नदियों में सिक्के फेंकना सही या गलत, प्रेमानंद महाराज ने बताया सच

Kaushiki | Jun 24, 2026, 11:40 IST
nadi mein sikke dalna sahi ya galat
भारत में नदियों में सिक्के डालने की सदियों पुरानी परंपरा है। प्रेमानंद महाराज ने इस पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने बताया कि सिक्के फेंकने से नदियां केवल प्रदूषित होती हैं। इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण भी जुड़े हैं।

भारत में नदियों में सिक्के फेंककर मन्नत मांगने की परंपरा सदियों पुरानी है। हम जब भी सफर करते हैं, रास्ते में कोई नदी जरूर आती है। आपने देखा होगा कि लोग गाड़ी की खिड़की से सिक्का नीचे फेंकते हैं। शायद आपने भी कभी न कभी नदी में सिक्का जरूर डाला होगा।



लोग इसे धार्मिक आस्था, सुख-समृद्धि और भाग्य चमकाने से जोड़ते हैं। वहीं, प्राचीन विज्ञान के मुताबिक पुराने समय में पानी को शुद्ध करने के लिए नदी में तांबे के सिक्के डाले जाते थे। लेकिन आज के समय में स्टील के सिक्के डालने से केवल प्रदूषण फैल रहा है।



इसी विषय पर वृंदावन के प्रसिद्ध संत बाबा प्रेमानंद महाराज ने गहरी चिंता जताई है। अब ऐसे में क्या यह आदत सही है या गलत? आइए इस बात को बहुत ही सरल शब्दों में विस्तार से समझते हैं।



क्या नदियों में सिक्के डालने से सच में होती है मनोकामना पूरी? प्रेमानंद महाराज ने बताया सच - Preman


प्रेमानंद महाराज ने क्या कहा

मथुरा और वृंदावन के प्रसिद्ध संत बाबा प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने यही सवाल पूछा। भक्त जानना चाहता था कि क्या नदियों में सिक्के डालने चाहिए? इस पर महाराज जी ने सीधी बात कही। उन्होंने बताया कि शास्त्रों में ऐसी कोई आज्ञा नहीं है।



महाराज जी ने कहा कि लोग आजकल अपनी मनमर्जी से नियम बना रहे हैं। नदियों में पैसे फेंकने से किसी भी इंसान का कोई भला नहीं होता। उन्होंने बताया कि केसी घाट पर छोटे लड़के चुंबक लेकर घूमते हैं। वे लड़के नदी में गिरे सारे सिक्के वापस निकाल लेते हैं।



nadi mein sikke dalna


सिक्के फेंकने की जगह क्या करें

प्रेमानंद महाराज ने भक्तों को इसके लिए एक अच्छा उपाय बताया। उन्होंने कहा कि आप नदी के लिए एक रुपए का आटा खरीद लें। फिर उस आटे से छोटी-छोटी कई गोलियां बना लें। इन आटे की गोलियों को श्रद्धा से नदी में डाल दें। इससे नदी में रहने वाले जीवों को सीधे तौर पर भोजन मिल जाएगा।



नदी की मछलियां और कछुए इसे खाकर अपनी भूख मिटा लेंगे। महाराज जी ने कहा कि पैसे फेंकने से सिर्फ हमारी नदियां गंदी हो रही हैं। इसलिए आस्था के साथ विवेक का होना भी बहुत जरूरी है।



नदी में सिक्के क्यों फेंकते हैं लोग


पैसों का सही उपयोग कैसे करें

महाराज जी ने दान करने का एक नया और बेहतर नजरिया दिया। उन्होंने कहा कि अगर आप नदी में सौ रुपए फेंकना चाहते हैं, तो रुकिए। आप उन पैसों से हरा चारा खरीदकर किसी भूखी गाय को खिला दीजिए। इससे आपको गाय की सेवा का बड़ा पुण्य मिलेगा।



इसके अलावा आप वे पैसे किसी बीमार और लाचार व्यक्ति को दे सकते हैं। उन पैसों से किसी भूखे गरीब इंसान को भरपेट भोजन करा सकते हैं। नदी में रुपए फेंकने से आपको कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। हमारी श्रद्धा का हमेशा सही जगह उपयोग होना चाहिए।



Is Throwing Money into a River Right or Wrong Premanand Maharaj Explains. नदी में पैसा फेंकना सही य


सिक्के डालने की धार्मिक मान्यताएं

अगर हम हिंदू धर्म की मान्यताओं को देखें, तो नदियां बहुत पवित्र हैं। नदियों को साक्षात देवी-देवताओं का सुंदर रूप माना जाता है। इसलिए लोग नदी में सिक्का फेंकने को एक तरह का दान मानते हैं। उनका मानना है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।



