असंगठित क्षेत्र में रोजगार की स्थिति खराब, 2015-16 से नीचे गिरा स्तर
5 प्वाइंट्स में समझें क्या है पूरा मामला
- भारत के असंगठित विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार एक दशक से नहीं बढ़ा।
- 2025 में इस सेक्टर में 3.5 करोड़ लोग काम कर रहे हैं।
- 2015-16 में यह संख्या 3.6 करोड़ थी, यानी रोजगार घटा है।
- संगठित विनिर्माण में रोजगार इसी दौरान 37 फीसदी बढ़ा है।
- दोनों सेक्टरों में वेतन वृद्धि का अंतर भी बहुत ज्यादा है।
असंगठित क्षेत्र में क्या हो रहा है?
भारत में करोड़ों लोग छोटे और असंगठित कारखानों में काम करते हैं। ये वो जगहें हैं जो सरकारी रजिस्ट्री में नहीं होतीं, जिन्हें इनफॉर्मल (Informal) सेक्टर कहा जाता है। एक ताजा सरकारी सर्वे से पता चला है कि इस सेक्टर में रोजगार लगभग एक दशक से जस का तस है।
यूनिनकॉर्पोरेटेड एंटरप्राइजेज सर्वे (Unincorporated Enterprises Survey) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2025 में असंगठित विनिर्माण में 3.5 करोड़ लोग काम कर रहे थे। जबकि 2015-16 में यह संख्या 3.6 करोड़ थी। यानी न सिर्फ रोजगार रुका, बल्कि थोड़ा घटा भी।
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान असंगठित क्षेत्र में उद्यमों यानी छोटे कारोबारों की संख्या बढ़ी। 2015-16 में 2 करोड़ उद्यम थे, जो 2025 में बढ़कर 2.1 करोड़ हो गए। कारोबार बढ़े, लेकिन नौकरियाँ नहीं।
फॉर्मल सेक्टर ने मारी बाजी
दूसरी तरफ संगठित यानी फॉर्मल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कहानी बिल्कुल अलग है। ASI survey (Annual Survey of Industries) के आंकड़े बताते हैं कि 2023-24 में फॉर्मल मैन्युफैक्चरिंग में करीब 2 करोड़ लोग काम कर रहे थे। यह संख्या 2015-16 की तुलना में 37 फीसदी ज्यादा है।
तो एक तरफ असंगठित क्षेत्र जहाँ रुका हुआ है, वहीं संगठित क्षेत्र लगातार आगे बढ़ रहा है। इसे ही दोनों सेक्टरों के बीच की खाई कहा जा रहा है।
कमाई में भी बड़ा फर्क
सिर्फ रोजगार में ही नहीं, वेतन में भी यह फर्क साफ दिखता है। असंगठित विनिर्माण में एक कामगार की औसत सालाना कमाई 2015-16 में 59 हजार 806 रुपए थी। 2025 में यह बढ़कर 72 हजार 172 रुपए हो गई। लेकिन यह वृद्धि दर महज 2.1 फीसदी सीएजीआर (Compound Annual Growth Rate) सालाना रही, जो महंगाई को देखते हुए बेहद कम है।
इसके उलट संगठित विनिर्माण क्षेत्र में कामगारों को मिलने वाला कुल वेतन 4.5 फीसदी सीएजीआर की दर से बढ़ा। और तो और, फॉर्मल सेक्टर का नेट प्रॉफिट भी इसी दौरान 4.4 फीसदी सीएजीआर की रफ्तार से बढ़ा।
यानी जो बड़ी और पंजीकृत कंपनियाँ हैं, उनके मुनाफे और कर्मचारियों की तनख्वाह दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूर इस फायदे से वंचित हैं।
एक्सपर्ट की राय: यह फॉर्मलाइजेशन नहीं है
यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ (University of Bath) में विजिटिंग प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा ने इस पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में संगठित क्षेत्र को असंगठित क्षेत्र की कीमत पर फायदा हुआ है।
लेकिन मेहरोत्रा साफ कहते हैं कि इसे अर्थव्यवस्था का फॉर्मलाइजेशन (Formalisation) नहीं माना जाना चाहिए। उनके शब्दों में यह अर्थव्यवस्था में बढ़ती असमानता को दर्शाता है। एक छोटा फॉर्मल सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है और उत्पादकता बढ़ा रहा है। लेकिन विशाल असंगठित सेक्टर, जिस पर ज्यादातर आबादी निर्भर है, वह ठहरा हुआ है।
क्यों है यह चिंताजनक?
भारत की ज्यादातर कामकाजी आबादी असंगठित क्षेत्र में है। रोजगार का यह जमाव जब एक दशक तक नहीं बढ़ता, तो इसका मतलब है कि करोड़ों परिवारों की आय में कोई खास सुधार नहीं हुआ। वहीं नए उद्यम जरूर बने, पर उन्होंने प्रति उद्यम रोजगार घटाया (Employment Challenges), यानी कम लोगों से ज्यादा काम।
यह तस्वीर तब और चिंताजनक हो जाती है जब देखते हैं कि फॉर्मल सेक्टर का मुनाफा और वेतन दोनों बढ़ रहे हैं। देश में आर्थिक विकास हो रहा है, लेकिन उसका फायदा असमान तरीके से बँट रहा है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि इसमें सरकारी आंकड़ों के आधार पर रोजगार की असल तस्वीर सामने आती है। भारत में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। उनकी आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य सब कुछ इस सेक्टर की सेहत पर निर्भर है। जब यह सेक्टर एक दशक तक रोजगार के अवसर न बढ़ाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए जीवन के अधिकार और अनुच्छेद 41 में दिए काम के अधिकार पर सीधा सवाल है।
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