अब बच्चे नहीं, घर और बाजार के फाइनेंशियल बॉस बन रहे हैं Gen Alpha Generation, जानें कैसे

Kaushiki | Apr 17, 2026, 11:38 IST
AI News
भारतीय किशोर अब सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि ब्रांड चुनने वाले पावरफुल खिलाड़ी हैं। 70% बच्चे कमाई के रास्ते ढूंढ रहे हैं और 31% बचत कर रहे हैं।

Gen Alpha Generation: जरा सोचिए, आपके घर का 10 साल का बच्चा आपको बता रहा है कि कौन सा फोन खरीदना है। ये कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि आज के भारत की असली हकीकत है। साल 2010 के बाद पैदा हुए बच्चों को हम जेन अल्फा कहते हैं।



ये बच्चे अब सिर्फ खिलौनों की जिद नहीं करते। वे अब परिवार के हर छोटे-बड़े फाइनेंसियल डिशन्स ले रहे हैं। स्कैम कैपिटल की जेन जेड डिकोडेड रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ये बच्चे अब पूरी तरह बदल चुके हैं।



वे अब सिर्फ पॉकेट मनी खर्च करने वाले मासूम बच्चे नहीं रहे। टेकनीक और ब्रांड्स की गहरी समझ रखने वाले ये डिजिटल नेटिव्स इंडियन इकॉनमी की नई दिशा तय कर रहे हैं। वे अब ब्रांड्स, फीचर्स और पैसों की समझ रखने वाले स्मार्ट एक्सपर्ट्स हैं। चलिए, जानते हैं इस पीढ़ी के बढ़ते दबदबे की पूरी कहानी।



GENERATION


कौन हैं जेन अल्फा और क्यों हैं इतने खास

जेनरेशन का मतलब है एक ही समय में पैदा हुए लोगों का ग्रुप। इन लोगों की सोच और आदतें लगभग एक जैसी होती हैं। समय के साथ तकनीक बदल गई और नई पीढ़ियां आती गईं। मार्केटिंग की दुनिया में पीढ़ियों को अलग-अलग नाम दिए गए हैं। आइए जानें…



  • साइलेंट जेनरेशन (1928-1945):
    ये जेनरेशन बहुत ही अनुशासित और कड़ी मेहनत करने वाली मानी जाती है। इन्होंने युद्ध और आर्थिक मंदी का कठिन समय करीब से देखा।
  • बेबी बूमर्स (1946-1964):
    दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस जेनरेशन का जन्म हुआ था। ये लोग परिवार और करियर में स्थिरता को बहुत महत्व देते हैं।
  • जेन एक्स (1965-1980):
    इस जेनरेशन ने दुनिया में कंप्यूटर और तकनीक की शुरुआत देखी। ये लोग काम और निजी जीवन में संतुलन बनाना जानते हैं।
  • मिलेनियल्स / जेन वाई (1981-1996):
    इन्होंने इंटरनेट और सोशल मीडिया (parenting) के दौर को जन्म दिया है। ये जेनरेशन बदलाव और नए एक्सपीरियंस के लिए हमेशा तैयार रहती है।
  • Gen Z जनरेशन (1997-2012):
    ये जेनरेशन पूरी तरह से स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट वाली है। ये लोग सोशल इश्यूज और डिजिटल आजादी पर यकीन रखते हैं।
  • जेन अल्फा (2010-2024):
    ये सबसे नई जेनरेशन है जो पूरी तरह डिजिटल दुनिया में है। इनके लिए एआई और स्क्रीन ही सब कुछ बन चुके हैं।

70% को है कमाई की तलाश

स्कैम कैपिटल की जेन जेड डिकोडेड रिपोर्ट की सबसे हैरान करने वाली बात उनकी फाइनेंसियल सोच है। भारत के 70% किशोर अब खुद पैसे कमाने के तरीके खोज रहे हैं।



वे गेमिंग, कंटेंट क्रिएशन या कोडिंग के जरिए आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं। वहीं, 31% बच्चे अपनी पॉकेट मनी को फालतू खर्च नहीं करते। वे अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा भविष्य के लिए बचा रहे हैं।



केवल 17% बच्चे ही ऐसे हैं जो माता-पिता की अनुमति पर खर्च करते हैं। बाकी बच्चे अपनी पसंद और रिसर्च के आधार पर फैसले लेते हैं। खर्च करने से पहले 25% बच्चे माता-पिता से मशवरा जरूर करते हैं।



घर के बजट पर बच्चों का कब्जा

आजकल घर का राशन हो या नई कार, बच्चे सब जानते हैं। सर्वे के मुताबिक, 66% बच्चे घर की रोजमर्रा की खरीदारी एफेक्ट करते हैं। 50% बच्चे तो सीधे अपनी पसंद के ब्रांड की मांग करते हैं। उन्हें अब सिर्फ चॉकलेट नहीं, बल्कि स्पेसिफिक ब्रांड चाहिए होता है।



खाने-पीने के सामान, कपड़े और मनोरंजन में इनका दबदबा सबसे ज्यादा है। करीब 40% बच्चे माता-पिता के एजुटेक ऐप्स का फैसला भी बदलते हैं। अगर उन्हें फीचर पसंद नहीं आया, तो वे ब्रांड बदल देते हैं। वहीं 42% बच्चे नया फीचर देखते ही दूसरे ब्रांड पर चले जाते हैं।



यूट्यूब और स्मार्टफोन का जादू

इन बच्चों की दुनिया स्क्रीन के चारों तरफ ही घूमती है। करीब 73% बच्चों के पास अब खुद का स्मार्टफोन मौजूद है। वहीं 82% बच्चे अपना ज्यादातर समय यूट्यूब पर बिताते हैं। मनोरंजन के लिए 60% बच्चे ओटीटी प्लेटफॉर्म का यूज कर रहे हैं।



सोशल मीडिया पर भी इनकी पकड़ बहुत ज्यादा मजबूत हो चुकी है। 51% किशोर सोशल मीडिया पर एक्टिवली समय बिता रहे हैं। संगीत में 21% बच्चों को आज भी बॉलीवुड गाने पसंद हैं। वहीं 16% बच्चे इंस्टाग्राम के ट्रेंडिंग गानों के दीवाने बने हुए हैं।



जब दादा-दादी बनते हैं बच्चों के साथी

आज के जेन अल्फा बच्चे बहुत ही होशियार और समझदार हो गए हैं। अपनी बात मनवाने के लिए वे अब खास स्ट्रेटेजी अपनाते हैं। जब माता-पिता किसी चीज के लिए मना कर देते हैं, तो बच्चे हार नहीं मानते। वे तुरंत घर के सबसे नरम दिल वाले सदस्यों के पास जाते हैं।



रिपोर्ट के मुताबिक, 35% बच्चे अब दादा-दादी का स्ट्रेटेजिक सपोर्ट लेते हैं। वे जानते हैं कि बुजुर्गों का प्यार उनकी हर मांग पूरी करवा सकता है। बच्चे दादा-दादी को अपना इमोशनल साथी या पार्टनर बना लेते हैं।



इस तरह वे घर में अपनी बात मनवाने में सफल हो जाते हैं। ये पीढ़ी रिश्तों का इस्तेमाल अपने फायदों के लिए करना बखूबी जानती है। इस तरह वे अपनी हर मांग को पूरी करवा लेते हैं।



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