भारत में बढ़ता Child-Free Trend: 18% जेन जी महिलाएं अब क्यों नहीं चाहतीं बच्चे?
Manya Jain | Mar 18, 2026, 17:29 IST
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भारत में अब 'वंश बढ़ाने' की सोच बदल रही है। महंगाई और निजी आजादी की चाह में युवा जोड़े 'चाइल्ड फ्री' रहने का फैसला ले रहे हैं। जानिए महानगरों में क्यों लोकप्रिय हो रहा है यह नया ट्रेंड।
भारत में वंश बढ़ाना हमेशा से मुख्य लक्ष्य रहा है। लेकिन अब लोगों की सोच तेजी से बदल रही है। आधुनिक जीवनशैली और बढ़ती महंगाई इसके बड़े कारण हैं। 'चाइल्ड फ्री इंडिया' जैसी मुहिम अब जोर पकड़ रही है।
नई पीढ़ी (new generation) के लिए परिवार के मायने बदल गए हैं। जेन-जी और मिलेनियल्स निजी आजादी को ज्यादा महत्व देते हैं। वे सुख-सुविधाओं को संतान प्राप्ति से ऊपर रख रहे हैं। महानगरों के युवा जोड़े अब माता-पिता नहीं बनना चाहते। वे जानबूझकर बिना बच्चों के रहने का विकल्प चुन रहे हैं। जानिए क्या कहती है सर्वे रिपोर्ट....
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विभिन्न फर्टिलिटी केंद्रों और सामाजिक रिसर्च के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों (Metros) में युवा जोड़ों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं।
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संतानहीन जोड़ों की बढ़ती संख्या का असर सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था (Economy) और उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behavior) पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, देश के टॉप 6 करोड़ प्रीमियम उपभोक्ताओं में 'डिंक' (DINK) वर्ग की बड़ी हिस्सेदारी है। इनके पास बच्चों की शिक्षा या पालन-पोषण पर खर्च करने के बजाय खुद पर खर्च करने के लिए अधिक 'डिस्पोजेबल इनकम' होती है।
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नई पीढ़ी (new generation) के लिए परिवार के मायने बदल गए हैं। जेन-जी और मिलेनियल्स निजी आजादी को ज्यादा महत्व देते हैं। वे सुख-सुविधाओं को संतान प्राप्ति से ऊपर रख रहे हैं। महानगरों के युवा जोड़े अब माता-पिता नहीं बनना चाहते। वे जानबूझकर बिना बच्चों के रहने का विकल्प चुन रहे हैं। जानिए क्या कहती है सर्वे रिपोर्ट....
मेट्रो सिटीज में चाइल्ड फ्री का बढ़ता ग्राफ
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विभिन्न फर्टिलिटी केंद्रों और सामाजिक रिसर्च के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों (Metros) में युवा जोड़ों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं।
- नई पीढ़ी (
GEN-Z ) की सोच: 'नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी' (fertility rate) के एक हालिया सर्वे के मुताबिक, करीब 18% युवा महिलाएं भविष्य में बच्चे नहीं चाहतीं। उनका मानना है कि करियर बनाने और खुद की तरक्की के लिए बच्चा एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी हो सकता है। वे अपनी आजादी और काम को ज्यादा अहमियत दे रही हैं। - बड़े शहरों का हाल: दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले 27% जोड़ों ने अपनी मर्जी से बिना बच्चे के रहने का फैसला किया है। ये लोग 28 से 40 साल की उम्र के हैं और अपनी लाइफस्टाइल के साथ समझौता नहीं करना चाहते।
