News Strike: क्या बीजेपी को भी सताने लगा है कांग्रेस बनने का डर? पीएम मोदी से मिले शिवराज, वीडी शर्मा, तोमर

Harish Divekar | Aug 13, 2026, 07:00 IST
न्यूज स्ट्राइक
दतिया उपचुनाव में हार के बाद बीजेपी के बड़े नेताओं की दिल्ली में लगातार मुलाकातें जारी हैं। शिवराज, वीडी शर्मा और तोमर की पीएम मोदी से चर्चा से मध्यप्रदेश में गुटबाजी और नगरीय निकाय चुनाव से पहले रणनीति के संकेत मिल रहे हैं।

दतिया चुनाव के बाद क्या बीजेपी को कांग्रेस सरकार बनने का डर सताने लगा है? दतिया और दिल्ली के बीच कोई कनेक्शन नहीं है. लेकिन जब से बीजेपी दतिया में हारी है तब से दिल्ली तक की दौड़ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। ताज्जुब की बात ये है कि पूरी केंद्र सरकार अभी बड़े-बड़े मसलों में घिरी है। लोकसभा में गतिरोध है। अहम बिलों पर चर्चा नहीं हो पा रही। जैन समाज के आंदोलन ने अलग नाक में दम किया हुआ है।



और इन सब कामों के बीच पीएम मोदी मध्यप्रदेश के नेताओं से मिलने का समय निकाल रहे हैं। आखिर माजरा क्या है। क्या दतिया चुनाव को बीजेपी ने अगले विधानसभा चुनाव के लिटमस टेस्ट की तरह देखा है। किस-किस से पीएम मोदी ने मुलाकात की और क्या है वजह, चलिए इसी पर थोड़ा सा मंथन करते हैं।



दतिया के नतीजे से बीजेपी में नथिंग इज वेल

अगस्त 2026 यानी करंट मंथ से पहले अगर आप पूछते कि मध्यप्रदेश में बीजेपी की क्या स्थिति है तो शायद मेरा जवाब होता कि ऑल इज वेल.. बट नाऊ नथिंग इज वेल। दतिया हार के बाद दिल्ली में मुलाकातों का दौर क्यों तेज हुआ?



बीजेपी मध्यप्रदेश को लेकर काफी रिलेक्स हो सकती है। ये ऐसा प्रदेश है, जहां की एक-एक लोकसभा सीट पर बीजेपी का कब्जा है। विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी जीत हासिल कर रही है, लेकिन महज एक सीट के उपचुनाव ने बीजेपी का टेंशन बढ़ा दिया है। जी हां, दतिया उपचुनाव के नतीजों ने बीजेपी को मंथन करने पर मजबूर कर दिया है।



क्या जिस अंतर्कलह को बीजेपी का संगठन दबाने की कोशिश करता रहा, वो अंतर्कलह अब प्रेशर कुकर बन चुकी है? जो सीटी बजा-बजा कर ये इशारा कर रहा है कि अभी नहीं चेते तो कुकर कभी भी फट सकता है, यानी हालात बेकाबू हो सकते हैं।



वैसे बीजेपी चाहे या न चाहे, लेकिन ये पता चल ही रहा है कि पार्टी के अंदरखानों में काफी कुछ पक रहा है। वर्ना इतनी व्यस्तताओं के बीच पीएम मोदी क्यों मध्यप्रदेश के नेताओं से मिलने का समय निकालते। ये इस बात का इशारा है कि मध्यप्रदेश को लेकर बीजेपी में तनाव है।



किन-किन नेताओं से मिले पीएम मोदी

मध्य प्रदेश की सियासत में इस वक्त एक के बाद एक मुलाकातें चर्चा का विषय बनी हुई हैं। दतिया उपचुनाव के नतीजे आए और उसके बाद दिल्ली में बीजेपी के बड़े नेताओं की आवाजाही तेज हो गई।



पहले शिवराज सिंह चौहान की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई, फिर पूर्व प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा से और हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात हुई। इस बीच अमित शाह से कैलाश विजयवर्गीय की भी मुलाकात हुई। सीएम मोहन यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी दिल्ली गए और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात की।



शाह ने सिर्फ कैलाश से मुलाकात क्यों की?

