NEWS STRIKE: सरकारी स्कूलों की पोल खोलेगा नया मिशन, पंचायत चुनाव पर पड़ेगा असर?
मप्र में सरकारी स्कूलों का क्या हाल है। क्या स्कूलों में मिड मील ठीक से मिल रहा है.. बतौर पत्रकार ऐसे कई सवाल हम अक्सर पूछते हैं। पेरेंट्स भी पूछते ही होंगे। पर अब कॉकरोच जनता पार्टी ये सवाल पूछने वाली है। कौन कॉकरोच जनता पार्टी ये तो याद दिलाने की जरूरत नहीं होगी न।
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब पार्टी नए मिशन पर निकल चुकी है। हमारे प्रदेश में उनका ये मिशन पहुंचेगा तब क्या होगा। क्या उसका असर प्रदेश के पंचायत चुनावों पर भी पड़ेगा। अगर उनके मिशन के बारे में गहराई से जान लेंगे तो शायद आपका जवाब होगा कि हां बिलकुल पड़ेगा।
अब सरकारी स्कूलों पर CJP की नजर
जंतर मंतर के जबरदस्त जेन जी प्रोटेस्ट के बाद कॉकरोचों ने अब स्कूलों का रुख कर लिया है। यूं हम तंज कसते हुए कह सकते हैं कि कॉकरोच तो गंध फैलाते हैं। कंगना रनौत समेत कई नेता इस आशय के बयान दे भी चुके हैं।
पर सीजेपी के नए मिशन के बारे में सुनकर लगता है कि ये कॉकरोच गंध फैलाने की जगह सरकारी स्कूलों की गंध साफ करने के मिशन पर निकल चुके हैं। उनका ये मिशन 15 अगस्त से शुरू हो चुका है।
स्कूल सुधार मिशन से पंचायत राजनीति तक
कॉकरोच अपने नए मिशन के तहत सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति देखने, उनकी कमियों को सामने लाने और स्थानीय लोगों को स्कूलों की व्यवस्था सुधारने के लिए जोड़ने के लिए काम करेंगे। अभियान की शुरुआत अभिजीत दीपके अपने गांव के सरकारी स्कूल से कर रहे हैं।
ये अभियान जिस तरह से डिजाइन किया गया है। उसे देखकर आप पहली नजर में कह सके हैं कि इसमें कोई राजनीति नहीं है और शायद है भी नहीं। सीजेपी ने अपने लेवल पर पूरी कोशिश की है कि उनका मिशन सिर्फ और सिर्फ स्कूल शिक्षा को बेहतर बनाने पर फोकस करे।
वैसे भी स्कूल चलें हम से पहले स्कूल ठीक करो मिशन होना भी जरूरी है। जब स्कूल ठीक होंगे तब ही तो बच्चे पढ़ने के लिए स्कूलों तक पहुंचेंगे, लेकिन जैसे जैसे ये मिशन आगे बढ़ेगा
इसका राजनीति से बच पाना मुश्किल होगा। खासतौर से पंचायत चुनावों पर इसका असर न पड़े ये तकरीबन नामुमकिन है। ऐसा क्यों होगा ये समझने के लिए इस वीडियो को गौर से सुनते जाइए।
सरपंच चैलेंज बनेगा मिशन का पॉलिटिकल ट्विस्ट
अभियान का पूरा फोकस सरकारी स्कूलों की उन बुनियादी जरूरतों पर है, जिनका सामना देश के कई हिस्सों में बच्चे करते हैं। स्कूल की इमारत ठीक है या नहीं, बच्चों के बैठने के लिए बेंच हैं या नहीं, पीने का साफ पानी मिल रहा है या नहीं, बिजली-पंखे हैं या नहीं, लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय हैं या नहीं। इन सभी चीजों की निगरानी की बात कही गई है।
इस अभियान में एक खास पहल जिसे नाम दिया गया है ‘सरपंच चैलेंज’। यही चैलेंज पूरे मिशन में बड़ा पॉलिटिकल ट्विस्ट ला सकता है। इस चैलेंज के तहत हर सरपंच को स्कूल की मौजूदा स्थिति की फोटो लेनी है। उसके बाद उन्होंने क्या सुधार किए और फिर स्कूल की तस्वीर कैसे बदली है।