- छोटे परिवार का चलन: इन शहरों में अब ऐसे कपल्स की तादाद 20% से 30% तक पहुँच गई है जिनके या तो बच्चे नहीं हैं या सिर्फ एक बच्चा है। अब लोग 'हम दो, हमारा एक' या 'सिर्फ हम दो' के फॉर्मूले को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
डिंक, डिंकवाड का नया ट्रेंड
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- डिंक (DINK - Double Income No Kids): ऐसे जोड़े जहाँ पति-पत्नी दोनों कमाते हैं, लेकिन उन्होंने जानबूझकर बच्चे न करने (Child Free Trend) का फैसला लिया है।
- डिंकवाड (DINKWAD - Double Income No Kids With A Dog): ये वे जोड़े हैं जो बच्चों के बजाय पालतू जानवरों (Pet Animals) को पालना पसंद करते हैं और उन्हें ही अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं।
- डिस्क (DISC - Double Income Single Child): दोहरी आय वाले वे दंपती जो संसाधनों और समय की कमी के कारण केवल एक ही बच्चा चाहते हैं।
- गिंक (GINK - Green Inclination, No Kids): यह एक नई श्रेणी है जो पर्यावरण और बढ़ती जनसंख्या के दबाव को देखते हुए बच्चे पैदा न करने का निर्णय लेती है।
अर्थव्यवस्था और मार्केट पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, देश के टॉप 6 करोड़ प्रीमियम उपभोक्ताओं में 'डिंक' (DINK) वर्ग की बड़ी हिस्सेदारी है। इनके पास बच्चों की शिक्षा या पालन-पोषण पर खर्च करने के बजाय खुद पर खर्च करने के लिए अधिक 'डिस्पोजेबल इनकम' होती है।
- घूमने-फिरने का शौक: ये जोड़े एडवेंचर और लग्जरी छुट्टियों पर जमकर खर्च करते हैं। उनकी पसंद को देखते हुए अब कंपनियां 'किड्स-फ्री' रिसॉर्ट्स और खास ट्रैवल पैकेज बना रही हैं।
- प्रीमियम शॉपिंग: ये बाजार से बड़ा 'फैमिली पैक' खरीदने के बजाय छोटी और महंगी चीजें लेना पसंद करते हैं। सेहत का ध्यान रखने के लिए ये अक्सर प्रीमियम और ऑर्गेनिक सामान ही चुनते हैं।
- पालतू जानवरों पर प्यार: 'डिंकवाड' कल्चर की वजह से लोग अब बच्चों की तरह पालतू जानवरों को पाल रहे हैं। इस वजह से देश में पेट केयर और जानवरों के सामान का बिजनेस बहुत तेजी से बढ़ रहा है।
- मार्केट में बदलाव: कंपनियां अब इन कपल्स की जरूरतों के हिसाब से नए प्रोडक्ट और सर्विस तैयार कर रही हैं।
आ सकती हैं ये चुनौतियां
- संपत्ति और वारिस: सबसे बड़ा डर यह रहता है कि उनके बाद घर और जमा-पूंजी का क्या होगा। उन्हें चिंता सताती है कि बुढ़ापे में रिश्तेदार उनकी मेहनत की कमाई पर गलत तरीके से कब्जा न कर लें।
- समाज का नजरिया: हमारे समाज में आज भी इस फैसले को 'स्वार्थ' माना जाता है। लोग अक्सर ताने देते हैं या अजीब सवाल पूछते हैं। परिवार का यह दबाव मानसिक तनाव और चिड़चिड़ेपन का कारण बन सकता है।
- अकेलापन और बुढ़ापा: उम्र ढलने पर सेहत बिगड़ने या अकेले रह जाने का डर सबसे ज्यादा सताता है। भविष्य में देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा, यह सोचकर कई बार लोग घबरा जाते हैं।
- फैसले पर सवाल: समाज और अपनों के बीच खुद को सही साबित करना इनके लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
क्यों बढ़ रहा है यह चलन?
- महंगाई (Inflation): बच्चे की परवरिश और शिक्षा का बढ़ता खर्च।
- करियर (Career Goals): काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती।
- स्वतंत्रता (Personal Freedom): बिना किसी बड़ी जिम्मेदारी के दुनिया घूमने और शौक पूरे करने की इच्छा।
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