NEWS STRIKE : BJP नेताओं के बयान पर बड़ा सवाल। सखलेचा, विजय शाह, देवड़ा के बयान क्या बताते हैं ?
Harish Divekar | Jun 25, 2026, 07:00 IST
NEWS STRIKE24-06-2026
भाजपा के नेता लगातार अपनी बयानबाजी को लेकर चर्चाओं में है। ताजा मामला ओमप्रकाश सखलेचा है। जो अपने ही वोटरों पर भड़क गए। इधर कई अन्य नेताओं के बयानों को लेकर भी सवाल उठें है। भाजपा के लिए यह बयान चुनाव में खतरे की घंटी न बन जाएं।
NEWS STRIKE
बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है..
बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है।
बीजेपी के दिग्गज नेता जो विधायक भी हैं, पूर्व मंत्री भी हैं और एक पूर्व सीएम के बेटे भी हैं। उनके बड़बोलेपन को देखकर आज मुझे बहुत सारे शेर याद आ रहे हैं। शेर इसलिए भी याद आ रहे हैं कि क्योंकि अब लगता है सत्ता का नशा बीजेपी नेताओं के सिर से भी पार निकल गया है और जुबां से टपकने लगा है। सकलेचा का ताजा बयान इसी बात का उदाहरण है। जिसे देखकर पुराने एग्रेसिव कवियों के शायरों के शेर याद आ रहे हैं। सत्ताधारियों के कारनामों से उन शेरों को जोडूंगा। और, अगर आपको कोई शेर याद आ जाए तो आप भी शेयर करना, और हां शेर किसका है ये भी बताते चलाना
नमस्कार
सत्ता में बैठे लोगों की बदजुबानी या बिगड़े बोल बताते बताते नपे तुले संयत लेकिन तीखे शब्द गुस्सा जाहिर करने का सबसे अच्छा तरीका है शेर और शायरियां। इसलिए ओमप्रकाश सखलेचा जैसे नेताओं पर नाराजगी निकालने का मैंने आज ये तरीका चुना है। सखलेचा ने ऐसा क्या बोल दिया जो किसी राजनेता को नहीं बोलना चाहिए था। कम से कम ऐसे राजनेता को जो राजनीति की दुनिया में पला बढ़ा और रचा बसा है। सखलेचा कोई नए-नए नेता नहीं है। सियासत की राजनीति में इतना पके हैं कि अब उनके बाल भी सफेद हो चुके हैं। राजनीतिक तजुर्बा इन बालों की तरह की चमकीला होना चाहिए था, लेकिन वो गुमान और सत्ता के नशे से लबरेज नजर आता है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। ये समझना है तो सखलेचा का ये वायरल वीडियो देख लीजिए।
एक आंसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुमने देखा नहीं आंखों का समुंदर होना
सखलेचा जी शायद ये बात भूल चुके हैं। ये वीडियो नीमच के बांगरेड गांव का है। जहां स्वास्थ्य केंद्र बनने का भूमिपूजन तो हो गया लेकिन वहां तक जाने का रास्ता ही नहीं बना। करीब चार साल से सड़क बनने का काम लंबित है। इस बात से गुस्साए गांव वालों ने सखलेचा को घेर लिया और कई सवाल पूछे। गांव वालों का गुस्सा कितना है ये तो आप वीडियो देखककर समझ ही गए होंगे। आमतौर पर जनता का गुस्सा सत्ताधारियों के लिए एक अलार्म होता है कि अब भी सुधर जाओ वर्ना वोट नहीं देंगे। लेकिन सत्ता पर दो दशक से काबिज बीजेपी के नेताओं को शायद अब इस धमकी से डर लगना बंद हो गया है। इसलिए सखलेचा ने वो धमकी दे डाली जो आमतौर पर कभी कोई नेता खुल कर नहीं देता।
सखलेचा ने गांव वालों को साफ कहा कि वोट देना हो तो देना नहीं तो मत देना। ये बात सखलेचा ने तब कही है जब पंचायत चुनाव बहुत नजदीक आ चुके हैं। तकरीबन एक साल के भीतर गांव और नगर सरकार का भविष्य तय करने यही लोग वोट देने निकलेंगे। तब क्या सखलेचा की ये धमकी उनके कानों में नहीं गूंजेगी। टूटी हुई सी कच्ची सड़क, आधे अधूरे विकास कार्य, पानी बिजली की किल्लत. क्या जनता के दीमाग में नहीं होगी। या सखलेचा और उनके जैसे तमाम बीजेपी नेताओं को ये गुमान है कि माइक्रो लेवल नेटवर्किंग से वो चुनाव जीत ही जाएंगे।
सखलेचा का ये रवैया देखकर एक ही शेर याद आ रहा है..
