NEWS STRIKE: महाकौशल की जनता क्यों नाराज? सोशल मीडिया पर नाराजगी की वजह ये तो नहीं?
क्या आप मप्र के महाकौशल अंचल से आते हैं। अगर हां तो एक बार खुद से ये सवाल जरूर पूछिए कि डबल इंजन सरकार ने मप्र को क्या क्या दिया है।
क्या अब मालवा ज्यादा मालामाल हो रहा है और क्या केंद्र में दमदार पॉजिशन हासिल कर चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया महाकौशल को मिलने वाली सौगातों को ग्वालियर चंबल ले जा रहे हैं।
ऐसा कुछ हमारा कहना नहीं है। बल्कि महाकौशल की सोशल मीडिया पर नाराजगी ये इशारा कर रही है। शायद सरकार ये भूल रही है कि वो जो जीत कर कुर्सी तक पहुंचे हैं। उसमें महाकौशल का भी बड़ा कॉन्ट्रिब्यूशन है।
महाकौशल की सियासी ताकत का गणित
महाकौशल वो अंचल है जिसमें जबलपुर, कटनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, मंडला, डिंडोरी जैसे शहर आते हैं। हम सबसे पहले इसकी पॉलिटिकल डिटेल बता देते हैं।
इस चुनाव में यानी कि साल 2023 में हुए चुनाव में महाकौशल से बीजेपी को 21 सीटें मिली और कांग्रेस को 17। इससे पहले साल 2018 के चुनाव में कांग्रेस के खाते में महाकौशल की 24 सीटें गईं थीं और बीजेपी को मिली थी मात्र 13 सीटें।
इसके बाद महाकौशल से ही आने वाले कमलनाथ मध्यप्रदेश के मुखिया बने थे। बीजेपी को ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि अगर सत्ता हासिल करने के लिए मालवा की जरूरत है, ग्वालियर चंबल और विंध्य जरूरी हैं तो महाकौशल की भी इंपोर्टेंस कुछ कम नहीं है।
वैसे भी ये इलाका ज्यादातर आदिवासी मतदाताओं का इलाका है। जो बहुत कोशिशों के बावजूद बीजेपी के लॉयल वोटर्स नहीं बने हैं। उस पर महाकौशल की नाराजगी मोल लेकर बीजेपी भारी घाटे में जा सकती है।
महाकौशल को मिली सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी
महाकौशल से कैबीनेट में दो बड़े मंत्री शामिल हैं। एक प्रहलाद पटेल और दूसरे राकेश सिंह। दोनों ही केंद्र में भी मंत्री रहे हैं और अब मोहन कैबिनेट में भी दोनों को बड़े विभाग मिले हुए हैं। इसके अलावा संपतिया उईके और राव उदयप्रताप सिंह भी कैबिनेट का अहम चेहरा हैं।
चार मंत्री पद महाकौशल के खाते में आए तब जरूर इस अंचल की बांछें खिली होंगी। क्योंकि लंबे समय बाद महाकौशल को इतनी तवज्जो मिली। जब ईश्वर दास रोहाणी विधानसभा अध्यक्ष थे तब जबलपुर का रुतबा सरकार में भी बुलंद था, लेकिन उसके बाद शिवराज कैबिनेट में महाकौशल और खासतौर से जबलपुर की वेल्यू कम हो गई।
कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को महाकौशल से भरपूर सीटें मिली, लेकिन मंत्री मिले सिर्फ दो। इसके बाद बीजेपी की सत्ता वापसी हुई, लेकिन महाकौशल को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली।
महाकौशल की नाराजगी क्यों बढ़ी?
2023 में जब इस अंचल से भी जमकर सीटें मिली तो बीजेपी ने महाकौशल को कैबिनेट में खूब अहमियत दी है। पर काम इतने से ही खत्म नहीं होगा। पिछले कुछ समय में ऐसे फैसले हुए हैं जिसने महाकौशल की नाराजगी बढ़ा दी है।
सोशल मीडिया पर ऐसी बहुत सी पोस्ट हैं जो इस नाराजगी को जाहिर कर रही हैं। हाल ही में मंत्री राकेश सिंह ने ये जानकारी दी कि देश का पहला टेलीकॉम मैन्युफेक्चरिंग जोन ग्वालियर में स्थापित किया जाएगा। इसके बाद महाकौशल स्टेट नाम के ट्विटर हैंडल पर गुस्सा साफ दिखाई दिया।
जबलपुर के हाथ से फिर निकलेगा मौका?