कई लोगों का सोचना है कि नदी में सिक्का डालने से भाग्य चमकता है। सिक्के के साथ उनकी मनोकामना भी बहती है और पूरी हो जाती है। कुछ लोग मानते हैं कि इससे पूर्वजों की आत्मा को परम शांति मिलती है। इसके बाद उन्हें अगला जीवन भी बहुत अच्छा मिलता है।



सिक्के फेंकने का वैज्ञानिक कारण

अब बात करते हैं इस परंपरा के पीछे छिपे असली वैज्ञानिक कारण की। पुराने जमाने में आज की तरह स्टील के सिक्के नहीं चलते थे। प्राचीन समय में केवल शुद्ध तांबे के सिक्के ही प्रचलन में थे। तांबा एक ऐसी धातु है जो पानी को साफ करती है। नदी का पानी ही पुराने समय में पीने का मुख्य स्रोत होता था। जब लोग नदी में तांबे के सिक्के फेंकते थे, तो पानी शुद्ध होता था। तांबा पानी में मौजूद सभी हानिकारक बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म कर देता था। इसी वैज्ञानिक वजह से यह एक बड़ी परंपरा बन गई।



आज के समय में क्यों है गलत

पुराने समय का विज्ञान आज के समय के हिसाब से पूरी तरह बदल चुका है। आजकल बाजार में तांबे के सिक्के बिल्कुल भी नहीं चलते हैं। अब जो सिक्के बनते हैं, वे स्टील या अन्य धातुओं के होते हैं। ये धातुएं पानी को बिल्कुल भी साफ नहीं करती हैं। उल्टा इन सिक्कों के पानी में रहने से नदियां प्रदूषित हो रही हैं। साथ ही जलीय जीवों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है।



धार्मिक ग्रंथों में भी जबरन सिक्के डालने का कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह पूरी तरह से इंसानों का अपना एक व्यक्तिगत विश्वास (जल प्रदूषण) है। गंगानदियों को साफ रखना हम सभी देशवासियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। अगर हम नदियों में कचरा या सिक्के फेंकेंगे, तो वे गंदी होंगी। इसलिए बाबा प्रेमानंद की बात मानकर हमें जीवों को भोजन देना चाहिए। श्रद्धा के साथ समझदारी दिखाकर ही हम अपनी नदियों को बचा सकते हैं।



FAQ

  1. पुराने समय में नदियों में सिक्के फेंकने की परंपरा क्यों शुरू हुई थी?
    पुराने समय में शुद्ध तांबे के सिक्के चलते थे। तांबा पानी को साफ करने और बैक्टीरिया मारने का काम करता था। नदी का पानी पीने योग्य बना रहे, इसलिए लोग नदी में तांबे के सिक्के डालते थे।
  2. प्रेमानंद महाराज ने नदियों में सिक्के डालने को लेकर क्या सलाह दी है?
    प्रेमानंद महाराज ने कहा कि सिक्के फेंकने से नदियां प्रदूषित होती हैं। इसके बजाय एक रुपए का आटा लेकर छोटी गोलियां बनाएं और नदी के जीवों को खिलाएं। पैसों से गाय को चारा दें या किसी गरीब को भोजन कराएं।
  3. क्या धार्मिक ग्रंथों में नदी में सिक्के डालना अनिवार्य बताया गया है?
    नहीं, धार्मिक ग्रंथों में नदियों में सिक्के डालने की कोई स्पष्ट या अनिवार्य मान्यता नहीं मिलती है। यह केवल लोगों का एक व्यक्तिगत विश्वास और सदियों से चली आ रही एक सामाजिक परंपरा है।

ये खबरें भी पढ़ें...



इस मंदिर में महिलाएं पीरियड्स में भी करती हैं पूजा, गर्भगृह में पुरुषों का प्रवेश वर्जित



हिंदू धर्म में पूजा करते समय सही आसन पर बैठना क्यों है जरूरी, यहां जानें जरूरी नियम



गीता में कृष्ण ने क्यों कहा मैं वृक्षों में पीपल हूं, जानें पीपल पूजा के नियम



अयोध्या राम मंदिर में कितने कमरे हैं, कहां गिना जाता है दान में मिलने वाला कैश



Tags:
  • हिंदू धर्म
  • जल प्रदूषण
  • गंगा
  • सिक्के
  • प्रेमानंद महाराज
  • धार्मिक आस्था