तीन भाषा नीति पर CBSE को कोर्ट से फटकार, किताबें नहीं, टीचर नहीं, फिर कैसे पढ़ेंगे बच्चे?
CBSE ने क्लास 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं अनिवार्य कर दी हैं। इनमें से दो भाषा भारत की "नेटिव" यानी मूल भाषा होनी चाहिए। अंग्रेजी को इस दायरे से बाहर रखा गया है। कई अभिभावकों और छात्रों ने इसे कोर्ट में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि स्कूलों में किताबें और टीचर दोनों की कमी है। सुप्रीम कोर्ट ने अब CBSE से पूरी नीति दोबारा देखने को कहा है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
अगर आपका बच्चा किसी CBSE स्कूल में पढ़ता है, तो यह फैसला सीधे उसकी टाइमटेबल पर असर डालेगा। और अगर आप मध्य प्रदेश, राजस्थान या छत्तीसगढ़ के किसी शहर में रहते हैं, जहां हजारों CBSE स्कूल हैं, तो यह सवाल आपके घर तक पहुंचता है। तीसरी भाषा किस क्लास से शुरू हो, कौन सी भाषा मिले, किताबें कब आएं, यह सब अब कोर्ट की निगरानी में तय होगा।
पहले क्या था
यह विवाद नया नहीं है। तीन भाषा फॉर्मूला दशकों पुराना है। इसे पहली बार 1968 में शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों के साथ मिलकर बनाया था, और 2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इसे बदल दिया। फरवरी 2026 में CBSE ने इस पुरानी नीति को नया रूप दिया। इसके तहत क्लास 6 से तीसरी भाषा जोड़ी जानी थी, और जिन स्कूलों में अंग्रेजी क्लास 6 में पढ़ाई जाती थी, उसे "विदेशी" भाषा माना जाना था। जबकि तीन में से दो भाषाएं भारत की मूल भाषा होनी अनिवार्य थीं। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था।
क्या हुआ और क्यों
गुरुवार 20 अगस्त की सुनवाई में जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने वही सवाल उठाया जो लाखों अभिभावक पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा, हमें यह देखना होगा कि अंग्रेजी को किस हद तक गैर मूल भाषा माना जा सकता है। सबसे पहले, मुझे नेटिव शब्द के इस्तेमाल पर गंभीर आपत्ति है। यहीं से मामला पलटता है। शब्दों की यह लड़ाई सिर्फ भाषाई नहीं है, इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है, अंग्रेजी को भारत में किस नजर से देखा जाए।
जस्टिस बागची ने आगे कहा कि नेटिव शब्द का औपनिवेशिक मूल है। और इसकी जगह इंडिजिनियस यानी मूल निवासी शब्द होना चाहिए। उनके मुताबिक नई शिक्षा नीति 2020 बनाने वालों को इस शब्द के इस्तेमाल के प्रति सचेत रहना चाहिए था। यह टिप्पणी हल्के में लेने वाली नहीं है। भाषा की परिभाषा तय करना कानूनी तौर पर आसान काम नहीं है।
CBSE की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बोर्ड का पक्ष रखा। उनका कहना था कि अंग्रेजी भारत में संविधान के तहत एक आधिकारिक भाषा का दर्जा रखती है। यह दर्जा कोई छीन नहीं सकता। इसका मतलब यह नहीं कि इसे विदेशी भाषा जैसा माना जाए, लेकिन इसे नेटिव भाषा भी नहीं माना जा सकता। भाषा किसी संस्कृति की वाहक होती है।
इधर याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट को बताया कि चार महीने बीत जाने के बाद भी कई स्कूलों में तय भाषाओं की किताबें उपलब्ध नहीं हैं। जिससे आगामी परीक्षाओं में बैठने वाले लाखों छात्र प्रभावित हो रहे हैं। सोचिए, एक बच्चा जिसे परीक्षा देनी है, उसके पास किताब ही नहीं है।