ये फोटो भी लेनी है। इन तस्वीरों को खुद सीजेपी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट करेगी। यानी कि इस मिशन में डिजिटल पावर का भरपूर इस्तेमाल होगा। जिसकी ताकत हम सभी जंतर मंतर प्रोटेस्ट के दौरान भी देख ही चुके हैं।
स्कूल का सोशल ऑडिट, सरपंच से हिसाब
इसी मिशन में सरपंचों के बाद माता पिता भी जुड़ेंगे। जिन्हें निगरानी के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पेरेंट्स स्कूल की सुविधाओं का सोशल ऑडिट करेंगे। कोई कमी सामने आने पर वो स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सवाल करेंगे।
अब आप ही सोचिए जब बात सरपंचों तक जाएगी और माता पिता जनप्रतिनिधि से सवाल करेंगे तो अपने आप कमियों पर भी उनका ध्यान जाएगा और वो सरपंच से कामों का हिसाब भी मांगेंगे। हिसाब सही सही नहीं मिला तो क्या जनता पंचायत चु्नावों में अपने वोट का हिसाब नहीं मांगेगी।
सोशल मीडिया से गांव-गांव में उठेंगे सवाल
अब आप कह सकते हैं कि सीजेपी कोई नीति नियंता तो है नहीं जिसके अभियान में शामिल होना जरूरी हो। जब सरपंच फोटो ही अपलोड नहीं करेंगे तो सीजेपी उस पर आगे बात कैसे करेगी, लेकिन सोशल मीडिया पर कोई भी वीडियो और मिशन आग से भी तेज रफ्तार से फैलता है।
वायरल वीडियो की लत देखकर आप अब तक ये तो समझ ही गए होंगे। हो सकता है कि सारे माता पिता इस अभियान से अवेयर न हों, लेकिन एक गांव के दो जोड़ पेरेंट्स ने भी सवाल पूछ लिए कि हमारा गांव के स्कूल की तस्वीर क्यों नहीं ली जा रही।
ऐसे ही चंद और सवाल दाग दिए तो भी असर उतना ही होगा। यानी जब इस अभियान की आग फैलेगी तो धुआं जगह-जगह से निकलता जरूर दिखाई देगा।
मिड-डे मील की हकीकत भी होगी बेनकाब
अब दूसरी बात। सीजेपी मिड डे मील पर भी बात करेगी और मप्र में मिड मील के क्या हाल चल रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं है। चंद घटनाएं याद दिला भी देते हैं। कुछ महीनों पहले बड़वानी का मामला सामने आया, दाल के नाम पर बच्चों को सिर्फ पीला पानी परसा गया। ढूंढने पर भी एक दाना दाल नहीं मिली।
ग्वालियर के गोकुलपुर के एक स्कूल में मिड डे मील के बर्तन में मरा हुआ मेंढक मिला। जिसके बाद बच्चों ने डर के मारे खाना ही नहीं खाया। मैहर और श्योपुर के कुछ सरकारी स्कूलों में बच्चों को रद्दी कागजों पर खाना परोसा गया। बुरहानपुर के नेपा नगर में तो हद ही हो गई।
यहां निरीक्षण में अधिकारियों ने आटे में कीड़े देखे और दाल की जगह पानी परोसने का खुलासा भी किया। इसके बाद कार्रवाई के नाम पर एनजीओ को नोटिस देने और निलंबन जैसे ढेरों एक्शन की खबर भी आई।
सीजेपी के मिशन में जब ऐसे मामले सामने आएंगे तो क्या वो सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं होंगे और जब पोस्ट होंगे और वायरल होंगे तब उनका इंपेक्ट होना भी लाजमी ही है।
यूनिफॉर्म टेंडर के विवाद में फंसे बच्चे
इसके बाद स्कूलों तक पहुंचने के रास्तों और साधनों पर भी बात होगी। तब क्या होगा। अब एक नजर में मप्र का हाल और जान लीजिए। मध्य प्रदेश में पहली से आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए दो-दो यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने के लिए करीब 350 करोड़ रुपये का फंड निर्धारित किया गया था।