उधर जम्हूरियत ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर पर्दे के पीछे बर्बरीयत है नवाबी है
🔴News Strike | सत्ता का घमंड या जुबान की फिसलन ? नेताओं के बयान पर बड़ा सवाल | ओमप्रकाश सखलेचा विवाद
बीजेपी के आला नेता बार बार यही कहते हैं कि जनता ही चुनाव जिताएगी। विधायक से लेकर मंत्रियों की परफॉर्मेंस रिपोर्ट उनके काम के आधार पर तय होती है। दूसरी तरफ जनता का गुस्सा देखकर नेता को गुस्सा आने में एक सेकंड नहीं लगता। सखलेचा के इस रवैये पर ये सवाल तो होना ही चाहिए कि क्या उन्हें एक एक वोट की कीमत का अहसास नहीं है। इसे ही सत्ता का अहंकार कहते हैं। एक और शेर मुलायजा फरमाइए..
देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गए
जो बार बार सत्ता में लौट कर आ रहे हैं। सत्ता के उन बंदरों को ये नहीं भूल जाना चाहिए कि यही वोटर्स उन्हें वोट देकर अपना नेता चुनते हैं। इसलिए जब वो काम का हिसाब मांगते हैं तब वो कोई अहसान नहीं मांगते। बल्कि अपने वोट की कीमत का अहसास करवाते हैं।
मप्र में बीजेपी 2003 से सत्ता में है। यानी दो दशक से ज्यादा का समय हो चुका है, तो क्या बीजेपी के चंद नेताओं को ये लगने लगा है कि उन्हें सत्ता से बाहर करना अब मुश्किल है। ऐसे नेताओं को 2018 के नतीजे याद रखना चाहिए। याद रखिए..
जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत।
ये बात कह रहा हूं मैं होश-ओ-हवास में॥
News Strike: गांव में चोरी हुए विकास के राज; सरपंच का करप्शन कैसे रोकें? पंचायत चुनाव 2027 गाइड
होशो-ओ-हवास की बहुत ज्यादा जरूरत सिर्फ सखलेचा को ही नहीं, बीजेपी के और भी कई नेताओं को है। मैं चंद उदाहरण भी पेश करूंगा, जिसके बाद आप भी ये सवाल करेंगे कि लगातार सत्ता में बने रहने के कारण क्या बीजेपी नेताओं की जुबान बेलगाम हो रही है। पिछले दिनों बीजेपी नेताओं की जुबान इस कदर फिसली की उसकी चर्चा सिर्फ एमपी नहीं पूरे देश में हुई। ऐसा लगा जैसे बेलगाम बयानबाजी की होड़ सी लगी हुई है।
शुरुआत मंत्री विजय शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिए बयान को याद करके करते हैं। उनका बयान बेहद आपत्तिजनक था। जिसके बाद उनके इस्तीफे तक की बात उठी। हालांकि अब मामला अदालत में भी है। इस मामले में डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा ने भी कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना भी पीएम मोदी के चरणों में नतमस्तक है।
देवरी विधानसभा से बीजेपी विधायक बृज बिहारी पटेरिया ने मंच से कहा था वो अपनी पर आ जाए तो पैजामे ढीले हो जाएंगे। क्या ये बीजेपी नेताओं का स्तर रह गया है।
मंत्री और विधायकों की बात छोड़ दीजिए. निचले स्तर के नेताओं का हाल भी कुछ ऐसा है। मुरैना के अंबाह में हुए कार्यक्रम में दिनेश जैन ने ऐसा ही एक भद्दा बयान दिया। दिनेश जैन नगर पालिका अध्यक्ष के पति हैं और बीजेपी नेता हैं। जिन्होंने नाभी से नीचे कपड़े पहनने पर एक घटिया बयान दिया।
प्रीतम लोधी के किस्से तो अब तक भुलाए नहीं जा सकते। जो एक अफसर से सीना तान कर पूछते हैं कि करैरा क्या तुम्हारे डैडी की है। और उसके बाद सिर्फ माफी मांग कर काम चल जाता है।
अब तो बस यही कहना चाहता हूं कि..