अब इस पर जरा गौर कीजिए। पीएम ने मुलाकात का समय पूर्व सीएम और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष को दिया और मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष तोमर से भी मिले, जबकि शाह सिर्फ कैलाश विजयवर्गीय से मिले। उपचुनाव में हार के बाद सीएम मोहन यादव की मुलाकात पार्टी अध्यक्ष से हुई। सवाल उठना लाजमी है कि आखिर दिल्ली में चल क्या रहा है?



शिवराज और तोमर से मुलाकात के क्या हैं मायने?

दतिया उपचुनाव का नतीजा 3 तारीख को आया और इसके अगले ही दिन शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस बातचीत का एजेंडा कुछ भी हो सकता है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे मध्य प्रदेश के मौजूदा हालात से जोड़कर देखा गया।



इसी दिन कैलाश विजयवर्गीय भी कैबिनेट बैठक से निकलकर दिल्ली पहुंचे और उनकी अमित शाह से बातचीत हुई। यानी मध्य प्रदेश के कई बड़े चेहरे एक के बाद एक दिल्ली में दिखाई देने लगे।



45 मिनट की बैठक में क्या हुई चर्चा?

हैरान करने वाली बात ये है कि पीएम ने शिवराज सिंह चौहान से चर्चा की, लेकिन प्रदेश के दिग्गज मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से मुलाकात नहीं की। न ही किसी और दिग्गज मंत्री, मसलन प्रहलाद पटेल या राकेश सिंह को मिलने बुलाया।


उन्होंने शिवराज के अलावा वीडी शर्मा और नरेंद्र सिंह तोमर को ही क्यों चुना? राजनीति में ऐसी मुलाकातें आम मुलाकात नहीं होतीं, खासकर तब जब इतने सारे बड़े नेता कुछ ही दिनों के भीतर दिल्ली जाकर केंद्रीय नेतृत्व से मिलें।



इन मुलाकातों में सबसे ज्यादा चर्चा पीएम और शिवराज सिंह चौहान की मुलाकात की हुई, जिन्होंने प्रदेश सरकार से नाराजगी भी जताई। पर क्या पीएम ने सिर्फ शिवराज की नाराजगी सुनी होगी? क्या प्रदेश के हालात पर बात नहीं हुई होगी?



तोमर से मुलाकात का राजनीतिक निहितार्थ

अगर नहीं हुई तो फिर वीडी शर्मा को इतने व्यस्त शेड्यूल के बीच क्यों बुलाया गया? चलिए ये भी मान लेते हैं कि शिवराज मोदी कैबिनेट के मंत्री हैं और वीडी शर्मा सांसद हैं, इसलिए पीएम ने सारे काम छोड़कर इन दोनों को समय दिया। पर नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात क्यों की? केंद्र की राजनीति से तोमर का नाता 2023 में ही टूट चुका था। फिर तोमर से मुलाकात के क्या मायने हैं?



पीएम मोदी से मुलाकात की फोटो सभी नेताओं की खिंचती है, ये एक आम परंपरा है, लेकिन मप्र से शिवराज की नाराजगी की खबर दूर-दूर तक फैली।



भोपाल मास्टर प्लान बयान से क्यों बढ़ी चर्चा?

इसके अलावा कैलाश विजयवर्गीय का भोपाल के मास्टर प्लान पर दिया गया बयान भी काफी सुर्खियों में रहा। उन्होंने खुले तौर पर कहा कि मास्टर प्लान बनाकर मुख्यमंत्री को दिया गया है और अब उनके पास समय नहीं है।



इस बयान को भी मध्य प्रदेश सरकार के भीतर चल रही खींचतान की चर्चाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि सार्वजनिक तौर पर नेता एक-दूसरे से मिलते हैं, मुस्कुराते हैं, गले मिलते हैं और सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन राजनीति में असली सवाल यही है कि बंद कमरे में क्या बातचीत हुई।



