NEWS STRIKE: MP में शिक्षक भर्ती पर सरकार घिरी, खाली स्कूलों का सच कोर्ट पहुंचा

Harish Divekar | Jul 07, 2026, 07:00 IST
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Photograph: (THESOOTR)

मध्यप्रदेश में शिक्षक भर्ती का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। खाली पदों, टीईटी विवाद और ड्रॉपआउट्स ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। क्योंकि, ये मामला अब सिर्फ सड़क के आंदोलन या मांगों तक सीमित नहीं रहा...

न्यूज स्ट्राइक:मध्यप्रदेश में शिक्षकों की भर्ती के मामले में प्रदेश सरकार पर दबाव बढ़ रहा है। जिसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि प्रदेश में खाली पड़े पदों पर अब जल्द ही शिक्षकों की भर्ती शुरू होगी। क्योंकि, ये मामला अब सिर्फ सड़क के आंदोलन या मांगों तक सीमित नहीं है। बल्कि अब अदालत तक पहुंच चुका है।

मप्र हाईकोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख भी अपना लिया है। प्रदेश में टीचर्स के कुल पद और खाली पड़े पदों की संख्या वाकई गंभीर है। जिसकी वजह से स्कूल ड्रॉप आउट की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इस पर राजनीति भी जम कर हो चुकी है।

शिक्षकों का संघर्ष अब भी जारी

शिक्षकों की बात जब भी होती है। तब पढ़ाई के साथ-साथ राजनीतिक मुद्दे और आंदोलनों की बात भी याद आ ही जाती है। खासतौर से मप्र के संदर्भ में।

जहां कभी अतिथि शिक्षक तो कभी संविदा शिक्षक सरकार के सामने गुहार लगाते सुनाई देते हैं तो कभी जिद पर अड़कर आंदोलन भी करते हैं, लेकिन ये सिलसिला बीस सालों से थमा नहीं है। बल्कि लगातार चलता ही जा रहा है।

शिक्षकों से जुड़े ये दो तबके अपनी मांगों को लेकर सड़क पर तकरीबन हर साल नजर आते हैं। इन आंदोलन में अब टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा के अभ्यार्थी भी जुड़ चुके हैं और अब शिक्षकों के खाली पदों का मामला भी तूल पकड़ रहा है।

खाली पदों से स्कूलों की हालत खराब

मप्र में स्कूली शिक्षकों के लिए करीब 2 लाख 89 हजार पद स्वीकृत हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि इनमें से केवल एक लाख 15 हजार 678 पद खाली ही पड़े हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता और वकील वीएल जैन ने इस मामले में इंदौर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। इस याचिका में उन्होंने कुल पद और खाली पदों के ये आंकड़े कोट किए हैं। उनकी याचिका के मुताबिक जितने पद खाली हैं।

उस हिसाब से देखा जाए तो प्रदेश के 1895 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी टीचर है ही नहीं। उनकी याचिका में स्कूलों के हालात पर भी डिटेल दिए गए हैं। जिसके मुताबिक 5 हजार सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग जर्जर है।

3400 स्कूल ऐसे हैं जिनमें टॉयलेट यानी कि शौचालय ही नहीं है। 59 हजार स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध नहीं है। जैन ने ये भी दावा किया है कि पिछले दस सालों में स्टूडेंट की संख्या 22 लाख से ज्यादा घट चुकी है।

हाईकोर्ट ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है और केंद्र और राज्य सरकार दोनों से जवाब भी तलब किया है। मामला जैसे जैसे आगे बढ़ेगा वैसे वैसे तय होगा कि मप्र में स्कूली शिक्षा के हालात सुधरेंगे या नहीं। शिक्षकों के पद खाली होने की दो बड़ी वजह है। एक तो नई भर्ती प्रक्रिया में देरी और शिक्षकों के डिस्ट्रिब्यूशन में बैलेंस न होना।

टीईटी नियमों में उलझे पुराने शिक्षक

शिक्षक भर्ती में टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा का हाल सभी जानते हैं। इस परीक्षा की खातिर उम्मीदवारों के आंदोलन की खबरें आती रहती हैं। पुराने शिक्षकों के लिए भी टीईटी देना अनिवार्य करने के बाद हालात थोड़े ज्यादा जटिल हो गए हैं।

असल में 1998 से 2009 के बीच नियुक्त हुए टीचर्स को भी सुप्रीम कोर्ट ने इस परीक्षा को देने के निर्देश दिए हैं। ऐसे टीचर्स की संख्या करीब 70 हजार से डेढ़ लाख के बीच में है। तब से शिक्षक और सरकार एक नई कानूनी प्रक्रिया में उलझी हुई है।

इस मामले में शिक्षकों का तर्क है कि 2010 से पहले की सारी भर्ती उस समय के नियमों के अनुसार ही हुई थी। इसलिए उनकी नौकरी पर सवाल नहीं उठने चाहिए। फिलहाल अपडेट ये है कि जुलाई या अगस्त के महीने में टीईटी हो सकती है।

