NEWS STRIKE: 23 साल का सबसे कम मतदान, दतिया में महिलाओं ने BJP को झटका दिया?
News Strike | न्यूज स्ट्राइक:दतिया का विधानसभा उपचुनाव सिर्फ हार जीत का खेल नहीं है। इस चुनाव के साथ साख जुड़ी है मप्र की मोहन यादव सरकार की और केंद्र में बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की। नितिन नबीन के लिए बड़ी चुनौती इसलिए भी है क्योंकि बिहार में बांकीपुर का उपचुनाव सीधे सीधे उन्हीं की नाक का सवाल भी है।
इसके अलावा और भी जगह उपचुनाव हुए हैं, लेकिन केंद्र से लेकर राज्य की नजर बांकीपुर और दतिया पर ही टिकी है। दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद ये पहली बार उपचुनाव हुए हैं।
इस आंदोलन का कितना असर हुआ। उपचुनाव के नतीजों में इसका भी आंकलन होगा। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि लाडली बहनों ने दतिया उपचुनाव के मतदान में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली।
कम वोटिंग ने बढ़ाई बीजेपी की टेंशन
पिछले कुछ सालों से चुनाव का ट्रेंड और नतीजों का ट्रेंड दोनों ही बदले हुए हैं। कई जगह के मतदान के बाद आपने सुना होगा कि फलां जगह पर बंपर मतदान हुआ। मतदान का प्रतिशत अस्सी, 85 तक पार कर गया।
अमूमन ऐसा होता है तो इसे बदलाव के रूप में देखा जाता है, लेकिन जब से बीजेपी सत्ता में आई है। ये ट्रेंड बदला हुआ है। बंपर वोटिंग के बाद बीजेपी ने सरकार में रहते हुए भी जबरदस्त जीत दर्ज की है।
हाल ही में यानी कि कल ही हुए उपचुनाव बीजेपी के लिए चिंता बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं। वजह है इन चुनावों का बदला हुआ ट्रेंड। गुरुवार 30 जुलाई को बिहार के बांकीपुर और मध्यप्रदेश के दतिया में उपचुनाव हुए। इसके अलावा गुजरात के मंजलपुर में भी उपचुनाव हुआ। इन तीनों ही सीटों पर पहले के चुनावों के मुकाबले काफी कम मतदान हुआ। जो बीजेपी की चिंता बढ़ा रहा है।
मतदान की बात करें तो दतिया में 23 साल का सबसे कम 71.44% मतदान हुआ। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट बांकीपुर में सिर्फ 34.30 फीसद मतदान हुआ। पिछले विधानसभा चुनाव में भी बांकीपुर में 40.97 फीसद मतदान हुआ था। गुजरात की मंजलपुर में भी 37.5% मतदान हुआ।
नितिन नबीन की साख का इम्तिहान
सभी सीटों पर पहले के मुकाबले कम मतदान हुआ है और तीनों ही सीटें बीजेपी के लिए खासी अहम हैं। बात करें बांकीपुर सीट की तो ये सीट नितिन नबीन के प्रभाव वाली सीट मानी जाती है। ये भी कहा जाता है कि ये सीट परंपरागत रूप से उनके परिवार की ही सीट है।
यहां से जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर मैदान में उतरे। एक हार के बाद चुनावी जंग लड़ रहे पीके ने इस मुकाबले को दिलचस्प बना दिया। माना जा रहा है कि अगर पीके हारे भी तो हार जीत का अंतर बहुत कम होगा।
खुद नितिन नबीन 2005 का विधानसभा चुनाव यहां से 51936 मतों से जीते थे। गुजरात की मंजलपुर सीट इसलिए खास है क्योंकि गुजरात तो बीजेपी का गढ़ ही माना जाता है। ये दोनों ही सीट नितिन नबीन की लीडरशिप और प्रभाव का इम्तिहान भी होंगी।
दतिया में बीजेपी की साख दांव पर
यही हाल दतिया सीट का है। जहां मुकाबला और चुनाव दोनों ही सबसे ज्यादा दिलचस्प रहे हैं। नितिन नबीन का तो यहां इम्तिहान है ही। मोहन सरकार की साख भी दांव पर है।
क्योंकि प्रदेश में उनकी सरकार बनने के बाद पहली बार विधानसभा उपचुनाव हो रहे हैं और ये हर राजनीतिक जानकार जानता है कि कोई भी उपचुनाव सरकार का शक्ति परीक्षण भी होता है। इसलिए ये चुनाव जीतना बीजेपी के लिए बहुत जरूरी है।
ये चुनावी मुकाबला पहला दिन से दिलचस्प है। क्योंकि यहां से पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने खुद चुनावी मैदान में उतरने की पूरी तैयारी कर ली थी। पिछला विधानसभा चुनाव वो अप्रत्याशित तरीके से हारे थे। साल 2018 में भी वो बमुश्किल जीत हासिल कर चुके थे।
नरोत्तम के कंधों पर दतिया की जिम्मेदारी
लिहाजा इस बार पार्टी ने उनकी जी तोड़ कोशिश के बाद भी उन्हें टिकट नहीं दिया। कहा गया कि वो किसी भी सर्वे रिपोर्ट में जीतने वाले उम्मीदवार बनकर नहीं उभरे हैं। लिहाजा टिकट दिया गया आशुतोष तिवारी को और जीत का जिम्मा सौंप दिया गया नरोत्तम मिश्रा को।
