जनवरी में भारत की थोक महंगाई 1.81% तक बढ़ी, 10 महीने के उच्च स्तर पर

Aman Vaishnav | Feb 16, 2026, 23:48 IST
Photograph: (THESOOTR)
जनवरी में थोक महंगाई 1.81% तक पहुंच गई है। थोक महंगाई में बढ़ोतरी से सामान की कीमतों में असर पड़ा है। इस महंगाई में रोजमर्रा की चीजों और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की कीमतें मेन हैं।

जनवरी में थोक महंगाई (WPI) बढ़कर 1.81% हो गई है। दिसंबर में ये 0.83% थी, जो कि 10 महीनों में सबसे ज्यादा है। मार्च 2025 में यह 2.05% थी। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने सोमवार 16 फरवरी को थोक महंगाई के ताजा आंकड़े जारी किए हैं।



थोक महंगाई सूचकांक (WPI) एक आर्थिक संकेतक है। ये बताता है कि बाजार में वस्तुओं की कीमतें थोक स्तर पर कितनी बदल रही हैं। सामान के थोक खरीदी में औसत कीमतों में कितनी बढ़ोतरी या गिरावट हो रही है, इस बात की भी जानकारी देता है।



उदाहरण से समझें महंगाई...

हाल ही में रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की कीमतों में 2.21% तक वृद्धि हो गई है, जो कि पहले 0.21% थी। इसका मतलब है कि आम आदमी की रोज की खरीदारी अब महंगी हो गई है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई परिवार रोजमर्रा की सामग्री जैसे चाय, दूध और साबुन खरीदता है, तो अब इन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे।



यह बदलाव विशेष रूप से उन चीजों पर प्रभाव डाल रहा है, जो अक्सर इस्तेमाल होती हैं। जैसे कि दाल, आटा और तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। पहले जहां दाल की कीमत 100 रुपए प्रति किलो थी, अब वह 102-104 रुपए के आसपास हो सकती है। इस बढ़ी हुई महंगाई का असर सीधे तौर पर परिवारों के बजट पर पड़ रहा है, खासकर उन लोगों पर जिनकी आय सीमित है।



डेली यूज की चीजें महंगी

रोजमर्रा की जरूरत की चीजें (प्राइमरी आर्टिकल्स) 0.21% से बढ़कर 2.21% तक महंगी हो गई है।



खाने-पीने की चीजें माइनस 0.43% से बढ़कर 1.55% हो गई है।



फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर पहले माइनस 2.31% थी। अब यह घटकर माइनस 4.01% हो गई है।



मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की थोक महंगाई दर 1.82% से बढ़कर 2.86% हो गई है।



होलसेल महंगाई के तीन मुख्य हिस्से होते हैं...

प्राइमरी आर्टिकल (प्राथमिक वस्तुएं) वे कच्चे या शुरुआती उत्पाद हैं, जिन पर कोई औद्योगिक प्रोसेसिंग नहीं हुई होती है।



  1. पहला प्राइमरी आर्टिकल है। इसका वेटेज (महत्व) 22.62% है।
  2. दूसरा फ्यूल और पावर है। इसका वेटेज 13.15% है।
  3. तीसरा मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट है। इसका वेटेज सबसे ज्यादा 64.23% है।

प्राइमरी आर्टिकल्स के चार मुख्य हिस्से होते हैं...

  1. फूड आर्टिकल्स, जैसे अनाज, गेहूं, और सब्जियां।
  2. नॉन-फूड आर्टिकल्स, जिसमें ऑयल सीड्स आते हैं।
  3. मिनरल्स (खनिज पदार्थ)।
  4. क्रूड पेट्रोलियम (कच्चा तेल)।

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8 महीनों में सबसे ज्यादा बढ़ी रिटेल महंगाई

जनवरी महीने में रिटेल महंगाई पिछले महीने से बढ़कर 2.75% हो गई है। दिसंबर में यह 1.33% थी। यह पिछले 8 महीनों में सबसे ज्यादा है। मई 2025 में महंगाई 2.82% तक पहुंच गई थी।



रिटेल महंगाई- रिटेल महंगाई को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति कहा जाता है। यह उस बढ़ोतरी को मापती है जो हमारे रोजमर्रा के सामान, जैसे कि खाना, कपड़े, घर, ईंधन और स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों में समय के साथ होती है।



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आम आदमी पर थोक महंगाई का असर

थोक महंगाई का लंबे समय तक बढ़ना ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर के लिए नुकसानदायक होता है। जब थोक कीमतें बहुत लंबे समय तक हाई रहती हैं, तो कंपनियां इन कीमतों का बोझ ग्राहकों पर डाल देती हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए WPI को कंट्रोल कर सकती है।



थोक महंगाई का मतलब- जब बाजार में अलग-अलग चीजों जैसे खाने-पीने की चीजें, तेल, धातु, रसायन आदि के दाम बढ़ते हैं। यह उस समय को बताता है जब ये चीजें निर्माता से थोक दुकानदार तक पहुंचती हैं। यह खुदरा दाम (जैसे आपकी दुकान पर जो चीजें बिकती हैं) से पहले का संकेत होता है।



जैसे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई थी। लेकिन सरकार टैक्स में सिर्फ एक सीमा तक ही कटौती कर सकती है। WPI (विप्रो प्राइस इंडेक्स) में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक और रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है।



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एक्साइज ड्यूटी क्या है?

एक्साइज ड्यूटी वह कर है जो सरकार किसी वस्तु के उत्पादन या निर्माण पर लगा सकती है। जब किसी वस्तु को फैक्ट्री में बनाया जाता है, तो उस पर सरकार के जरिए निर्धारित एक शुल्क (कर) लिया जाता है। यह कर वस्तु के उत्पादन के समय लगाया जाता है। इसे उत्पादक को सरकार को देना होता है। उदाहरण के लिए जब पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार इस पर एक्साइज ड्यूटी घटा सकती है। इससे उपभोक्ताओं पर बोझ कम हो सके।



दो तरह की महंगाई

भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा महंगाई होती है। दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई का मतलब है वो कीमतें जो आम लोग दुकानों पर सामान खरीदने के लिए देते हैं।



इसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI INDEX) कहा जाता है। वहीं थोक महंगाई का मतलब है वो कीमतें जो एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से सामान खरीदने के लिए देता है। इसे होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) कहते हैं।



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महंगाई मापने की प्रक्रिया

महंगाई मापने के लिए अलग-अलग चीजों को शामिल किया जाता है। जैसे थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 63.75% होती है। फूड जैसे प्राइमरी आर्टिकल की 22.62% होती है। फ्यूल और पावर की 13.15% होती है। वहीं रिटेल महंगाई में फूड और प्रोडक्ट की हिस्सेदारी 45.86% होती है। हाउसिंग की 10.07% और फ्यूल समेत अन्य चीजों की भी भागीदारी होती है।





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