वट सावित्री व्रत के दिन ये रंग पहनना है मना, पहली बार कर रहे व्रत तो भूलकर भी न करें ये गलतियां
Vat Savitri Vrat 2026:हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का बहुत बड़ा महत्व माना गया है। यह पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस दिन सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज से वापस पाया था।
ज्येष्ठ माह की अमावस्या को महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। सुहागिन महिलाएं निर्जला या फलाहार रहकर पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। अगर आप 2026 में पहली बार यह व्रत उठा रही हैं, तो नियम जानना जरूरी है।
वट सावित्री 2026 का शुभ मुहूर्त
पहली बार व्रत रखने वाली महिलाएं क्या पहनें
कपड़ों के रंग का चुनाव इस दिन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, वट सावित्री व्रत में काले, नीले या सफेद रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
हिंदू धर्म में ये रंग शुभ कार्यों के लिए वर्जित माने जाते हैं। आप लाल, पीला, गुलाबी या हरा रंग चुन सकती हैं। ये रंग सुहाग और खुशहाली का प्रतीक माने जाते हैं। श्रृंगार के सामान में भी गहरे डार्क रंगों का उपयोग न करें।
16 श्रृंगार और शुद्धता का विशेष महत्व
व्रत (Vat Savitri Puja) के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना सबसे पहला काम है। साफ कपड़े पहनकर सूर्य देव को जल अर्पित करें। इसके बाद ही व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
सुहागिनों को इस दिन पूरा 16 श्रृंगार करना चाहिए। हाथों में मेहंदी और माथे पर सिंदूर लगाना बहुत शुभ होता है। पूजा की जगह को भी गंगाजल से साफ करना न भूलें।
पूजा सामग्री में क्या-क्या होना चाहिए
- पहली बार व्रत करने वालों को सामग्री पहले ही जुटा लेनी चाहिए।
- बांस का पंखा, कच्चा सूत और भीगे चने सबसे जरूरी हैं।
- फल, फूल, रोली और अक्षत भी थाली में जरूर रखें।
- सुहाग का सारा सामान माता सावित्री को अर्पित किया जाता है।
- पूजा के बाद सावित्री और सत्यवान की कथा जरूर सुनें।
- कथा के बिना इस व्रत का फल अधूरा माना जाता है।
परिक्रमा के खास नियम
बरगद के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। पूजा के दौरान पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटना चाहिए। परिक्रमा करते समय अपने मन में पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
आप 5, 7, 11 या 108 बार परिक्रमा कर सकती हैं। परिक्रमा हमेशा शांत मन और श्रद्धा के साथ करनी चाहिए। इससे घर में सुख और शांति का वास होता है।
आप अपनी क्षमता के मुताबिक, परिक्रमा की संख्या चुन सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे कि बीच में परिक्रमा अधूरी न छोड़ें। पूजा पूरी होने के बाद अपनी सासु मां का आशीर्वाद लें।
उन्हें उपहार या पैसे देकर पैर छूना शुभ होता है। पूजा की सामग्री और अनाज का दान किसी ब्राह्मण को दें। दान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन मन में किसी के प्रति कड़वाहट न रखें। वाद-विवाद से दूर रहें और अपना मन पूजा में लगाएं।
वट सावित्री की पूजा विधि
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी नहाकर व्रत का संकल्प लें और सूर्य को जल दें।
- सफाई: बरगद के पेड़ के नीचे की जगह को साफ कर गंगाजल से शुद्ध करें।
- स्थापना: पेड़ के पास सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- जल अर्पण: वट वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं और फूल, अक्षत, धूप अर्पित करें।
- कच्चा सूत: पेड़ के तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए 5, 7 या 108 बार परिक्रमा करें।
- कथा श्रवण: हाथ में भीगे चने लेकर सावित्री और सत्यवान की कथा (वट सावित्री व्रत कथा)जरूर सुनें।
- दान और आशीर्वाद: वट सावित्री पूजा के बाद सासु मां को सुहाग सामग्री दें और दान करें।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQ
- वट सावित्री व्रत में बरगद (वट) के पेड़ की ही पूजा क्यों की जाती है?
हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक, वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ में त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—का वास माना जाता है। बरगद का पेड़ अपनी लंबी आयु और मजबूती के लिए जाना जाता है, जो अमरत्व का प्रतीक है। सावित्री ने इसी पेड़ के नीचे अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाने के लिए तपस्या की थी। इसीलिए महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और स्थिर सुहाग के लिए इस पेड़ की पूजा और परिक्रमा करती हैं। - वट सावित्री व्रत के दिन काले या सफेद रंग के कपड़े क्यों नहीं पहनने चाहिए?
सनातन धर्म में वट सावित्री को सुहाग का उत्सव माना गया है। काला रंग शोक और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है, जबकि सफेद रंग को सुहाग के कार्यों में अशुभ माना गया है। चूंकि यह व्रत पति की लंबी आयु और जीवन में खुशहाली लाने के लिए किया जाता है, इसलिए सौभाग्य के प्रतीक रंगों जैसे लाल, पीला, हरा और गुलाबी रंग के कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है। - वट सावित्री व्रत का पारण कैसे किया जाता है और इसके क्या नियम हैं?
वट सावित्री व्रत का पारण आमतौर पर पूजा के बाद किया जाता है। महिलाएं बरगद की कोपल (नई पत्ती) और भीगे हुए चने को निगलकर अपना व्रत खोलती हैं। कई जगहों पर पूजा के बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। व्रत खोलने से पहले दान-पुण्य करना और बड़ों का आशीर्वाद लेना अनिवार्य है। पारण के समय तामसिक भोजन (प्याज-लहसुन) का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
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