भगवान विष्णु को प्रिय पर शिव जी को क्यों अप्रिय है शंख, जानें असली वजह
Shiv Puja Rules: हिंदू धर्म में सोमवार का दिन बहुत ही पवित्र माना जाता है। इस दिन भक्त भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि महादेव सबसे भोले और दानी देवता हैं। वह अपने भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव जी को प्रसन्न करना सबसे ज्यादा आसान काम माना जाता है। उनकी पूजा में बहुत ज्यादा तामझाम की जरूरत नहीं होती है।
शिव जी को केवल एक लोटा जल ही काफी होता है। लेकिन शिव पूजा के भी कुछ विशेष और नियम होते हैं। इन नियमों का पालन करना हर भक्त के लिए बहुत जरूरी है। भगवान शिव की पूजा में कुछ चीजें पूरी तरह निषेध हैं।
इन वर्जित चीजों में शंख का नाम सबसे ऊपर आता है। पूजा के दौरान शंख बजाना या जल देना वर्जित माना जाता है। अगर आप शंख से जलाभिषेक करेंगे तो महादेव नाराज हो जाएंगे। आइए जानें इसके पीछे की पौराणिक वजह क्या है।
शिवपुराण में मिलती है यह कथा
इस पूरे रहस्य का वर्णन पवित्र ग्रंथ शिवपुराण में विस्तार से मिलता है। बहुत समय पहले शंखचूड़ नाम का एक महापराक्रमी राक्षस रहता था। वह बहुत ही शक्तिशाली और देवताओं के लिए एक बड़ा संकट था। शंखचूड़ असल में दैत्यराज दंभ का इकलौता और लाडला बेटा था। दैत्यराज दंभ के पास पहले कोई भी संतान नहीं थी।
संतान पाने के लिए दंभ ने बहुत कठिन तपस्या की थी। उसने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया था। उसकी कठिन भक्ति से खुश होकर भगवान विष्णु ने दर्शन दिए। श्रीहरि ने दंभ से अपनी इच्छा का कोई वरदान मांगने को कहा। तब दंभ ने तीनों लोकों में सबसे शक्तिशाली पुत्र मांगा था।
दंभ ने ऐसा बेटा मांगा जिसे कोई भी हरा न सके। भगवान विष्णु ने उसकी यह इच्छा पूरी करते हुए तथास्तु कह दिया। इसके कुछ समय बाद दंभ के घर शंखचूड़ का जन्म हुआ। बड़ा होकर शंखचूड़ भी अपने पिता की तरह बहुत पराक्रमी बना। उसने भी अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए एक नई योजना बनाई।
ब्रह्माजी से मिला अजेय वरदान
शंखचूड़ ने पुष्कर नामक पवित्र स्थान पर जाकर तपस्या शुरू की। उसने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए बहुत कठिन व्रत किए। उसकी घोर तपस्या देखकर ब्रह्माजी स्वयं उसके सामने प्रकट हो गए। ब्रह्माजी ने शंखचूड़ से उसकी इच्छा का वरदान मांगने को कहा। तब शंखचूड़ ने देवताओं से कभी न हारने का वरदान मांगा।
ब्रह्माजी ने उसकी बात मान ली और उसे वरदान दे दिया। इसके साथ ही ब्रह्माजी ने उसे एक विशेष श्रीकृष्णकवच भी दिया। यह कवच उसे हर संकट से सुरक्षित रखने के लिए था। वरदान देने के बाद ब्रह्माजी ने उसे एक और आदेश दिया। उन्होंने उसे धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से विवाह करने को कहा।
ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर शंखचूड़ ने देवी तुलसी से विवाह कर लिया। तुलसी एक बहुत ही पवित्र और महान पतिव्रता स्त्री थीं। विवाह के बाद शंखचूड़ की ताकत और भी ज्यादा बढ़ गई थी। उसके पास ब्रह्माजी का वरदान और तुलसी का पतिव्रत धर्म था। इस कारण वह पूरी तरह से अमर और अजेय बन गया था।
जब राक्षस के अहंकार ने मचाया कोहराम
अजेय वरदान मिलने के बाद शंखचूड़ के अंदर बहुत अहंकार आ गया। उसने अपनी विशाल सेना के साथ तीनों लोकों पर हमला कर दिया। उसने स्वर्ग पर कब्जा करके देवताओं को वहां से बाहर निकाल दिया। सभी देवता अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भटकने लगे थे। शंखचूड़ के अत्याचारों से पूरी सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई थी।
परेशान होकर सभी देवता मदद मांगने भगवान विष्णु के पास पहुंचे। देवताओं ने विष्णु जी से इस दुष्ट राक्षस को मारने की गुहार लगाई। लेकिन भगवान विष्णु ने स्वयं दंभ को यह वरदान दिया था। वह अपने ही दिए वरदान को झूठा नहीं कर सकते थे। इसलिए विष्णु जी ने देवताओं को एक दूसरा उपाय सुझाया।
उन्होंने देवताओं से कहा कि वे भगवान शिव के पास जाएं। केवल महादेव ही अब इस भयंकर समस्या का हल निकाल सकते हैं। सभी देवता तुरंत कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। महादेव ने देवताओं के दुख दूर करने का तुरंत फैसला कर लिया। वह अपनी दिव्य सेना लेकर शंखचूड़ से युद्ध करने निकल पड़े।
महादेव और शंखचूड़ का युद्ध
रणभूमि में भगवान शिव और शंखचूड़ के बीच भीषण युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध कई दिनों तक लगातार चलता रहा पर कोई नतीजा नहीं निकला। श्रीकृष्ण कवच होने के कारण शंखचूड़ को खरोंच तक नहीं आ रही थी। साथ ही उसकी पत्नी तुलसी का पतिव्रत धर्म उसकी रक्षा कर रहा था। इस कारण स्वयं भगवान शिव भी उसका वध नहीं कर पा रहे थे।
