SC का अहम फैसला: मां की गाली अश्लीलता नहीं, गाली-गलौज और अश्लीलता में बताया फर्क
समझें क्या है पूरा मामला...
- मां की गाली देना अश्लीलता नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला।
- गाली-गलौज और अश्लीलता में फर्क बताया सुप्रीम कोर्ट ने।
- जमीन विवाद के मामले में आरोपी को मिली बड़ी राहत।
- 70 साल के बुजुर्ग की सजा घटाकर की गई कम।
- धमकी और अश्लीलता के आरोप हुए खारिज, चोट का दोष बरकरार।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर गाली-गलौज अश्लीलता नहीं मानी जा सकती। यह फैसला तमिलनाडु के जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में आया।
आरोपी पर मां की गाली देने का आरोप था। कोर्ट ने अश्लीलता और धमकी के आरोप हटा दिए। हालांकि गंभीर चोट पहुंचाने की सजा बरकरार रखी गई।
कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि गाली-गलौज या भद्दी भाषा अपने आप में अश्लीलता का अपराध नहीं बनती। अदालत ने कहा कि अश्लीलता साबित करने के लिए शब्दों का कामुक होना जरूरी है। शब्द ऐसे होने चाहिए जो यौन भावनाएं भड़काएं। साथ ही उनमें सुनने वालों को बिगाड़ने की प्रवृत्ति भी होनी चाहिए।
गाली और अश्लीलता में फर्क
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह फैसला सुनाया। बेंच ने कहा कि कोई भी असभ्य या अपमानजनक भाषा कानूनन अश्लील नहीं मानी जा सकती। केवल गाली देने से आईपीसी (IPC – Indian Penal Code) की धारा 294(बी) के तहत अश्लीलता साबित नहीं होती।
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे शब्द गुस्सा या असहजता पैदा कर सकते हैं। लेकिन सिर्फ इस आधार पर उन्हें कानूनी तौर पर अश्लील नहीं कहा जा सकता।
जमीन विवाद से जुड़ा है मामला
यह मामला तमिलनाडु का है। आरोपी मणि पर जमीन विवाद के दौरान शिकायतकर्ता को गालियां देने का आरोप था। आरोप था कि विवाद के दौरान मां की गाली और अन्य अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसी आधार पर उसे धारा 294(बी) के तहत दोषी ठहराया गया था।
संदर्भ देखना जरूरी बताया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी शब्द को अश्लील मानने से पहले उसका संदर्भ देखना जरूरी है। सिर्फ अपमानजनक शब्दों को अश्लीलता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
बेंच ने कहा कि यह भी साबित करना जरूरी है कि शब्दों से सार्वजनिक स्थान पर किसी को परेशानी हुई हो। इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला।
अश्लीलता का आरोप हुआ खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अश्लीलता वाली दोषसिद्धि रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि इस्तेमाल किए गए शब्द सिर्फ गाली-गलौज की श्रेणी में आते हैं। इन्हें कानूनी अर्थ में अश्लीलता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बहस के दौरान बोले गए अपशब्द तभी अपराध माने जाएंगे, जब वे अश्लीलता की तय कसौटी पर खरे उतरें।
धमकी का आरोप भी हटाया
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 506(2) यानी आपराधिक धमकी का आरोप भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ धमकी भरे शब्द बोलना काफी नहीं है। यह भी साबित करना जरूरी है कि आरोपी का मकसद डर पैदा करना या किसी काम के लिए मजबूर करना था।
गंभीर चोट का दोष बरकरार रहा
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दोषी माना। यह आरोप आईपीसी की धारा 326 के तहत था। मेडिकल रिपोर्ट में शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई थी। हमला बिलहुक नाम के धारदार कृषि औजार से किया गया था। कोर्ट ने इसे गंभीर चोट माना और इस दोषसिद्धि में कोई बदलाव नहीं किया।
बुजुर्ग होने पर मिली सजा में राहत
कोर्ट ने आरोपी की उम्र करीब 70 साल होने का ध्यान रखा। उसकी सेहत और मामले के पुराने होने को भी अदालत ने अहम माना। इसके बाद सजा घटाकर अदालत उठने तक की कैद कर दी गई। साथ ही आरोपी को दो महीने के भीतर 50 हजार रुपये जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया।
कब हुई थी घटना
यह मामला अगस्त 2017 का है। तमिलनाडु में कृषि भूमि को लेकर विवाद हुआ था। बहस के दौरान आरोपी ने शिकायतकर्ता पर हमला किया था। इसी हमले में गंभीर चोट पहुंचाने का आरोप लगा था।
FAQ
- क्या हर गाली देना अश्लीलता का अपराध माना जाएगा
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर गाली अश्लीलता नहीं है। अश्लीलता साबित करने के लिए शब्दों का कामुक और भड़काऊ होना जरूरी है। सिर्फ अपमानजनक भाषा इसके दायरे में नहीं आती। - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कौन से आरोप हटाए
कोर्ट ने अश्लीलता और आपराधिक धमकी के आरोप हटा दिए। हालांकि गंभीर चोट पहुंचाने का दोष बरकरार रखा गया। आरोपी की सजा उम्र को देखते हुए कम कर दी गई। - आईपीसी की धारा 294(बी) किससे जुड़ी है
यह धारा सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्दों के इस्तेमाल से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत अपराध साबित करने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। सिर्फ गाली देना काफी नहीं है।
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