भगवान काल भैरव की कृपा पाने के लिए आज कालाष्टमी पर ऐसे करें पूजा, दूर होंगे सारे संकट और डर
हिंदू धर्म में कालाष्टमी का पर्व बहुत ही विशेष स्थान रखता है। यह हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव की पूजा होती है।
मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की सारी बाधाएं दूर होती हैं। भक्त इस दिन व्रत रखकर भय और शत्रुओं से मुक्ति पाते हैं। इस विशेष दिन पर शनि और राहु के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए पूजा-अर्चना की जाती है।
इस दिन व्रत रखने और रात्रि में विधि-विधान से पूजन करने से जीवन में सुख, शांति और आत्मविश्वास का संचार होता है। साल 2026 में ये पर्व आज 10 अप्रैल को मनाया जा रहा है। आइए जानें...
शनि-राहु के दोषों से मिलेगी मुक्ति
शास्त्रों में काल भैरव को समय का अधिपति देव माना जाता है। उनकी शरण में आने से मन का अनजाना डर खत्म होता है। जो लोग मानसिक तनाव में रहते हैं, उनके लिए ये शुभ है।
काल भैरव की कृपा से नकारात्मक शक्तियां घर से दूर रहती हैं। यह व्रत पूर्व जन्म के पापों के असर को भी घटाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, इस बार की कालाष्टमी ज्योतिषीय दृष्टि से बहुत ही खास है।
इस दौरान शनि मीन राशि में अस्त स्थिति में रहेंगे। वहीं राहु ग्रह कुंभ राशि में विराजमान रहने वाले हैं। इन ग्रहों का प्रभाव सीधे हमारे मन और सोच पर पड़ता है। काल भैरव की पूजा से इन ग्रहों के दोष कम होते हैं।
मार्कंडेय ऋषि और काल भैरव की रोचक कथा
पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, ऋषि मार्कंडेय की कथा समय पर विजय पाने की सबसे अद्भुत कहानी है। मार्कंडेय ऋषि को अल्पायु (कम उम्र) होने का श्राप था। उनकी आयु केवल 16 वर्ष तय की गई थी।
जब उनकी मृत्यु का समय निकट आया, तो वे भगवान शिव की भक्ति में लीन हो गए। यमराज जब उनके प्राण लेने पहुंचे, तब मार्कंडेय ने काल भैरव रूपी शिवलिंग को मजबूती से गले लगा लिया।
भक्ति के उस चरम क्षण में स्वयं महाकाल प्रकट हुए। उन्होंने समय के चक्र को ही रोक दिया। काल भैरव की शक्ति से समय ठहर गया और मृत्यु के देवता यमराज को पीछे हटना पड़ा।
इस चमत्कार के कारण मार्कंडेय ऋषि हमेशा के लिए 15 वर्ष की आयु पर स्थिर हो गए। वे चिरंजीवी बन गए। ये कथा सिद्ध करती है कि काल भैरव में सर्वोच्च शक्ति हैं, जो समय (काल) को नियंत्रित कर सकते हैं। वे अपने भक्तों को काल के भय से मुक्त कर देते हैं।
काल भैरव की पूजा विधि
- भगवान काल भैरव अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए।
- साफ कपड़े पहनकर शिव और पार्वती की पूजा करें।
- काल भैरव भगवान शिव का ही एक स्वरूप माने जाते हैं।
- रात के समय उनकी पूजा करना सबसे अधिक फलदायी होता है।
- रात 9 से 11 बजे का समय पूजन के लिए उत्तम है।
- भगवान को गंगाजल चढ़ाएं और फिर तिलक अर्पित करें।
- अक्षत, फूल और सरसों के तेल का दीपक जरूर जलाएं।
- पहले शिव जी की और फिर भैरव जी की आरती करें।
- शिव चालीसा और भैरव चालीसा का पाठ भी करना चाहिए।
- इससे घर में सुख और समृद्धि का वास होता है।
क्या चढ़ाएं और क्या करें दान
- काल भैरव को दान में काली उड़द और सरसों तेल बहुत प्रिय है।
- आप उन्हें कच्चा दूध और मीठी रोटी भी चढ़ाएं।
- काले कुत्ते को भोजन कराना इस दिन सबसे बड़ा पुण्य है।
- दान में जूते, चप्पल या काले कपड़े देना शुभ होता है।
- अपनी क्षमता मुताबिक अन्न का दान भी जरूर करें।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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