार पांडियन और डीजी वंजारा शामिल थे।



​क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के शुरुआती दावों के अनुसार यह मामला तीन कड़ियों में बंटा हुआ था। नवंबर 2005 में गुजरात पुलिस ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन शेख एक आतंकी था, जिसे मुठभेड़ में मार गिराया गया। हालांकि, बाद में इसे फर्जी और सुनियोजित एनकाउंटर बताया गया।



सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी की भी उसी महीने हत्या कर दी गई थी और साक्ष्य मिटाने के लिए उनके शव को ठिकाने लगाने का आरोप लगाया गया था। इस मामले के मुख्य गवाह माने जाने वाले तुलसीराम प्रजापति की दिसंबर 2006 में एक अन्य एनकाउंटर में हत्या कर दी गई थी।



​मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच को गुजरात पुलिस से हटाकर सीबीआई को सौंप दिया था और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए ट्रायल को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया था।



​विशेष अदालत का 2018 का कड़ा रुख

​दिसंबर 2018 में विशेष सीबीआई जज एसजे शर्मा ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष की थ्योरी को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। उस समय अदालत ने कुछ बेहद तीखी टिप्पणियां की थीं कि सीबीआई ने एक तयशुदा स्क्रिप्ट के आधार पर जांच की, जिसका उद्देश्य किसी भी तरह राजनीतिक नेताओं को फंसाना था।



कोर्ट ने माना था कि अभियोजन पक्ष साजिश को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। दिलचस्प बात यह रही कि कोर्ट ने मुकरने वाले गवाहों के पक्ष में टिप्पणी करते हुए कहा था कि उन्होंने अदालत के सामने सच बोला, जबकि सीबीआई ने उनके बयानों को गलत तरीके से दर्ज किया था।



​हाई कोर्ट में क्या हुई दलीलें?

दिसंबर 2025 से शुरू हुई अंतिम सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने जोरदार बहस की। ​अपीलकर्ताओं (शेख के भाइयों) के एडवोकेट गौतम तिवारी ने तर्क दिया कि विशेष अदालत के निष्कर्ष विरोधाभासी थे। उन्होंने विशेष रूप से तुलसीराम प्रजापति के सह-कैदियों की गवाही पर जोर दिया, जिसमें प्रजापति ने अपनी जान को खतरा बताया था। दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नजरअंदाज किया।



सीबीआई की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने हाई कोर्ट को बताया कि उसने 2018 के फैसले को स्वीकार कर लिया है। इसके खिलाफ अपील न करने का निर्णय लिया है।



बरी हुए आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई ने कहा कि दोषमुक्ति के फैसले को पलटने की धुंधली सी संभावना भी नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि घटना के समय और स्थान पर आरोपियों की मौजूदगी साबित करने के लिए न तो कोई सीधा सबूत है और न ही कोई पुख्ता परिस्थितिजन्य साक्ष्य।


अब सबकी नजरें हाई कोर्ट के उस विस्तृत फैसले पर टिकी हैं, जिसमें उन कानूनी बिंदुओं का विस्तार से वर्णन होगा जिनके आधार पर इन अपीलों को खारिज किया गया है।



​जानिए सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामला का पूरा घटनाक्रम

​22 नवंबर, 2005: सोहराबुद्दीन, कौसर बी और प्रजापति को हैदराबाद से सांगली लौटते समय रास्ते में एक बस से पुलिस टीम ने रोका और हिरासत में लिया। शेख और उनकी पत्नी को एक वाहन में और प्रजापति को दूसरे वाहन में ले जाया गया।



​22 से 25 नवंबर, 2005: शेख और कौसर बी को अहमदाबाद के पास एक फार्म हाउस में रखा गया। प्रजापति को उदयपुर भेज दिया गया, जहां उसे उसके खिलाफ दर्ज मामलों में सुनवाई के लिए जेल में डाल दिया गया।



​26 नवंबर, 2005: गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक संयुक्त टीम द्वारा सोहराबुद्दीन शेख को एक मुठभेड़ में मार दिया गया।



​29 नवंबर, 2005: पुलिस द्वारा कौसर बी की भी कथित तौर पर हत्या कर दी गई और उनके शव को जलाकर ठिकाने लगा दिया गया।



​27 दिसंबर, 2006: प्रजापति को राजस्थान और गुजरात पुलिस की एक टीम उदयपुर सेंट्रल जेल से ले गई और गुजरात-राजस्थान सीमा पर सरहद चापरी के पास एक मुठभेड़ में कथित तौर पर मार दिया गया।



​2005-2006: शेख के परिवार ने एनकाउंटर की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और कौसर बी के ठिकाने के बारे में भी जानकारी मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात राज्य CID को मामले की जांच करने का निर्देश दिया।



​30 अप्रैल, 2007: गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक रिपोर्ट दाखिल कर बताया कि कौसर बी की मृत्यु हो चुकी है। उनके शव को जलाकर ठिकाने लगा दिया गया है।


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जनवरी 2010: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी।



​23 जुलाई, 2010: सीबीआई ने तत्कालीन गुजरात के गृह मंत्री अमित शाह, राजस्थान के तत्कालीन गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों सहित 38 व्यक्तियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।



​25 जुलाई, 2010: सीबीआई ने इस मामले में अमित शाह को गिरफ्तार किया।



​8 अक्टूबर, 2010: गुजरात की एक विशेष सीबीआई अदालत ने अमित शाह की जमानत याचिका खारिज की।



​29 अक्टूबर, 2010: गुजरात हाई कोर्ट ने अमित शाह को एक लाख रुपए के मुचलके पर जमानत दे दी।



​27 सितंबर, 2012: निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की मांग पर सोहराबुद्दीन शेख-कौसर बी एनकाउंटर मामले की सुनवाई गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दी।



​8 अप्रैल, 2012: सुप्रीम कोर्ट ने शेख, कौसर बी और प्रजापति एनकाउंटर मामलों की सुनवाई को एक साथ जोड़ दिया।



​30 दिसंबर, 2014: मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने अमित शाह को मामले से बरी कर दिया। इसके बाद कटारिया और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों सहित 15 अन्य आरोपियों को भी बरी कर दिया गया।



​नवंबर 2015: शेख के भाई रुबाबुद्दीन ने अमित शाह को बरी किए जाने के फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। उसी महीने उन्होंने हाई कोर्ट से कहा कि वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते और अपनी याचिका वापस ले ली।



​दिसंबर 2015: सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने अमित शाह को बरी किए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया।



​अप्रैल 2016: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंदर की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह इस मामले में पीड़ित पक्ष (Locus Standi) नहीं हैं। मंदर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।



​अगस्त 2016: सुप्रीम कोर्ट ने मंदर की अपील खारिज कर दी।



​अक्टूबर 2017: मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने 22 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए।



​नवंबर 2017: विशेष सीबीआई न्यायाधीश एस. जे. शर्मा ने मामले की सुनवाई शुरू की। अभियोजन पक्ष ने 210 गवाहों की जांच की, जिनमें से 92 गवाह मुकर (Hostile) गए।



​सितंबर 2018: बॉम्बे हाई कोर्ट ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों डी. जी. वंजारा, राजकुमार पांडियन, एन. के. अमीन, विपुल अग्रवाल, दिनेश एम. एन. और दलपत सिंह राठौड़ को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।



​23 नवंबर, 2018: अदालत ने गवाहों की जांच और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत आरोपियों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी की।



​5 दिसंबर, 2018: अभियोजन और बचाव पक्ष के वकीलों की अंतिम बहस पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया।



​21 दिसंबर, 2018: विशेष सीबीआई अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा।



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