News Strike: दिग्विजय सिंह की धार्मिक यात्रा: बीजेपी क्यों हुई सतर्क? धर्म या सियासत का नया दांव?

Harish Divekar | Jul 09, 2026, 07:00 IST
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कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की धार्मिक यात्रा से बीजेपी सतर्क है और इसके राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। क्या वे सचमुच संन्यास लेंगे या यह कांग्रेस का नया सियासी दांव है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस यात्रा का पार्टी और विपक्ष पर गहरा असर पड़ेगा।

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अल्पसंख्यकों की राजनीति करने के लिए बदनाम दिग्विजय सिंह की धार्मिक यात्रा से क्या बीजेपी डर रही है। क्या दिग्गी वाकई राजनीति छोड़ेंगे और धर्म के लिए काम करेंगे। ये फैसला कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद कितना नुकसानदायी। क्या दिग्गी की यात्रा से बीजेपी पर असर पड़ेगा, ऐलान तो एक ही हुआ है और सवाल अनेक हो चुके हैं।नेताओं का राजनीति से संन्यास लेना आम प्रक्रिया है। कुछ नेता राजनीति में रहते हुए या राजनीति छोड़ने के बाद यात्रा पर भी निकलते हैं, पर जब दिग्विजय सिंह जैसा नेता यात्रा निकालने का फैसला करता है तो बात भले ही धर्म की हो पर उसके भीतर राजनीति भी जरूर छुपी हुई होती है। क्या राजनीति है, यात्रा का क्या असर होगा, यही मैं आज आपको समझाने वाला हूं।

नमस्कार,

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ। बहुत जोर शोर से गाना भी पूरे देश में गूंजा, जो राम को लाए हैं हम उनको लाएंगे। राम मंदिर न सिर्फ इस देश की आस्था का विषय है बल्कि एक भरोसे का नाम भी है जो धर्म में विश्वास को और गहरा करता है। इसी विश्वास ने बीजेपी सरकार को भी मजबूती दी। बरसों की लड़ाई के बाद राम मंदिर बना तो राम राज्य की बातें भी होने लगी।

हालांकि प्रेक्टिकली राम राज्य संभव नहीं लेकिन राम भक्तों ने आस की जोत तो जला ही ली थी। जब राम मंदिर में चंदा चोरी का खुलासा हुआ तो आस की जोत भी मद्धिम सी पड़ गई। राम मंदिर चंदा चोरी मामले में ज्यादा लंबी बात नहीं करेंगे। क्योंकि बात दिग्विजय सिंह की यात्रा की करनी है। वैसे भी चंदा चोरी के बारे में हर रोज कुछ न कुछ अपडेट आ ही रहा है।

🔴News Strike | दिग्विजय सिंह की धार्मिक यात्रा: बीजेपी क्यों हुई सतर्क? धर्म या सियासत का नया दांव?

चंदा चोरी और चोरी दोनों से प्रदेश के मंदिर अछूते नहीं

पर हां राम मंदिर चढ़ावा चोरी के बहाने कुछ और मंदिरों की बात करना जरूरी है। खासतौर से मप्र के मंदिरों की, जहां चढ़ावे में चोरी के मामले सामने आए हैं। ताजा मामला आगर मालवा के मां बगलामुखी मंदिर का है। इस मंदिर में वित्तीय गड़बड़ी और निजी खातों में दान लेने के मामले सामने आए हैं। जिसके बाद कलेक्टर प्रीति यादव ने सख्त रुख अपनाया और तीन सदस्यीय जांच दल गठित कर दिया है। जो सात दिनों में पूरे मामले पर रिपोर्ट सौंपेगा।

चंदा चोरी और चोरी दोनों से प्रदेश के मंदिर अछूते नहीं हैं। दतिया के राम जानकी मंदिर में चोरी का मामला सुर्खियों में हैं। मंदिर के पुजारी पर भगवान के सोने के आभूषण और 2 सौ ग्राम वजनी चांदी का ग्लास चुराने का आरोप है। इस चोरी को अंजाम देने के बाद पुजारी फरार हुआ। उस पर पुलिस ने दस हजार का इनाम भी रखा। अपडेट ये है कि पुजारी राजस्थान से गिरफ्तार हो गया है। बद्रीनाथ की भी बात कर ही लेते हैं। बद्रीनाथ चार धाम में से एक धाम है, यहां भी दान की चोरी में हेराफेरी का मामला सामने आया है। ये सब तब हो रहा है जब अधिकांश राज्यों में धर्म की रक्षा करने के नाम पर सरकारें चुनी गई हैं।

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दिग्विजय सिंह अब धर्म की रक्षा करेंगे!

