NEWS STRIKE अमित शाह के नाम से उठी हलचल, पटेल के पास से पशुपालन गया... रह गया आनंद, दिल्ली पर नजरें !
लखन पटेल से पशुपालन विभाग छिन गया, लेकिन क्यों छिना... क्यों उन्हें मंत्री बनाए रखना बीजेपी सरकार की मजबूरी बना? लखन पटेल पर रातों रात हुई इस कार्रवाई का अमित शाह से सीधा कनेक्शन क्या है? लखन पटेल का कोई पुराना कारनामा या कोई डील है, जो उन्हें ऐसा विभाग टिका दिया गया है, जिसे लूप लाइन की पोस्टिंग कहा जा सकता है। लखन पटेल को लेकर दिनभर सियासी पारा और सोशल मीडिया का पारा हाई रहा, लेकिन मैं आपको इसकी पूरी इनसाइड स्टोरी बताने जा रहा हूं। चंद सेकंड का एक फोन, रातभर हंगामे से बचने के लिए माथापच्ची और पटेल का विभाग छिन जाना। क्या है ये पूरी कहानी चलिए मैं बताता हूं। साथ ही ये भी समझाउंगा कि अब टिकेगा वही जो जीत के लिए बीजेपी की मजबूरी होगा।
नमस्कार...
मंत्री हैं तो घर या दफ्तर के फोन की घंटी घनघनाते रहना आम बात है, लेकिन मंगलवार 14 जुलाई की रात आया फोन, बाकी कॉल्स से अलग था। इस कॉल की वजह से लखन पटेल से पशुपालन विभाग छिना। बीजेपी कैबिनेट में भूचाल आया और कई घंटों तक ये माथापच्ची हुई कि कैसे लखन पटेल के मामले पर कोई बखेड़ा न हो। उनका विभाग भी छिन जाए और विपक्ष को हल्ला मचाने का कोई मौका भी न मिले।
सीएम ने खुद निकाला रास्ता ताकि किरकिरी ना हो
सियासी गलियारों में अटकलें हैं कि इसका हल निकाला खुद सीएम मोहन यादव ने। दिल्ली से ये फरमान तो आ गया कि लखन पटेल को पशुपालन विभाग से हटा दिया जाना चाहिए, लेकिन कैसे, इस सवाल पर पेंच फंस गया। अगर किसी मंत्री को कैबिनेट से हटाना है तो उससे इस्तीफा लेना पड़ता है या फिर उसे बर्खास्त करना पड़ता है। दोनों ही मामलों में सरकार की किरकिरी होना तय थी। अचानक क्यों एक मंत्री से इस्तीफा लिया गया। इस सवाल पर विपक्ष हल्ला मचा सकता था। अचानक क्यों किसी मंत्री को बर्खास्त किया गया। इस सवाल पर भी वही हाल होता। यानी कि विपक्ष हल्ला मचाता कि मंत्री को क्यों बर्खास्त किया गया। इसका रास्ता ये निकला कि मंत्री से एक विभाग ले लिया जाए और ऐसा विभाग दे दिया जाए जो किस पनिशमेंट पोस्टिंग या लूप लाइन की तरह हो, इसलिए लखन पटेल से पशुपालन विभाग ले लिया गया और आनंद विभाग सौंप दिया गया। ज्यादा शोरशराबा न हो इसलिए पशुपालन विभाग भी सीएम ने अपने ही पास रख लिया। हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। इसका इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है।
सीधा अमित शाह से जुड़ा मामले का कनेक्शन
खैर ये तो आप समझ ही गए होंगे कि क्यों लखन पटेल का विभाग बदला गया। अब इस फैसले के पीछे की मजबूरी जान लाजिए और ये भी समझ लीजिए कि इस मामले का सीधे अमित शाह से क्या कनेक्शन है। लखन पटेल बतौर पशुपालन मंत्री शायद ये भूल गए कि भले ही वो उस विभाग के मुखिया हों, लेकिन लगाम उन पर भी कसी हुई है। आपको बता दूं कि मध्यप्रदेश दुग्ध संघ पर इन दिनों नेशनल डेयरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का सीधा कंट्रोल है। यानी कि अमित शाह का सीधा कंट्रोल या दखल भी माना जा सकता है क्योंकि वो केंद्र में सहकारिता मंत्री की भी भूमिका में हैं।