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों
रहनुमाओं को भी ये समझना जरूरी है कि जनता हमेशा उन पर फिदा रहे ये जरूरी नहीं है। नेपाल का जैन जी आंदोलन इसकी मिसाल है। नई जनरेशन का वोटर सिर्फ सोशल मीडिया से प्रभावित होकर अपना मन बनाएगा ऐसा जरूरी नहीं है। नेपाल के आंदोलन ने ये जाहिर कर दिया था कि जैन जी अगर सड़क पर उतर आए तो सरकार का बचना मुश्किल होता है।
कॉकरोच जनता पार्टी का आगाज भी इसी जैन-जी के गुस्से से हुआ है, जिन्होंने ये साबित कर दिया कि वो सोशल मीडिया पर एकजुट भी हो सकते हैं। तो राजनेता जिस प्लेटफॉर्म का उपयोग विचारधार बनाने में कर रहे हैं, वही प्लेटफॉर्म बूमरैंग बन सकता है। और जैन-जी के गुस्से को नई हवा दे सकता है। कॉकरोच जनता पार्टी इसी बात की मिसला भी है। अब क्या कहूं.. बस यही बात याद आती है कि...
गूंगे निकल पड़े हैं ज़बां की तलाश में
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए
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वैसे मैं बता दूं बीजेपी अनुशासन बेस्ड पार्टी है। कोई नेता पार्टी लाइन से बाहर जाकर बयानबाजी नहीं कर सकता। लेकिन तैश में आकर नेता जब इस तरह जनता को खारिज करते हैं तो खामियाजा पार्टी को ही भुगतना पड़ता है। क्या बीजेपी को भी ऐसे नेताओं को लाइन पर लाने के लिए सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है। क्योंकि ये तो साफ हो चुका है कि सिर्फ माफी मंगवाने से काम नहीं चलने वाला है। नेता अपनी बातों से और अपना रुआब जताने से बाज नहीं आ रहे हैं। हाल यही रहा तो पंचायत चुनाव में ही जनता शायद एक एक बदजुबानी का जवाब देगी।
ये भी सही है कि बीजपी डैमेज कंट्रोल में भी माहिर है। पर जनता की नाराजगी के डैमेज को कैसे काबू में किया जाएगा, ये मुश्किल सवाल होगा। एंटी इंकंबेंसी से इंकार नहीं किया जा सकता। ये फेक्टर बूथ तक नजर आया तो बीजेपी के सारे गुणा भाग फेल हो सकते हैं। इसलिए सख्त एक्शन लाजमी है, ताकि सत्ता का गुमान नेताओं के सिर से उतर सके। आज का आखिरी शेर, जो बीजेपी के लिए भी है और एक आम मतदाता के लिए भी.