और, आयरनी यानी कि विडंबना देखिए इन सब मामलों के खिलाफ वो राजनेता धार्मिक यात्रा पर निकल रहा है, जो खुद सनातनियों के निशाने पर रहा और हिंदू विरोधी कहा गया। वो नेता हैं दिग्विजय सिंह। फेसबुक पर खुद कांग्रेस के हैंडल से ये पोस्ट है कि दिग्विजय सिंह अब धर्म की रक्षा करेंगे। उन्होंने कहा है कि वो पांच बार के विधायक, दो बार के लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं।

वो मानते हैं कि वो राजनीति में अपनी पूरी पारी खेल चुके हैं। संन्यास या राजनीति का एक अलग अध्याय शुरू करने वाले दिग्विजय सिंह ने भी ये कहा कि वो सनातन धर्म को भी खूब समझते हैं। इसके साथ बीजेपी, वीएचपी औऱ आरएसएस को भी खूब समझते हैं। इसलिए अब धर्म की रक्षा करने निकलने वाले हैं। दिग्विजय सिंह की महाकाल मंदिर परिसर से शुरू होगी और राम मंदिर पर पहुंच कर खत्म होगी। इस बीच दिग्गी करीब एक हजार किमी का सफर तय करेंगे। दो अक्टूबर को शुरू होने वाली यात्रा में महाकाल मंदिर भूमि ट्रस्ट और राम जन्म भूमि ट्रस्ट की गड़बड़ियों को उजागर किया जाएगा।

इस ऐलान के बाद से ही एक नई सियासी बहस छिड़ी हुई है। सवाल ये है कि दिग्गी अगर धर्म विरोधी हैं तो उनकी यात्रा पर चिंता करने की क्या बात है। खबर है कि करणी सेना ने भी कुछ शर्तों के साथ दिग्विजय सिंह की यात्रा को समर्थन दने का ऐलान कर दिया है।

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यात्रा में न भाषण न बयानबाजी

खुद दिग्विजय सिंह ने ये साफ कर दिया है कि वो यात्रा के दौरान भाषण नहीं देंगे, न कोई बयानबाजी करेंगे। न कोई ट्वीट करेंगे। लेकिन उनका मास्टर स्ट्रोक हैं संतोष दुबे, जो यात्रा के मुख्य अतिथि होंगे। संतोष दुबे एक कारसेवक हैं जिन्होंने धर्म की खातिर चार गोलियां भी खाई थीं। दिग्गी का वादा तो है कि उनकी यात्रा धर्म से जुड़ी रहेगी, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसका सियासी फायदा कांग्रेस को या किसी अन्य दल को मिल सकता है और बीजेपी को नुकसान होगा।

दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा ने बदलें थे समीकरण

दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा की ही बात करें तो उससे कांग्रेस को काफी फायदा मिला था। साल 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा शुरू हुई थी। इस यात्रा में वो करीब 110 विधानसभा सीटों से गुजरे थे। तीन हजार किमी से लंबी इस नर्मदा यात्रा के दौरान दिग्विजय सिंह कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करते थे। ग्रामीणों से मुलाकात करते थे और अवैध खनन और घोटालों पर चर्चा करते थे। इसका असर ये हुआ कि कांग्रेस की सीटें तेजी से बढ़ी और साल 2018 में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब रही।

मजबूत नेटवर्क तैयार करने में माहिर है दिग्विजय

दिग्विजय सिंह के आलोचक बहुत से हो सकते हैं। राजनीतिक फैन्स की भी कोई कमी नहीं है। इसमें भी कोई शक नहीं कि आज भी वो अपने बंगले पर होते हैं तो वहां कार्यकर्ताओं का हुजूम जुटता है। मैं दिग्विजय सिंह का राजनीतिक फैन नहीं हूं न ही आलोचक हूं, लेकिन एक विश्लेषक जरूर हूं, और दिग्विजय सिंह की राजनीति करने के तरीके को बेहतर समझता हूं। इसलिए मैं कह सकता हूं कि दिग्विजय़ सिंह किसी प्रदेश के दायरे में नहीं बंधे हैं।

कार्यकर्ताओं को जोड़ना, आम लोगों तक अपनी बात को सही औऱ आसान भाषा में पहुंचाना औऱ एक मजबूत नेटवर्क तैयार करने में वो भी धुरंधर हैं। सिंहस्थ का साल सिर पर है औऱ उधर यूपी में विधानसभा चुनाव सिर पर है। इस दौर में अगर दिग्विजय सिंह जैसा नेता राजनीति छोड़ कर संन्यास लेता है, तो इसमें भी एक गुण कूटनीति छिपी है इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

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दिग्विजय सिंह की राजनीति खत्म हो गई है ये कहना गलत

कई राजनीतिक विशेषज्ञ ये कहते सुने जा सकते हैं कि वो कांग्रेस की राजनीति में बेटे की नींव मजबूत कर रहे हैं। और, कई इस मत के साथ सामने हैं कि उनकी राजनीति अब वाकई खत्म हो चुकी है। कांग्रेस के लिए दिग्विजय सिंह बेमानी हो चुके हैं, और मिस्टर बंटाधार की छवि बुरी तरह हावी है, तो इसे पूरी तरह सच नहीं माना जा सकता।

दिग्विजय सिंह अगर खत्म हो चुके होते तो उन्हें कांग्रेस लोकसभा का टिकट देकर मैदान में नहीं उतारती। वो हार गए ये और बात है, लेकिन दिग्विजय सिंह की राजनीति खत्म हो गई है ये कहना गलत होगा। राजनीति अगर खत्म हो चुकी होती तो उनकी यात्रा से बीजेपी की पेशानी पर तनाव नहीं झलक रहा होता। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि दिग्गी की राजनीति का एक नया चैप्टर है। अस्सी पार की उम्र में वो हिंदू या सनातन विरोधी छवि के साथ धर्म रक्षा के लिए निकल रहे हैं। ये नया आगाज किसी अंजाम पर पहुंचता है। इसका जवाब सड़क पर निकलने वाली भीड़ नहीं, आने वाले चुनावी नतीजे देंगे।



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