टीचर की कमी और भी गंभीर सवाल है। जस्टिस बागची ने पूछा, हमारे स्कूलों में कितने संस्कृत शिक्षक बीएड डिग्रीधारी हैं। यह सवाल अकेले संस्कृत तक सीमित नहीं। CBSE स्कूलों में करीब 23 भाषा विकल्प दिए गए हैं, लेकिन इतनी भाषाओं के लिए प्रशिक्षित शिक्षक ढूंढना आसान नहीं। कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से इन 23 भाषा विकल्पों के लिए शिक्षकों और सीखने की सामग्री की उपलब्धता का पूरा रोडमैप मांगा है।
दोनों तरफ की बात
CBSE और केंद्र सरकार का पक्ष साफ है। उनका तर्क है कि तीन भाषा सीखना छात्रों के लिए फायदेमंद है, और क्लास 5 से 10 तक पांच साल का समय छात्रों को भाषा सीखने के लिए काफी है। दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नीति को अचानक थोपा गया, बिना यह देखे कि स्कूलों के पास संसाधन हैं भी या नहीं। खुद कोर्ट ने भी माना कि नीति लागू करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन असली सवाल यह है कि इसे किस तरह से लागू किया जाए।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ कनेक्शन
यह मामला सीधे तीनों राज्यों से जुड़ता है। क्योंकि यहां CBSE स्कूलों का नेटवर्क बहुत बड़ा है। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में करीब 1233, राजस्थान में करीब 1124 और छत्तीसगढ़ में करीब 418 CBSE संबद्ध स्कूल हैं। इतने बड़े नेटवर्क में अगर तीसरी भाषा के लिए किताबें और शिक्षक समय पर न पहुंचें, तो सबसे ज्यादा असर छोटे शहरों और कस्बों के स्कूलों पर पड़ता है, जहां संसाधन पहले से सीमित हैं। राहत की बात यह है कि राज्य बोर्डों में इस नीति से कोई बदलाव नहीं हुआ है, यानी सरकारी स्कूलों के छात्र फिलहाल इस उलझन से बाहर हैं।
आगे क्या होगा
कोर्ट ने मामले को अगली सुनवाई के लिए 10 दिन बाद सूचीबद्ध कर दिया है। इस बीच CBSE को टीचर और किताबों की उपलब्धता पर जवाब देना है। और यही वो मोड़ है जहां तय होगा कि लाखों बच्चों की पढ़ाई किस दिशा में जाएगी।
क्या नीति पूरी तरह बदलेगी, या सिर्फ इसे लागू करने का तरीका सुधरेगा? यह अभी खुला सवाल है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
ज्यादातर लोगों को लगता है कि यह सिर्फ भाषा चुनने की बहस है। लेकिन असल मुद्दा कानूनी परिभाषा का है। अगर कोर्ट अंग्रेजी को संवैधानिक तौर पर "इंडिजिनियस" घोषित कर देता है, तो सिर्फ CBSE नहीं, बल्कि देश भर के शिक्षा बोर्डों की भाषा नीतियों पर इसका असर पड़ सकता है। यह छोटी सी बहस बड़े कानूनी नतीजे की तरफ बढ़ रही है।
अब आप क्या करें
अब आप क्या करें: अपने बच्चे के स्कूल से तीसरी भाषा की किताबों और शिक्षक की उपलब्धता की जानकारी लें क्यों अभी: सत्र चार महीने आगे बढ़ चुका है और परीक्षाएं नजदीक हैं आगे देखें: अगली सुनवाई की तारीख, जो 10 दिन में तय होगी।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह मामला सीधे शिक्षा के अधिकार और भाषाई पहचान से जुड़ा है। संविधान भाषा को लेकर संवेदनशील संतुलन बनाए रखता है, और कोर्ट की यह टिप्पणी उस संतुलन को परिभाषित करने की कोशिश है।
साथ ही यह डिजिटल युग में नीति पारदर्शिता का सवाल भी है, जब तक स्कूलों के पास संसाधन नहीं, तब तक कोई भी नीति लागू करना बच्चों पर अनुचित बोझ डालता है। यह मामला दिखाता है कि नीति बनाना और उसे व्यवहार में लाना दो अलग चुनौतियां हैं।
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