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं
और हां, कोई शेर आपको याद आए या आपने लिखा हो तो कमेंट सेक्शन में जरूर शेयर कीजिए.
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बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है।
बीजेपी के दिग्गज नेता जो विधायक भी हैं, पूर्व मंत्री भी हैं और एक पूर्व सीएम के बेटे भी हैं। उनके बड़बोलेपन को देखकर आज मुझे बहुत सारे शेर याद आ रहे हैं। शेर इसलिए भी याद आ रहे हैं कि क्योंकि अब लगता है सत्ता का नशा बीजेपी नेताओं के सिर से भी पार निकल गया है और जुबां से टपकने लगा है। सकलेचा का ताजा बयान इसी बात का उदाहरण है। जिसे देखकर पुराने एग्रेसिव कवियों के शायरों के शेर याद आ रहे हैं। सत्ताधारियों के कारनामों से उन शेरों को जोडूंगा। और, अगर आपको कोई शेर याद आ जाए तो आप भी शेयर करना, और हां शेर किसका है ये भी बताते चलाना
नमस्कार
सत्ता में बैठे लोगों की बदजुबानी या बिगड़े बोल बताते बताते नपे तुले संयत लेकिन तीखे शब्द गुस्सा जाहिर करने का सबसे अच्छा तरीका है शेर और शायरियां। इसलिए ओमप्रकाश सखलेचा जैसे नेताओं पर नाराजगी निकालने का मैंने आज ये तरीका चुना है। सखलेचा ने ऐसा क्या बोल दिया जो किसी राजनेता को नहीं बोलना चाहिए था। कम से कम ऐसे राजनेता को जो राजनीति की दुनिया में पला बढ़ा और रचा बसा है। सखलेचा कोई नए-नए नेता नहीं है। सियासत की राजनीति में इतना पके हैं कि अब उनके बाल भी सफेद हो चुके हैं। राजनीतिक तजुर्बा इन बालों की तरह की चमकीला होना चाहिए था, लेकिन वो गुमान और सत्ता के नशे से लबरेज नजर आता है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। ये समझना है तो सखलेचा का ये वायरल वीडियो देख लीजिए।
लगातार चुनाव जीतने से अहंकार जुबान पर आ जाता है,, गांव वाले केवल सड़क की मांग कर रहे थे। ग्रामीण बोले केवल चुनाव और वोट मांगने के लिए आ जाते हो चुनाव के समय तब पूर्व मंत्री और विधायक ओमप्रकाश सकलेचा बोले वोट देना हो तो दो। pic.twitter.com/t5yDsk7aph
— Brajesh Rajput (@drbrajeshrajput) June 22, 2026
बड़बोले सखलेचा जी ने दे डाली खुली धमकी-
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सखलेचा जी शायद ये बात भूल चुके हैं। ये वीडियो नीमच के बांगरेड गांव का है। जहां स्वास्थ्य केंद्र बनने का भूमिपूजन तो हो गया लेकिन वहां तक जाने का रास्ता ही नहीं बना। करीब चार साल से सड़क बनने का काम लंबित है। इस बात से गुस्साए गांव वालों ने सखलेचा को घेर लिया और कई सवाल पूछे। गांव वालों का गुस्सा कितना है ये तो आप वीडियो देखककर समझ ही गए होंगे। आमतौर पर जनता का गुस्सा सत्ताधारियों के लिए एक अलार्म होता है कि अब भी सुधर जाओ वर्ना वोट नहीं देंगे। लेकिन सत्ता पर दो दशक से काबिज बीजेपी के नेताओं को शायद अब इस धमकी से डर लगना बंद हो गया है। इसलिए सखलेचा ने वो धमकी दे डाली जो आमतौर पर कभी कोई नेता खुल कर नहीं देता।
सखलेचा ने गांव वालों को साफ कहा कि वोट देना हो तो देना नहीं तो मत देना। ये बात सखलेचा ने तब कही है जब पंचायत चुनाव बहुत नजदीक आ चुके हैं। तकरीबन एक साल के भीतर गांव और नगर सरकार का भविष्य तय करने यही लोग वोट देने निकलेंगे। तब क्या सखलेचा की ये धमकी उनके कानों में नहीं गूंजेगी। टूटी हुई सी कच्ची सड़क, आधे अधूरे विकास कार्य, पानी बिजली की किल्लत. क्या जनता के दीमाग में नहीं होगी। या सखलेचा और उनके जैसे तमाम बीजेपी नेताओं को ये गुमान है कि माइक्रो लेवल नेटवर्किंग से वो चुनाव जीत ही जाएंगे।
सखलेचा का ये रवैया देखकर एक ही शेर याद आ रहा है..