यानी ये साफ है कि दतिया में हार या जीत जो भी होगी वो नरोत्तम मिश्रा के नाम ही दर्ज होगी। आसुओं के बीच नरोत्तम मिश्रा ने अपने समर्थकों को ये तो कह दिया कि आशुतोष तिवारी में इतनी ताकत नहीं कि उनका टिकट कटा सके। इसलिए उनकी जीत के लिए काम करना है, लेकिन कथनी और करनी में अंतर है या नहीं। इसका खुलासा नतीजों के बाद ही हो सकेगा।
दतिया में बदला महिला वोटिंग ट्रेंड
इस बार दतिया चुनाव का ट्रेंड बेहद चौंकाने वाला है। महिला वोटर्स पिछले चुनाव से बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी हैं। लाड़ली लक्ष्मी से लेकर लाड़ली बहना तक बीजेपी ने माताओं और बहनों को पूरी तरह फोकस में रखा और उन्हें इसका रिटर्न भी चुनाव दर चुनाव मिला। पर दतिया के नतीजे इस मामले में थोड़े अलग हैं। यहां इस बार महिलाओं का वोटिंग पेटर्न बदला हुआ दिखा।
बात विधानसभा चुनाव की ही करते हैं। साल 2023 के चुनाव में महिला वोटर्स वोटिंग के मामले में पुरुषों से आगे थीं। उनका प्रतिशत 1.94 ज्यादा था, लेकिन इस बार वो पीछे है और आंकड़ा सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे।
इस बार महिलाएं मतदान के मामले में पुरुषों से 5.61 प्रतिशत पीछे रही हैं। इलेक्शन एक्सपर्ट्स के मुताबिक 2008 से लेकर अब तक हुए चुनावों का ये सबसे बड़ा जेंडर गैप है।
महिला वोटों में आई बड़ी गिरावट
इस उपचुनाव में पुरुष मतदाताओं का प्रतिशत 74.09 परसेंट रहा और महिलाओं का 68.48 प्रतिशत रहा। हालांकि, 2023 के मुकाबले दोनों का ही परसेंट घटा है, जबकि ये तो समझा ही जा सकता है कि वोटर्स हर चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले ज्यादा ही होते हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि महिलाओं से जुड़ी कोई खास योजना या घोषणा न होने की वजह से इस बार उनकी गिनती कम रही।
दतिया में बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती
साल 2023 के चुनाव में लाड़ली बहना महिला मतदाताओं को लुभाने वाला सबसे बड़ा फैक्टर साबित ही थी, लेकिन उपचुनाव में महिलाओं पर फोकस करते हुए कोई खास तैयारी नहीं की गई थी। इसका फायदा कांग्रेस को होता है या बीजेपी को ये देखने वाली बात होगी।
दतिया ऐसी सीट है जहां खोने के लिए कांग्रेस के पास महज एक विधानसभा सीट है, लेकिन बीजेपी के पास खोने के लिए जितनी चीजें हैं डर भी उतना ही ज्यादा है। दतिया सीट पर सबोटाज का डर है तो हारने पर सरकार की साख गिरने का भी डर है।
इस सीट पर महिलाओं का कम मतदान टेंशन बढ़ा रहा है तो ये भी साफ हो जाएगा कि बीजेपी का जमीनी नेटवर्क कमजोर पड़ रहा है और डबल इंजन सरकार का जादू कम हो रहा है।
एक दिलचस्प तस्वीर ये भी है कि नरोत्तम मिश्रा के समर्थक उन्हें टिकट न मिलने से नाराज थे और मतदाताओं तक नहीं पहुंचे। तो राजेंद्र भारती के समर्थक भी नाराज और दुखी थे। चुनाव में दोनों की सक्रियता कुछ कम थी। इसका खामियाजा दोनों ही दलों को भुगतना पड़ सकता है।
दतिया में यादव फैक्टर कितना असरदार?
इन सबके साथ आजाद समाज पार्टी को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस पार्टी से दामोदर यादव मैदान में उतरे थे। ये माना जा रहा है कि यादवों का वोट उनके खाते में ही गया होगा। पिछले कुछ समय से दामोदर यादव ओबीसी समाज का भी चेहरा बनते जा रहे हैं। उनकी सभाओं में जुटती भीड़ ये साबित करती है कि उनकी पॉपुलेरिटी अच्छी खासी बढ़ चुकी है।
पर क्या वो वोट्स में तब्दील हुई होगी। इसका खुलासा भी चुनावी नतीजों में हुआ ही होगा। पर ये तय है कि यादव कुछ हजार वोट भी खींच ले जाते हैं तो कांग्रेस या बीजेपी किसी एक पर या दोनों पर ही उसका असर जरूर पड़ेगा।
3 अगस्त को खुलेगा दतिया का राज
तो हम कुछ फैक्टर्स पर मोटे तौर पर बात कर चुके हैं। एक महिलाओं का मतदान कम। सबोटाज का डर और कार्यकर्ताओं की निरसता और इनके सबके बीच युवाओं का वो प्रदर्शन जिसका असर पूरे देश पर हुआ।
जंतर मंतर पर हुए आंदोलन को भी हम यहां भुला नहीं सकते। उस प्रोटेस्ट ने क्या असर डाला है और कम मतदान किसके लिए फायदेमंद किसके लिए नुकसानदायी।
ये दोनों ही तस्वीरें अभी साफ नहीं है। तीन अगस्त को इस चुनाव के नतीजे आएंगे। तब ये खुलासा होगा कि कांग्रेस अपनी सीट बचाने में कामयाब होती है या बीजेपी अपनी साख बचाने में।
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