सरकार की ओर से योजना को मंजूरी भी मिली थी, लेकिन जब गणवेश की खरीद के लिए टेंडर सामने आया तो उसकी कुछ शर्तों को लेकर सवाल खड़े हुए। टेंडर में ऐसी शर्त रखी गई थी कि संबंधित कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 700 करोड़ रुपए होना चाहिए।
इसके अलावा कंपनी के पास हर साल कम से कम 50 लाख गणवेश तैयार करने की क्षमता होने की शर्त भी बताई गई। इन शर्तों के बाद बड़ा भारी विरोध भी हुआ।
मामला अदालत तक पहुंचा और हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर ही रोक लगा दी। जिसके बाद बच्चों को लंबे समय तक यूनिफॉर्म नहीं मिल सकी।
रोटी मशीन की कीमत पर मचा बवाल
एक मामला स्कूलों में रोटी बनाने वाली मशीन की खरीद से भी जुड़ा है। प्रदेश के 161 स्कूलों के लिए ऐसी मशीनें खरीदी जानी थीं। जो एक घंटे में करीब 1000 रोटियां बना सके।
इन मशीनों की कीमत करीब 7.74 लाख रुपए प्रति मशीन तय किए जाने की बात सामने आई, लेकिन इन कीमतों पर काफी बवाल हुआ। जिसके बाद ये प्रक्रिया भी रद्द हो गई।
घटते बच्चे, बंद स्कूलों पर उठेंगे सवाल
स्कूल शिक्षा का हाल ये है कि 6 साल में 28 लाख बच्चे कम हो चुके हैं। 10 साल के अंदर 32 हजार सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं। ये आंकड़े हमारे नहीं हैं।
खुद स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने सदन में ये आंकड़े पेश किए हैं। जिनके मुताबिक साल 2020 से 2026-27 तक में सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने वाले बच्चों की संख्या बुरी तरह गिरी है।
6 हजार से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां दस से भी कम बच्चों ने एडमिशन लिया। 13 हजार से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां कुल बच्चे 20 से भी कम है। नियमित शिक्षक भी 3 लाख 45 हजार 43 से घटकर 3 लाख 19 हजार 826 रह गए हैं। ज्यादातर स्कूल अब अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं।
मूलभूत सुविधाओं के नाम पर सरकार का दावा है कि कोई भी स्कूल जर्जर या शौचालय विहीन नहीं है, जबकि विपक्ष का दावा है कि 38 हजार से ज्यादा स्कूलों में बाउंड्रीवॉल नहीं है। और 5 हजार से ज्यादा स्कूलों में प्ले ग्राउंड नहीं है।
क्या स्कूल ठीक करो मिशन के तहत ऐसी बातें छुपी रह जाएंगी। और जब सामने आएगी तब सरकार क्या करेगी। क्या उन हैंडल्स को ब्लॉक करने में समय गंवाएगी। ऐसा किया भी तो कितने हैंडल ब्लॉक करेगी।
स्कूल मिशन का असर राजनीति तक
ये समझने वाली बात है कि सीजेपी किसी इंफ्लूएंजर का हैंडल नहीं है। बल्कि आज की तारीख में कम से कम एक मिशन का हैंडल बन चुका है। एक हैंडल ब्लॉक भी किया तो दूसरा हैंडल चल निकलेगा।
सीजेपी बनने से लेकर जंतर मंतर के प्रोटेस्ट तक यही तो हो रहा है। इसलिए क्या ये बेहतर नहीं होगा कि सीजेपी के पहुंचने से पहले सरकार स्कूलों का हाल जान ले और उन्हें बेहतर बनाए।
वैसे भी अगर स्कूल की नींव मजबूत होगी, तभी बच्चों का भविष्य मजबूत होगा। अगर इस नींव में कमी है और उस पर सवाल उठे तो मिशन भले ही सोशल हो उसका असर पॉलिटिक्स पर भी नजर आएगा ही। मध्यप्रदेश| न्यूज स्ट्राइक
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