स्किल डेवलपमेंट में आगे, फिर भी टेक्निकल एजुकेशन में क्यों पीछे हैं बेटियां? जानें क्या कहती है नीति आयोग की रिपोर्ट
आज के दौर में देश की बेटियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। वे ट्रेनिंग लेने में लड़कों को पछाड़कर तेजी से आगे निकल रही हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, विभिन्न योजनाओं में बेटियों की उपस्थिति बहुत स्ट्रांग नजर आती है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट 'गर्ल्स एंड विमेन एट द सेंटर: एडवांसिंग नॉन-ट्रेडिशनल लाइवलीहुड्स इन इंडिया' ने इस सच्चाई को सामने रखा है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में लड़कियां लड़कों से आगे हैं।
इस योजना में सर्टिफाइड कैंडिडेट्स में महिलाओं की भागीदारी 56.36 फीसदी है। लेकिन जैसे ही बात मशीन, मोटर या बिजली के काम की आती है। वहां महिलाओं की संख्या बहुत कम हो जाती है। आंकड़े बताते हैं कि समस्या बेटियों के कौशल में नहीं है। असली वजह समाज की पुराणी सोच और लिमिटेड ऑप्शन हैं।
इसके बावजूद देश के कई राज्यों में महिलाएं बदलाव ला रही हैं। जयपुर में ई-रिक्शा और मध्य प्रदेश में राजमिस्त्री बनकर बेटियां मिसाल दे रही हैं। सामाजिक पाबंदियों को तोड़कर लड़कियां अब तकनीकी काम सीख रही हैं। यह बदलाव आने वाले समय में देश की तस्वीर बदल सकता है।
आईटीआई और तकनीकी ट्रेड की हकीकत
योजनाओं में आगे रहने के बावजूद आईटीआई के तकनीकी ट्रेनिंग कोर्सेज में बेटियां पीछे छूट जाती हैं। साल 2019 से 2024 के दौरान आईटीआई में कुल 44.79 लाख युवाओं ने एडमिशन लिया। इसमें छात्राओं की संख्या महज 5.67 लाख यानी 12.65% रही।
सबसे बड़ी खाई इंजीनियरिंग ट्रेड में देखने को मिली है। यहाx कुल 38.5 लाख एडमिशन्स में छात्राएं केवल 5.5% यानी करीब 2.11 लाख थीं। इलेक्ट्रिशियन में 4.8%, वायरमैन में 6.8%, फिटिंग में 3.4% और वेल्डिंग में केवल 3.5% बेटियां ही एडमिशन लेती हैं।
नॉन-इंजीनियरिंग ट्रेड में महिलाओं का दबदबा
टेक्नोलॉजी के कामों से परफ्यूम ट्रेडिशनल सेक्टर्स में महिलाओं की संख्या बहुत अधिक है। ब्यूटी स्किल्स के कोर्स में महिलाओं की भागीदारी 98.3% है। फैशन डिजाइन में 97.9% और सिलाई तकनीक में 93% महिलाएं ट्रेनिंग ले रही हैं।
इसके मुकाबले मोटर वाहन मिस्त्री में केवल 2.7% और प्लंबर कोर्स में 2.9% महिलाएं हैं। इंस्टीटूशन्स में बेसिक एमेनिटीज का न होना भी बेटियों को इन कोर्सेज से दूर रखता है। नियुक्तियों के समय कंपनियों की संकीर्ण मानसिकता भी एक बड़ी बाधा बनकर सामने आती है।
आईटीआई जैसी ट्रेनिंग से दूरी के मेन कारण
सामाजिक मान्यताएं बेटियों को तकनीकी और भारी कामों से दूर रहने की सलाह देती हैं। घर से दूर बने ट्रेनिंग सेंटर्स तक सेफ मूवमेंट के साधनों की भारी कमी है। कई सेंटरों में लड़कियों के लिए शौचालय जैसी सुविधाएं तक नहीं होती हैं।
परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ भी बेटियों को लंबे समय वाले तकनीकी कोर्सेज से रोकता है। साथ ही तकनीकी क्षेत्र के मालिक महिलाओं को नौकरी देने में संकोच करते हैं। इस वजह से बेटियां सुरक्षित और पारंपरिक ट्रेड्स को चुनना ज्यादा पसंद करती हैं।
मध्य प्रदेश में बेटियां बनीं कुशल राजमिस्त्री