शिक्षकों की तैनाती में बड़ा असंतुलन

अब बात करते हैं दूसरी समस्या की। यानी कि शिक्षकों की पदस्थापना पर। प्रदेश के शहरों के स्कूल और ऐसे इलाके जहां आना जाना आसान है, उन जगहों पर शिक्षकों की संख्या पर्याप्त है।

जो स्कूल गांवों में हैं या ऐसे इलाकों में हैं जहां आना जाना आसान नहीं है, वहां टीचर्स जरूर से बेहद कम हैं या फिर हैं ही नहीं। इसे अक्सर स्कूल शिक्षा विभाग के मिसमैनेजमेंट के तौर पर भी देखा जाता है, लेकिन इस असंतुलित ड्रिस्ट्रिब्यूशन की वजह से भी कई स्कूल टीचर्स की कमी झेल रहे हैं।

शिक्षक कमी पर विपक्ष के तीखे सवाल

शिक्षकों की कमी पर कांग्रेस भी कई बार सवाल उठा चुकी है। शिक्षकों के खाली पद, युवा शिक्षक पात्रता परीक्षा में पास किए उम्मीदवारों को भी नियुक्ति न मिलना। शिक्षकों की जगह अतिथि शिक्षकों के सहारे स्कूलों का काम चलना ऐसे मुद्दे हैं जो विपक्ष की लिस्ट में टॉप पर हैं।

हालांकि, इनसे हालात कितने सुधरे ये नहीं कहा जा सकता। जो बच्चे पूरी पढ़ाई करने से पहले स्कूल छोड़ देते हैं। ऐसे ड्रॉपआउट्स की एक बड़ी वजह टीचर्स की कमी ही है, लेकिन इस मामले में सरकार के अपने तर्क हैं।

ड्रॉपआउट रोकना सरकार की बड़ी चुनौती

पिछले साल दिसंबर माह में स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने स्कूल ड्रॉप आउट्स के कारणों पर बात की थी। विधानसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि आठ साल में 56 लाख बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया। जबकि स्कूल शिक्षा का बजट 4 गुना तक बढ़ चुका है।

इस मामले पर राव उदय प्रताप सिंह ने भी माना कि ड्रॉपआउट्स की संख्या कम करना बड़ी चुनौती बन चुका है। सिंह ने जो बताया उसके मुताबिक सरकारी स्कूलों में फर्स्ट क्लास में जितने स्टूडेंट एडमिशन लेते हैं। उनमें से सिर्फ 32 फीसदी ही 12वीं तक पहुंचते हैं।

सिंह ने डिटेल में ये भी बताया कि 86 फीसदी बच्चे आठवीं तक पहुंचते हैं। 54 फीसदी दसवीं तक पहुंचते हैं और 12वीं आते-आते हालात और चिंताजनक हो जाते हैं। स्कूल ड्रॉप आउट की एक बड़ी वजह उन्होंने बच्चों के गरीब हालात बताए। जिसकी वजह से उन पर कमाई का दबाव ज्यादा होता है।

बजट बढ़ा, फिर भी स्कूल खाली क्यों

राव उदय प्रताप के बयान पर भी कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने सवाल उठाया था कि जब बच्चे घट रहे हैं तो बजट क्यों बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि स्कूल शिक्षा बजट 9 हजार करोड़ से बढ़कर 37 हजार करोड़ हो चुका है। उसके बाद भी ड्रॉपआउट्स की संख्या कम न होना चिंता का विषय है। और इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता।

बेशक गांव और गरीब घरों के बच्चों पर कमाई का प्रेशर ज्यादा होता है ताकि वो या तो अपनी खेती बाड़ी संभाल सकें या घर के दो वक्त की रोटी की जरूरत पूरी कर सकें। पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जब टीचर ही नहीं होंगे तो बच्चे स्कूल में पढ़ने क्यों आएंगे। इसलिए भी बच्चे स्कूल छोड़ने में गुरेज नहीं करते।

खाली पद भरना ही असली समाधान

हमारा सोचना ये है कि राज्य सरकार को सिर्फ हाईकोर्ट के सवाल का ही जवाब नहीं देना चाहिए। बल्कि ये भी गौर करना चाहिए कि स्कूल टीचर्स के खाली पड़े पद जल्दी से जल्दी कैसे भरे जाएं।

ये तो सरकार का ही नारा है कि पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया। देश हो या प्रदेश दोनों को ही आगे बढ़ने के लिए पढ़े लिखे युवाओं की जरूरत है। जिसकी शुरुआत ही टीचर्स और स्कूलों से होगी। इस पर गंभीर न हुए तो इस नारे के क्या मायने बचेंगे। इस पर भी मंथन... गहरा मंथन जरूरी है।

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