कॉलेजियम के फैसलों को RTI के दायरे में लाने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा हुए अलग
याचिका के मुताबिक, नियुक्ति प्रक्रिया स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए। साथ ही, कॉलेजियम के फैसलों को सूचना के अधिकार (RTI) में लाने की मांग है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा हुए अलग
मामले की सुनवाई सोमवार को जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ के सामने हुई। इस पीठ में जस्टिस आलोक आराधे भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने खुद को अलग कर लिया। उन्होंने इस फैसले की वजह भी बताई। MoP से जुड़े एक अन्य मामले में वे पहले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल थे। उस मामले में उन्होंने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में पैरवी की थी। इसी कारण उन्होंने मौजूदा मामले की सुनवाई से दूरी बनाई।
क्या है प्रक्रिया ज्ञापन यानी MoP?
MoP वह दस्तावेज है, जिसमें जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित होती है। यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति से जुड़ी है। जून 1999 में सुप्रीम कोर्ट के द्वितीय जज मामले के निर्देश आए थे। इसके बाद MoP तैयार किया गया था। इसमें कॉलेजियम सिस्टम के तहत चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया तय है। हालांकि, 2015 के NJAC फैसले के बाद इसमें बदलाव जरूरी माना गया। केंद्र सरकार और कॉलेजियम के बीच सहमति नहीं बन सकी। इस वजह से प्रक्रिया अब तक अंतिम रूप नहीं ले सकी है।
2015 में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया था NJAC
साल 2015 में संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून पारित किया था। इसका उद्देश्य कॉलेजियम सिस्टम की जगह नया आयोग बनाना था। प्रस्तावित आयोग में न्यायपालिका और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि शामिल होने थे। हालांकि, 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने NJAC कानून रद्द कर दिया। संविधान पीठ ने इसे असंवैधानिक घोषित किया था। कोर्ट ने माना था कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। इसके बाद कॉलेजियम सिस्टम जारी रखने का फैसला हुआ। साथ ही, नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार के लिए सुझाव मांगे गए।
केंद्र सरकार को सौंपा गया था MoP में बदलाव का जिम्मा
NJAC मामले के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दूसरा आदेश दिया। यह आदेश 16 दिसंबर 2015 को पारित किया गया था। इसमें MoP में जरूरी बदलावों की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को सौंपी गई। इसका उद्देश्य नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना था। हालांकि, केंद्र और कॉलेजियम के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बनी।
मार्च 2017 में कॉलेजियम ने केंद्र की एक सिफारिश स्वीकार नहीं की। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर नाम रोकने का अधिकार मांगा गया था। यह अधिकार केंद्र सरकार को देने का प्रस्ताव था। स्थायी सचिवालय बनाने के प्रस्ताव पर भी सहमति नहीं बनी।
2017 में भी MoP में देरी का मुद्दा पहुंचा था सुप्रीम कोर्ट
MoP को अंतिम रूप देने में देरी का मामला अक्टूबर 2017 में पहुंचा। तब जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। कोर्ट ने व्यापक जनहित में MoP जल्द अंतिम करने की जरूरत बताई। उसने कहा कि मामला अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रह सकता। यह आदेश अधिवक्ता आरपी लूथरा की याचिका पर दिया गया था। बाद में मामला तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा की पीठ के सामने पहुंचा। इसके बाद पहले दिया गया आदेश वापस ले लिया गया।
अब एक महीने में MoP अंतिम करने की मांग
लोक प्रहरी की नई याचिका में MoP जल्द अंतिम करने की मांग है। इसमें CJI से प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अनुरोध किया गया है। साथ ही, केंद्र के विधि एवं न्याय मंत्रालय को निर्देश देने की मांग है। मंत्रालय को CJI से परामर्श के बाद प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके लिए एक महीने की समयसीमा तय करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इसकी कमी संवैधानिक अदालतों की कार्यप्रणाली प्रभावित कर सकती है। इसका असर आम लोगों के न्याय पाने के अधिकार पर भी पड़ सकता है।
कॉलेजियम के सर्वसम्मत फैसले और RTI के दायरे की मांग
याचिका में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम के सर्वसम्मत फैसले से करने की मांग है। इसमें 2015 के NJAC फैसले में बताए गए मानकों पर ध्यान देने की बात है। याचिकाकर्ता ने जजों के चयन में कुछ गुण जरूरी बताए हैं। इनमें निष्पक्षता, निर्भीकता, पारदर्शिता और प्रक्रिया की शुचिता शामिल हैं। इसके अलावा, कॉलेजियम के फैसलों को RTI कानून के दायरे में लाने की मांग है। इससे नियुक्तियों की प्रक्रिया में जवाबदेही बढ़ाने का उद्देश्य है।