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भारी पड़ा बड़ी कंपनियों के काम दखल देना
ऐसे हालात में लखन पटेल पर कुछ संगीन इल्जाम लगे। जिसमें से एक अमूल जैसी बड़ी कंपनी के साथ भी जुड़ा होने की अटकलें हैं। इसके अलावा ये भी सामने आया कि वो गुजरात से जुड़ी कंपनियों के काम में भी दखल दे रहे थे। इस मामले पर नेशनल डेयरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के अफसरों ने केंद्र सरकार के सामने कुछ फेक्ट्स रखे। अंदर की खबर ये है कि असल सीन सुनकर खुद अमित शाह भी चौंक गए थे। इसके अलावा भी लखन पटेल पर कुछ ऐसे गंभीर इल्जाम हैं। जिनके चलते सरकार की किरकिरी होने की आशंका थी। सारे हालात समझने के बाद दिल्ली से रात में ही वो फोन आया, जिसके बाद लखन पटेल से पशुपालन विभाग छीन लिया गया।
विवादों में कई नेता, लेकिन लखन की ही कुर्सी क्यों गई
लखन पटेल पथरिया से मौजूदा विधायक हैं। पथरिया का सियासी मिजाज समझें तो यहां लोधी, राजपूत, ब्रहाम्ण जैसी जातियां हार-जीत का फैसला करती हैं, लेकिन चुनावी इक्का कुर्मी और अनुसूचित जाति के मतदाताओं के पास है। पथरिया की तासीर भी ऐसी है, जिसे हार्डकोर बीजेपी वोट बैंक या फिर लखन पटेल का मजबूत जनाधार नहीं कहा जा सकता। शायद इसलिए लखन पटेल पर केंद्र ने नाराजगी जाहिर करने से पहले दो बार सोचा भी नहीं। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि मप्र में ऐसे और भी कुछ नेता हैं, जिनसे विवाद जुड़े हैं। जैसे कुंवर विजय शाह को ही ले लीजिए। कुंवर विजय शाह के ऑपरेशन सिंदूर पर दिए बयान के बाद नेशनल लेवल तक जमकर विरोध हुआ। कुंवर विजय शाह के इस्तीफे की मांग भी उठी। लेकिन पार्टी ने शाह के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। इसकी क्या वजह हो सकती है। असल में विजय शाह आदिवासी वोट बैंक वाले नेता हैं। वो खुद आदिवासी रॉयल फैमिली से आते हैं। ये वर्ग अक्सर ही बीजेपी से नाराज या रूठा रहता है, इसलिए बीजेपी ने शाह पर सख्त कार्रवाई करने का रिस्क नहीं लिया। लेकिन लखन पटेल के मामले में एक्शन लेने में न दिन देखा न रात देखी। इसके क्या मायने हैं, क्या ये साफ नहीं करता कि अब टिकेगा वही औऱ रहेगा वह जिसके साथ केंद्र की मर्जी जुड़ी होगी। यानी हर कंट्रोल आलाकमान के हाथ में है।
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जो चेहरा जीत दिलाए, उसी की पूछपरख
नरोत्तम मिश्रा भी तो इसका ताजा उदाहरण है, जिनके एक इशारे पर बीजेपी दतिया के हर पदाधिकारी ने इस्तीफा दे दिया था। सड़क तक बवाल फैला था, लेकिन केंद्र के एक इशारे पर नरोत्तम मिश्रा जैसे कद्दावर नेता को बैकफुट पर आना पड़ा। आंखों से आंसु छलके, लेकिन असल दर्द न बयां कर सके। ये भी इस बात का इशारा है कि अपने क्षेत्र में कोई भी नेता कितना भी बड़ा दादा यानी कि प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन आलाकमान या केंद्रीय नेतृत्व के आगे कोई नहीं टिक सकता। बीजेपी अब सिर्फ उसी नेता की कद्र कर रही है, जिसके चेहरे पर जीत मिलना तय है या फिर जो जीत के लिए बेहद जरूरी है। बाकी नेताओं को केंद्र के इशारे पर ही काम करना होगा।