उधर जम्हूरियत ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर पर्दे के पीछे बर्बरीयत है नवाबी है
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मप्र में बीजेपी 2003 से सत्ता में है। यानी दो दशक से ज्यादा का समय हो चुका है, तो क्या बीजेपी के चंद नेताओं को ये लगने लगा है कि उन्हें सत्ता से बाहर करना अब मुश्किल है। ऐसे नेताओं को 2018 के नतीजे याद रखना चाहिए। याद रखिए..
जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत।
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शुरुआत मंत्री विजय शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिए बयान को याद करके करते हैं। उनका बयान बेहद आपत्तिजनक था। जिसके बाद उनके इस्तीफे तक की बात उठी। हालांकि अब मामला अदालत में भी है। इस मामले में डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा ने भी कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना भी पीएम मोदी के चरणों में नतमस्तक है।
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मंत्री और विधायकों की बात छोड़ दीजिए. निचले स्तर के नेताओं का हाल भी कुछ ऐसा है। मुरैना के अंबाह में हुए कार्यक्रम में दिनेश जैन ने ऐसा ही एक भद्दा बयान दिया। दिनेश जैन नगर पालिका अध्यक्ष के पति हैं और बीजेपी नेता हैं। जिन्होंने नाभी से नीचे कपड़े पहनने पर एक घटिया बयान दिया।
प्रीतम लोधी के किस्से तो अब तक भुलाए नहीं जा सकते। जो एक अफसर से सीना तान कर पूछते हैं कि करैरा क्या तुम्हारे डैडी की है। और उसके बाद सिर्फ माफी मांग कर काम चल जाता है।
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कॉकरोच जनता पार्टी का आगाज भी इसी जैन-जी के गुस्से से हुआ है, जिन्होंने ये साबित कर दिया कि वो सोशल मीडिया पर एकजुट भी हो सकते हैं। तो राजनेता जिस प्लेटफॉर्म का उपयोग विचारधार बनाने में कर रहे हैं, वही प्लेटफॉर्म बूमरैंग बन सकता है। और जैन-जी के गुस्से को नई हवा दे सकता है। कॉकरोच जनता पार्टी इसी बात की मिसला भी है। अब क्या कहूं.. बस यही बात याद आती है कि...
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सत्ता का गुमान उतारने सख्त एक्शन जरूरी!
ये भी सही है कि बीजपी डैमेज कंट्रोल में भी माहिर है। पर जनता की नाराजगी के डैमेज को कैसे काबू में किया जाएगा, ये मुश्किल सवाल होगा। एंटी इंकंबेंसी से इंकार नहीं किया जा सकता। ये फेक्टर बूथ तक नजर आया तो बीजेपी के सारे गुणा भाग फेल हो सकते हैं। इसलिए सख्त एक्शन लाजमी है, ताकि सत्ता का गुमान नेताओं के सिर से उतर सके। आज का आखिरी शेर, जो बीजेपी के लिए भी है और एक आम मतदाता के लिए भी.
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं
और हां, कोई शेर आपको याद आए या आपने लिखा हो तो कमेंट सेक्शन में जरूर शेयर कीजिए.
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