यह देखकर भगवान विष्णु ने एक अद्भुत माया रचने की योजना बनाई। उन्होंने एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया और युद्धभूमि में गए। ब्राह्मण रूप में उन्होंने शंखचूड़ से उसका श्रीकृष्णकवच दान में मांग लिया। दानवीर होने के कारण शंखचूड़ ने अपना वह दिव्य कवच दान कर दिया। कवच मिलते ही शंखचूड़ की आधी ताकत तुरंत खत्म हो गई थी।
इसके बाद भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण कर लिया। वह शंखचूड़ बनकर सीधे उसकी पत्नी देवी तुलसी के पास पहुंच गए। वहां जाकर उन्होंने तुलसी के पवित्र पतिव्रत धर्म को भंग कर दिया। पतिव्रत धर्म टूटते ही शंखचूड़ का दूसरा सुरक्षा कवच भी पूरी तरह टूट गया। अब वह दुष्ट राक्षस पूरी तरह से असुरक्षित और कमजोर हो चुका था।
त्रिशूल से हुआ पापी राक्षस का अंत
जैसे ही शंखचूड़ की सारी शक्तियां खत्म हुईं, महादेव ने अवसर देखा। भगवान शिव ने तुरंत अपना सबसे शक्तिशाली और अचूक त्रिशूल उठाया। उन्होंने त्रिशूल से वार करके शंखचूड़ को तुरंत भस्म कर दिया। इस तरह उस अत्याचारी और पापी राक्षस का हमेशा के लिए अंत हुआ। शंखचूड़ के मरते ही पूरी सृष्टि और सभी देवताओं ने राहत की सांस ली।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, शंखचूड़ के भस्म होने के बाद एक चमत्कार हुआ। उसकी पवित्र हड्डियों के अवशेषों से ही शंख का जन्म हुआ था। शंखचूड़ अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का एक परम भक्त था। इसी वजह से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को शंख बहुत प्रिय है। वे दोनों हमेशा अपनी पूजा में शंख को बहुत चाव से शामिल करते हैं।
भगवान विष्णु की पूजा में शंख
भगवान विष्णु की पूजा में शंख से जल चढ़ाना सबसे उत्तम मानते हैं। सभी देवी-देवताओं को शंख के जल से स्नान कराया जा सकता है। लेकिन भगवान शिव ने स्वयं उस राक्षस का भयंकर वध किया था। इसलिए महादेव की पूजा में शंख का उपयोग पूरी तरह वर्जित है। भूलकर भी कभी शिव जी को शंख से जल अर्पित नहीं करना चाहिए।
ऐसा करने से भोलेनाथ बहुत ज्यादा क्रोधित और नाराज हो सकते हैं। सोमवार की पूजा में हमेशा तांबे के लोटे का उपयोग करना चाहिए। तांबे या पीतल के पात्र से जल चढ़ाना सबसे फलदायी माना जाता है। तभी आपको भगवान भोलेनाथ की पूजा का पूरा फल प्राप्त होगा। आपकी हर मनोकामना पूरी होगी और घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहेगी।
तुलसी और शंख का गहरा संबंध क्या है
शिवपुराण के मुताबिक, शंखचूड़ की मृत्यु के बाद देवी तुलसी बहुत दुखी हो गई थीं। उन्हें जब सच पता चला तो उन्होंने विष्णु जी को श्राप दिया। बाद में विष्णु जी ने तुलसी को अपनी प्रिय बनने का वरदान दिया। तुलसी के पौधे को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र माना जाता है। तुलसी की तरह ही शंख को भी बहुत ही पवित्र माना जाता है।
शंख की ध्वनि से घर की सभी नकारात्मक शक्तियां दूर भाग जाती हैं। जिस घर में शंख बजाया जाता है वहां लक्ष्मी का वास होता है। लेकिन भगवान शिव का पूजन में तुलसी और शंख दोनों वर्जित हैं। क्योंकि दोनों का संबंध उसी शंखचूड़ नामक राक्षस से ही जुड़ा है। शास्त्रों के इन नियमों का पालन करने से जीवन में खुशहाली आती है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQ
- भगवान शिव की पूजा में शंख का उपयोग क्यों वर्जित है?
शिवपुराण के मुताबिक, भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के एक अत्याचारी राक्षस का वध किया था। शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख का निर्माण हुआ था। चूंकि शिव जी ने उसका वध किया था, इसलिए उनकी पूजा में शंख का उपयोग वर्जित है। - भगवान विष्णु को शंख इतना प्रिय क्यों है?
शंखचूड़ अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसकी हड्डियों से शंख बना, इसी वजह से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को शंख अत्यंत प्रिय है और वे इसकी पूजा सहर्ष स्वीकार करते हैं। - सोमवार को शिव जी का जलाभिषेक किस पात्र से करना चाहिए?
सोमवार के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक हमेशा तांबे, पीतल या चांदी के लोटे से करना चाहिए। शंख से जल चढ़ाना पूरी तरह वर्जित है क्योंकि ऐसा करने से महादेव नाराज हो जाते हैं।
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