इसके बाद बार-बार ये सवाल हो रहे हैं कि क्या जबलपुर एक बार फिर बड़ा मौका गंवाने जा रहा है? सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि टेलीकॉम और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग की नई यूनिट्स की चर्चा तो हो रही है, लेकिन जबलपुर का नाम पीछे छूटता नजर आ रहा है।
कुछ खबरों में दावा किया गया है कि जबलपुर में टेलीकॉम विभाग के पास करीब 155 एकड़ जमीन पहले से खाली पड़ी है। यहां 5जी, 6जी और सेमीकंडक्टर से जुड़ी फैक्ट्रियां आसानी से लग सकती हैं। यानी जमीन भी है, माहौल भी है और तकनीकी अनुभव भी।
जबलपुर का टेलीकॉम से पुराना नाता
जबलपुर का टेलीकॉम से रिश्ता नया भी नहीं है। साल 1942 में यहां टेलीग्राफ फैक्ट्री शुरू हुई थी। बाद में इसे टेलीकॉम फैक्ट्री बनाया गया, जहां टेलीफोन एक्सचेंज, केबल, वायर और कई अहम इक्विपमेंट तैयार और रिपेयर किए जाते थे। अब जब दुनिया 5जी और 6जी की ओर बढ़ चुकी है, तो सवाल उठ रहा है कि इस अपग्रेडेशन का फायदा जबलपुर को क्यों नहीं मिले?
जबलपुर के घटते कद पर सवाल
कनेक्टिविटी की बात करें तो जबलपुर चार बड़े हाईवे, मजबूत रेलवे नेटवर्क और एयर कनेक्टिविटी से जुड़ा हुआ है। यानी उद्योग लगाने के लिए जो सुविधाएं चाहिए, वो यहां पहले से मौजूद हैं।
अगर टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग का कुछ हिस्सा जबलपुर को भी मिलता तो सिर्फ शहर ही नहीं, बल्कि पूरे महाकौशल में रोजगार बढ़ता, निवेश आता और उद्योगों के नजरिए से भी विकास होता।
इससे पहले मप्र आयुर्विज्ञान विश्विद्यालय को दो भागों में बांटने के फैसले से भी नाराजगी उभरी थी। सरकार ने इसे प्रशासनिक पुनर्गठन बताया, लेकिन महकौशल ने इसे अपने लिए एक कमी के तौर पर देखा।
कैबिनेट के फैसले के बाद महाकौशल और विंध्य अंचल के मेडिकल, डेंटल और दूसरे आयुष कॉलेज जबलपुर स्थित यूनिवर्सिटी के अधीन रहेंगे। जबकि भोपाल, इंदौर सहित बाकी कॉलेज उज्जैन में बनने वाली नई यूनिवर्सिटी से एफिलिएट होंगे। इससे स्टूडेंट की संख्या घटेगी और उसके साथ ही फाइनेंशियल लॉस भी होगा। उस वक्त कई खबरों में ये भी दावा किया गया था कि जबलपुर का कद लगातार घट रहा है।
महाकौशल की नाराजगी का सियासी असर
क्या सरकार महाकौशल की इस नाराजगी की तरफ ध्यान देगी। ऐसा नहीं है कि महाकौशल को कुछ नहीं मिल रहा। कुछ सौगाते हैं जो इस अंचल के हिस्से में भी आ रही हैं। जैसे जबलपुर की कनेक्टिविटी बढ़ाने कि लिए 3540 करोड़ की लागत से तैयार हो रही आउटर रिंग रोड परियोजना।
कई एलिवेटेड कॉरिडोर और सड़कें बनने का काम जोरों पर हैं। नर्मदा एक्सप्रेस वे के आसपास लॉजिस्टिक पार्क और इंड्स्ट्री बढ़ाने पर जोर है। बालाघाट में कृषि कैबिनेट करके मोहन सरकार ने इस अंचल पर गौर करने का मैसेज भी साफ दिया था, लेकिन मतदाताओं को कंपेयर करने से कैसे रोका जा सकता है।
महाकौशल बार-बार ये महसूस कर रहा है कि जो तवज्जो बाकी अंचलों खासतौर से मालवा और ग्वालियल चंबल को मिल रही है वो महाकौशल को नहीं मिल रही। बेरुखी का ये अहसास नाराजगी में बदला तो क्या बीजेपी के लिए महाकौशल की सीटों की गिनती कम नहीं होगी।
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