दानवीर कर्ण की एक भूल से कैसे शुरू हुई पितृ पक्ष की परंपरा, जानें पितृ पक्ष की कथा

Kaushiki | Sept 10, 2026, 12:30 IST
Pitru Paksha Story
महाभारत के दानवीर कर्ण की एक भूल से पितृ पक्ष की शुरुआत मानी जाती है। मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचने पर कर्ण को खाने में केवल सोना मिला। इसके बाद यमराज और इंद्रदेव की आज्ञा से कर्ण 15 दिन के लिए धरती पर आए और पितरों का तर्पण किया।

Pitru Paksha Story: महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण को सबसे बड़ा दानवीर माना जाता है। कहा जाता है कि कर्ण के द्वार से कभी कोई खाली हाथ वापस नहीं जाता था। जो भी उनसे जो कुछ मांगता, वे खुशी से दे देते थे।



कर्ण ने जीवन भर सोना, चांदी और कीमती रत्नों का खुलकर दान किया। उनकी इस दानशीलता की चर्चा तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी। लेकिन कर्ण से जीवन में अनजाने में एक बड़ी भूल हो गई थी।



उनकी यही एक भूल आगे चलकर पितृ पक्ष की वजह बनी। इसी कारण आज हम सब अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं। आइए जानें दानवीर कर्ण की एक भूल से कैसे शुरू हुई पितृ पक्ष की परंपरा और भूल सुधारने के लिए उन्होंने क्या किया।



साल 2026 में कब है पितृ पक्ष

पंचांग के मुताबिक, साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर (पूर्णिमा श्राद्ध) से होगी। जबकि मुख्य प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर 2026 से शुरू होगा। इसका समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।



पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियां 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेंगी। इस बार 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। इसके तुरंत बाद शारदीय नवरात्र की शुरुआत होगी।



मृत्यु के बाद जब कर्ण पहुंचे स्वर्गलोक

महाभारत के कथा मुताबिक, महाभारत के युद्ध में कर्ण वीरगति को प्राप्त हो गए थे। अपनी दानशीलता और पुण्य कर्मों के कारण वे सीधे स्वर्गलोक पहुंचे। स्वर्ग में देवराज इंद्र ने कर्ण का बहुत भव्य स्वागत किया। स्वर्ग पहुंचने पर कर्ण को बहुत तेज भूख और प्यास लगी।



उन्होंने देवताओं से भोजन और पीने के लिए पानी मांगा। लेकिन जब उनके सामने थाली आई, तो वे हैरान रह गए। थाली में स्वादिष्ट भोजन की जगह केवल शुद्ध सोना रखा हुआ था। पानी के बर्तन में भी केवल पिघला हुआ सोना भरा था। यह देखकर दानवीर कर्ण काफी दुखी और चकित हो गए।



स्वर्ग में भोजन की जगह क्यों मिला सोना

कर्ण ने तुरंत देवराज इंद्र से इस व्यवहार का कारण पूछा। उन्होंने पूछा कि दानवीर होने के बाद भी ऐसा व्यवहार क्यों? मुझे खाने की जगह सोना और गहने क्यों दिए जा रहे हैं?



तब देवराज इंद्र ने मुस्कुराते हुए कर्ण को सच बताया। इंद्रदेव बोले कि आपने जीवन भर केवल सोने-चांदी का दान किया। आपने कभी भी अन्न और जल का दान किसी को नहीं दिया।



इंद्रदेव ने आगे बताया कि इंसान जो दान करता है, वही पाता है। आपने कभी अपने पितरों को याद करके अन्न-जल नहीं चढ़ाया। इसी वजह से आपको खाने में सिर्फ सोना ही मिल रहा है।



कर्ण ने बताई अपनी अनजाने में हुई भूल

महाभारत के कथा मुताबिक, इंद्रदेव की बात सुनकर दानवीर कर्ण बहुत भावुक हो गए। उन्होंने नम्रता से इंद्रदेव को अपनी पूरी मजबूरी बताई। कर्ण ने कहा कि वे अपने असली माता-पिता को नहीं जानते थे।



उन्हें अपने वंश और कुल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसी वजह से वे कभी अपने पितरों का तर्पण नहीं कर पाए। उनसे यह भूल पूरी तरह अनजाने में हुई थी, जानबूझकर नहीं।



कर्ण ने इंद्रदेव से अपनी भूल सुधारने का एक मौका मांगा। उन्होंने कहा कि मुझे अपने पितरों का कर्ज चुकाने का मौका दें। कर्ण की सच्ची बात सुनकर इंद्रदेव का दिल भी पिघल गया।



इंद्रदेव ने दी 15 दिनों की अनुमति

इंद्रदेव ने यमराज से बात करके एक विशेष रास्ता निकाला। उन्होंने कर्ण को 15 दिनों के लिए वापस धरती पर भेजा। इन 15 दिनों में कर्ण को अपने पितरों का तर्पण करना था।



कर्ण भाद्रपद माह की पूर्णिमा को फिर से धरती पर वापस आए। धरती पर आकर उन्होंने लगातार 15 दिनों तक अन्न और जल दान किया। उन्होंने अपने सभी पूर्वजों का ध्यान करके तर्पण और श्राद्ध किया।



कर्ण ने भूखे लोगों और ब्राह्मणों को भरपेट खाना खिलाया। उन्होंने अपने पितरों के नाम से जल अर्पित करके शांति मांगी। इस प्रकार कर्ण ने अपनी उस बड़ी भूल को पूरी तरह सुधारा।



इस तरह हुई पितृ पक्ष की पावन शुरुआत

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, 15 दिनों तक तर्पण करने के बाद कर्ण वापस स्वर्गलोक लौट गए। स्वर्ग पहुंचते ही उन्हें पेट भर स्वादिष्ट भोजन और जल मिला। कर्ण की आत्मिक शांति के बाद यह 15 दिन बेहद पवित्र माने गए।



माना जाता है कि तभी से पितृ पक्ष की परंपरा शुरू हुई। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक का समय पितृ पक्ष कहलाया। इन 15 दिनों को हम श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जानते हैं।



आज भी लोग इन 15 दिनों में अपने पूर्वजों को याद करते हैं। पितरों की आत्मा की शांति के लिए जल और भोजन दान करते हैं। इससे पितरों का आशीर्वाद पूरे परिवार पर हमेशा बना रहता है।



पितृ पक्ष में अन्न और जल दान का महत्व

दानवीर कर्ण की इस कहानी से हमें बहुत बड़ी सीख मिलती है। जीवन में धन और सोना-चांदी दान करना ही सब कुछ नहीं होता। किसी भूखे को खाना खिलाना और प्यासे को पानी देना सबसे बड़ा धर्म है।



पितृ पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों के नाम से दान जरूर करें। कौवे, कुत्ते और गाय को भोजन का हिस्सा जरूर निकालना चाहिए। इससे पितृ दोष दूर होता है और घर में सुख आता है।



अगर आपको अपने पूर्वजों की तिथि याद न हो, तो चिंता न करें। आप सर्वपितृ अमावस्या के दिन तर्पण और दान कर सकते हैं। कर्ण की तरह आपका किया दान सीधे आपके पितरों तक पहुंचता है।



डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। पितरों का श्राद्ध अमावस्या तिथि



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