कॉरपोरेट इंडिया में महिलाओं को नहीं मिल रहा लीडरशिप का मौका

Anjali Dwivedi | Feb 23, 2026, 18:03 IST
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AIMA और KPMG की रिपोर्ट के अनुसार, 79% महिलाएं लीडर बनना चाहती हैं, लेकिन बोर्ड रूम में केवल 1% की पहुंच है। प्रमोशन में पारदर्शिता की कमी और मिड-करियर ड्रॉपआउट बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।

News in Short

79% महिलाएं बड़े पदों पर काम करने का सपना देख रही हैं।



30% कंपनियों में महिला लीडर्स की संख्या में गिरावट आई है।



कंपनी के बोर्ड में केवल 1% महिलाएं ही शामिल हैं।



65% महिलाएं करियर के बीच में ही नौकरी छोड़ देती हैं।



36% लोग मानते हैं कि बड़े पदों पर पुरुषों को प्राथमिकता मिलती है।



News In Detail

कॉर्पोरेट इंडिया में महिलाओं की उड़ान अब बाधाओं के घेरे में है। महिलाओं में लीडर बनने की चाहत तो है, लेकिन सिस्टम कमजोर पड़ रहा है। AIMA (All India Management Association) और KPMG की रिपोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। ये कंपनियां दावे तो बड़े-बड़े करती हैं, मगर जमीनी हकीकत काफी अलग है। इसके बीच की खाई अब लगातार बढ़ती जा रही है। यह रिपोर्ट भारतीय कंपनियों में महिला नेतृत्व की सुस्त रफ्तार को दर्शाती है।



KPMG India क्या है और यह कैसे काम करती है

Klynveld Peat Marwick Goerdeler KPMG का फुल फॉर्म है। KPMG India, वैश्विक प्रोफेशनल सर्विसेज फर्म KPMG का भारतीय हिस्सा है और Big Four कंपनियों में से एक है।



KPMG मुख्य रूप से कंपनियों का हिसाब-किताब चेक करने, टैक्स बचाने, कारोबार बढ़ाने की सलाह देने और जोखिम कम करने का काम करती है। यह डिजिटल बदलाव, सरकारी नीतियों की जानकारी और धोखाधड़ी रोकने में भी मदद करती है। KPMG India आर्थिक नीतियों, इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, और MSME विकास पर शोध करती है और रिपोर्ट जारी करती है।



महिलाओं की नेतृत्व क्षमता पर नई रिपोर्ट

करीब 79 प्रतिशत महिलाएं अब बड़े पदों पर पहुंचना चाहती हैं। आधे से ज्यादा महिलाओं का लक्ष्य कंपनी का शीर्ष प्रबंधन बनना है। पिछले पांच सालों में महिला नेतृत्व की प्रगति काफी धीमी रही है। लगभग 30 प्रतिशत कंपनियों में महिला लीडर्स की संख्या कम हुई है। आज भी 10 प्रतिशत कंपनियों में कोई महिला लीडर नहीं है। कॉरपोरेट इंडिया में यह असमानता काफी गहरी और चिंताजनक बनी हुई है।



टॉप पदों तक पहुंचना अब भी बड़ी चुनौती

रिपोर्ट के मुताबिक केवल एक प्रतिशत महिलाएं ही बोर्ड स्तर पर हैं। टॉप लेबल पर पहुंचते ही महिलाओं की संख्या काफी कम हो जाती है। समस्या प्रवेश में नहीं बल्कि करियर की सीढ़ी चढ़ने में है। तीन-चौथाई कंपनियों में अनुभवी महिलाएं नेतृत्व तक नहीं पहुंच पाती हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की प्रगति की रफ्तार बहुत धीमी है। मध्य प्रबंधन के स्तर पर महिलाएं सबसे ज्यादा वर्कफोर्स छोड़ती हैं।



धीमी पड़ती बदलाव की रफ्तार

साल 2024 की तुलना में अब बदलाव की गति काफी सुस्त है। केवल 28 प्रतिशत कर्मचारी ही पदोन्नति की प्रक्रिया को निष्पक्ष मानते हैं। पहले के मुकाबले निष्पक्षता का यह भरोसा काफी कम हो गया है। प्रबंधन अभी भी चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में पुरुषों को ही प्राथमिकता देता है। आधी महिलाओं को लीडरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होने का मौका नहीं मिला। रास्तों को सुधारे बिना विविधता का लक्ष्य पाना काफी मुश्किल होगा।



महिला नेतृत्व में सिस्टम बना बड़ी रुकावट

महिलाओं के करियर में रुकावट का असली कारण उनकी काबिलियत नहीं, बल्कि दफ्तरों का पुराना सिस्टम और सामाजिक दबाव है। ऑफिस में प्रमोशन के नियम साफ नहीं होते और अक्सर पुरुषों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। घर-परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से 65% महिलाएं करियर के बीच में ही नौकरी छोड़ देती हैं।



दफ्तरों में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए सही मार्गदर्शन और साथ नहीं मिल पाता है। चुनौतीपूर्ण कामों के लिए आज भी पुरुषों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। ट्रेनिंग और बराबर मौके न मिलने से महिलाओं के आगे बढ़ने के सपने टूट जाते हैं।



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