पुरानी सोच को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश ने एक बेहद सराहनीय पहल शुरू की है। राज्य सरकार ने महिलाओं को निर्माण क्षेत्र में उतारकर महिला राजमिस्त्री का ट्रेनिंग दिया। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत करीब नौ हजार महिलाओं को यह ट्रेनिंग मिली।
जिस क्षेत्र पर कभी सिर्फ पुरुषों का अधिकार माना जाता था, वहां अब बेटियां दीवारें चुन रही हैं। नीति आयोग ने इस पहल की जमकर तारीफ की है। यह प्रयोग साबित करता है कि अवसर मिलने पर महिलाएं हर चुनौती पार कर सकती हैं।
जयपुर और अन्य राज्यों की इंस्पिरेशनल स्टोरी
जयपुर में पिंकसिटी ई-रिक्शा मॉडल आत्मनिर्भरता का बहुत बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। कम आय वाले परिवारों की महिलाओं को ई-रिक्शा चलाने और उनकी मरम्मत की ट्रेनिंग दी गई। अब वे न केवल रिक्शा चला रही हैं, बल्कि अपनी गाड़ी का रखरखाव भी खुद करती हैं।
केरल में महिलाओं ने कचरा प्रबंधन, नलासाजी और डिजिटल सेवाओं में कदम रखा है। ओडिशा में सुदक्षा योजना से आईटीआई में बेटियों की फीस माफ कर छात्रावास दिए गए। झारखंड की तेजस्विनी पहल और भुवनेश्वर का मो ई-राइड मॉडल भी बदलाव ला रहा है।
टेक्निकल सेक्टर में बदलाव की सख्त जरूरत
अगर हमें देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है तो बेटियों को आगे लाना होगा। केवल पारंपरिक कामों तक उन्हें सीमित रखना उनके कौशल के साथ नाइंसाफी है। तकनीकी शिक्षा में छात्राओं को विशेष स्कॉलरशिप और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
आईटीआई और पॉलीटैक्निक संस्थानों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होंगे। उद्योगों को भी अपनी सोच बदलकर महिला टेक्निशंस को रोजगार में प्राथमिकता देनी होगी। जब सोच बदलेगी, तभी तकनीकी ट्रेनिंग में बेटियों की संख्या तेजी से बढ़ेगी।
ये खबर क्यों जरूरी है
Skill Development के आंकड़े उम्मीद जगाते हैं कि देश की बेटियां सशक्त हो रही हैं। तकनीकी ट्रेनिंग में मौजूद खाई को पाटने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
समाज, सरकार और उद्योगों को मिलकर सुरक्षित माहौल तैयार करना होगा। जब बेटियां हेवी मशीनरी से लेकर डिजिटल तकनीक तक संभालेंगी, तभी सच्चा विकास होगा। मध्यप्रदेश और जयपुर जैसे मॉडल्स को पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।
FAQs:
- बेटियों की तकनीकी शिक्षा में भागीदारी क्यों कम है?
बेटियों की तकनीकी शिक्षा में भागीदारी कम होने के पीछे सामाजिक मान्यताएं, असुरक्षित वातावरण, और प्रशिक्षण सेंटरों में सुविधाओं की कमी जैसे कई कारण हैं। - मध्य प्रदेश में बेटियों के लिए क्या विशेष पहल की गई है?
मध्य प्रदेश सरकार ने बेटियों को निर्माण क्षेत्र में उतारने के लिए महिला राजमिस्त्री के प्रशिक्षण का विशेष कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके तहत करीब नौ हजार महिलाओं को प्रशिक्षण मिला है। - देश की बेटियों का कौशल विकास कैसे हो सकता है?
बेटियों का कौशल विकास बेहतर तकनीकी ट्रेनिंग, विशेष स्कॉलरशिप, और सुरक्षा के मजबूत इंतजाम करने से संभव होगा। इसके साथ ही उद्योगों को भी महिला तकनीशियनों को प्राथमिकता देनी होगी।