ज्योतिरादित्य सिंधिया का पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दूसरी तरफ वीडी शर्मा की प्रधानमंत्री से मुलाकात को भी अलग-अलग राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है।



दतिया उपचुनाव में उनके इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं कि लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहे वीडी शर्मा को चुनाव प्रचार में अहमियत क्यों नहीं दी गई। नरोत्तम मिश्रा की दिल्ली में मौजूदगी ने भी चर्चाओं को हवा दी। हालांकि उनकी किसी बड़े केंद्रीय नेता के साथ तस्वीर सामने नहीं आई है। उन्होंने भी यही कहा कि वो किसी बड़े नेता से मिलने दिल्ली नहीं आए थे।



फिलहाल जवाब साफ नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि दिल्ली में मुलाकातों का सिलसिला जितना बढ़ रहा है, मध्य प्रदेश की सियासत में चर्चाओं का तापमान भी उतना ही बढ़ता जा रहा है। बीजेपी की अंदरूनी खींचतान धीरे-धीरे बाहर निकलकर आने लगी है। क्या पार्टी को भी ये डर सताने लगा है कि वो कांग्रेस तो नहीं बनती जा रही?



क्या बीजेपी में भी कांग्रेस जैसी गुटबाजी हावी हो रही है?

दिग्गजों की राजनीति और गुटों में बंटने की पहचान हमेशा कांग्रेस की रही है। दतिया चुनाव से पहले हुए घटनाक्रम ने ये साफ कर दिया कि बीजेपी में भी अब क्षत्रपों का राज हावी हो रहा है, जो पार्टी मजबूत संगठन की बात करती है, दतिया में वो संगठन तिनके की तरह बिखर गया।



नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिला तो पार्टी के जिला पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया और सड़क पर आ गए। पार्टी विद डिफरेंस के लिए ये एक अलग तरह का अनुभव था, या शायद एक बड़ा सदमा।



प्रदेश के छह क्षत्रपों की ताकत

और क्षत्रप एक नहीं बल्कि कई हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया तो आए ही क्षत्रपों वाली हैसियत के साथ हैं। इसके बाद मालवा में कैलाश विजयवर्गीय हैं, महाकौशल में प्रहलाद पटेल और राकेश सिंह हैं।



विंध्य में राजेंद्र शुक्ल हैं तो बुंदेलखंड में अब गोविंद सिंह राजपूत दमदार हो रहे हैं। ग्वालियर-चंबल में खुद तोमर और सिंधिया हैं तो बीजेपी भला ये कैसे कह सकती है कि पार्टी में संगठन सबसे ऊपर है? बीजेपी गुटों में बंट रही है या हो सकता है कि अंदर ही अंदर बंट चुकी हो और दतिया के नतीजे इसी का नतीजा भी हों।



नगरीय निकाय चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति क्या होगी?

शायद इसलिए आलाकमान परेशान है। मुलाकातों पर मुलाकातें हो रही हैं। सियासत में कोई मुलाकात बेवजह नहीं होती। और वो भी ऐसे समय में जब इससे भी बड़े-बड़े काम पेंडिंग हैं, तब पीएम का पूरा फोकस एमपी पर है। ये कोई बड़ा मैसेज जरूर है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।



बीजेपी की एक अच्छी बात है कि पार्टी कुछ हल्के में नहीं लेती। कम से कम केंद्रीय नेतृत्व कोई काम बाद के लिए नहीं टालता, इसलिए ही तो पीएम पूरी संजीदगी से मप्र के नेताओं से मिल रहे हैं और उन्हें सुन रहे हैं।



बहुत जल्द इन मुलाकातों का नतीजा सबके सामने होगा, ऐसा कहा जा सकता है। क्योंकि नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव सिर पर है, जिसे सत्ता का सेमीफाइनल कहा जाता है।



दतिया का लिटमस टेस्ट ये जाहिर कर चुका है कि बीजेपी कहां कमजोर पड़ रही है। अब मुलाकातों की ये कवायद उस कमजोरी को कितना दूर कर पाती है, ये नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव के नतीजों में जाहिर होगा।



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