News Strike: सिंधिया की घट रही धमक? सीएम के साथ मंच पर क्यों नजर नहीं आते सिंधिया?
News Strike | न्यूज स्ट्राइक।क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया अब बीजेपी में भी अपना एक अलग गुट बनाकर पार्टी के अंदर अपनी सरकार चलाने की तैयारी कर चुके हैं। लगता तो ये भी है कि सीएम मोहन यादव के साथ उनकी कुछ खास पटरी नहीं बैठ रही है। वैसे तो सिंधिया अपना गुट लेकर साथ ही आए थे, लेकिन अब माय गुट माय रूल्स की तर्ज पर आगे बढ़ रहे हैं।
ज्योतिरादित्य से जुड़ी जो खबरें सामने आ रही हैं वो तो यही इशारा करती हैं कि सिंधिया पार्टी लाइन से बड़ी लकीर खींचने की कोशिश कर रहे हैं और बीजेपी हर बार उनकी लकीर को ट्रिम करने में जुट रही है। हाल ही में उनकी खुद के क्षेत्र में ऐसी घटना हुई है जो इस तरह इशारा कर रही है कि सिंधिया और सीएम अलग-अलग ट्रेक पर चल रहे हैं।
नया विवाद: लोकार्पण या राजनीति?
कांग्रेस हो या बीजेपी हो सिंधिया जहां भी रहते हैं और जो भी करते हैं वो सुर्खियां बन ही जाता है। ऐसा वो क्यों करते हैं। क्या ये मनवाने के लिए कि भले ही राजा महाराजाओं के दिन लद चुके हों। डेमोक्रेसी जिंदाबाद के नारे लगते हों, लेकिन महाराज तो वो अब भी हैं। या फिर वो ऐसे किसी भी घटनाक्रम से अनजान रहते हैं, लेकिन मक्खन लगाने के लिए उनके समर्थक ऐसा कुछ कर जाते हैं कि महाराज की तरफ उंगलियां उठ जाती हैं।
ताजे मामले कुछ ऐसे ही हैं। इत्तेफाक देखिए कि सिंधिया के प्रदेश दौरे के दौरान एक कार्यक्रम को लेकर तीन अलग-अलग विवाद खड़े हो गए। पहला विवाद ये कि सिंधिया ने उस जगह का दोबारा लोकार्पण कर दिया जिसका पहले सीएम मोहन यादव लोकार्पण कर चुके थे।
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सिंधिया का लोकार्पण: चूक या राजनीति?"
मामला अशोक नगर से जुड़ा है। चार दिन के दौरे के दौरान सिंधिया ने अशोक नगर पिपरई मार्ग पर बने नदी पुल और कजराई पंचायत के नए भवन का लोकार्पण किया। दोनों की लागत 7 करोड़ से ज्यादा है।
लोकार्पण के साथ ही इसे क्षेत्र के लिए बड़ी सौगात के रूप में पेश भी किया गया। मजाक तो तब बना जब ये पता चला कि खुद सीएम मोहन यादव इसका लोकार्पण कर चुके थे। आठ मार्च को सीएम मोहन यादव करीला धाम गए थे। वहां उन्होंने 115 करोड़ 35 लाख के विकास कार्यों का डिजिटल लोकार्पण किया था।
उन कार्यों की फेहरिस्त में ये दोनों कार्य भी शामिल थे। इससे भी बड़ा मजाक देखिए कि उस समय सीएम के साथ मंच पर पूर्व सांसद केपी यादव मौजूद थे। एक कार्यक्रम का दो बार लोकार्पण कैसे हो सकता है। ये घटना कई सवाल या यूं कहें कि चूक की तरफ इशारा करती है।
सिंधिया के लोकार्पण पर सवाल...
- क्या अशोक नगर में हुए विकास कार्यों के लोकार्पण की जानकारी सिंधिया को नहीं थी।
- अगर थी तो उन्होंने दोबारा लोकार्पण कार्यक्रम में जाना मंजूर कैसे किया।
- शासकीय या प्रशासनिक स्तर पर इस लोकार्पण कार्यक्रम की अनुमति कैसे मिल गई।
- क्या प्रशासनिक स्तर पर ये जानकारी नहीं दी गई कि लोकार्पण पहले हो चुका है।
- जब सीएम इतने अहम विकास कार्यों का लोकार्पण कर रहे थे तब क्या सिंधिया को न्यौता नहीं दिया गया था।
- ऐसा क्यों हुआ कि मंच पर सीएम के साथ उसी क्षेत्र के पूर्व सांसद दिखे, जो सिंधिया का लोकसभा क्षेत्र है।
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सिंधिया की राजनीति: क्रेडिट या चूक?
ये चूक किस स्तर पर हुई है। शासन, प्रशासन या फिर सिंधिया तंत्र के स्तर पर। या ये केवल क्रेडिट लेने की होड़ है। जो कांग्रेस की परंपरा रही है। पार्टी लेवल पर काम भले ही हो चुका हो, लेकिन ये बताना भी जरूरी है कि काम तो सांसद ने करवाए हैं।
क्या इसी सोच के साथ सिंधिया बीजेपी में रह कर एक अलग लकीर खींचने की फिर से कोशिश कर रहे हैं. घटना छोटी सी कही जा सकती है। लेकिन पार्टी विद डिफरेंस और पार्टी विद डिसिप्लीन की डींगे हांकने वाली बीजेपी के लिए ये एक गंभीर घटना है। इसी कार्यक्रम से जुड़ी दो विवाद और हैं। उन्हें भी जल्दी से बता देता हूं।
सिंधिया को 'श्रीमंत महाराज' क्यों?
अशोक नगर के ही कार्यक्रम के लिए एसडीएम ऑफिस से एक निमंत्रण पत्र जारी हुआ। इस निमंत्रण पत्र में सिंधिया के नाम के आगे श्रीमंत महाराज लिखा गया। इस पर नगर पालिका नेता प्रतिपक्ष रीतेश जैन ने आपत्ति जताई और इसे संविधान की भावना के विपरीत बताया।
उन्होंने अधिकारियों पर चाटुकारिता का आरोप भी लगाया। बात तो सही है एक सरकारी दस्तावेज में श्रीमंत महाराज जैसे शब्द का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। वो भी एक जनप्रतिनिधि के लिए जिसे जनता ने चुनकर सदन में भेजा है।
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शिलालेख पर नाम के क्रम पर विवाद
तीसरा विवाद हुआ शिलालेख को लेकर। इस कार्यक्रम के शिलालेख में जिला पंचायत अध्यक्ष राव अजय प्रताप सिंह का नाम सातवें नंबर पर है, जबकि पूर्व विधायक जजपाल सिंह का नाम उनसे पहले है। राव अजय प्रताप सिंह का कहना है कि जो पद पर होते हैं क्रम में उनका नाम ऊपर होना चाहिए। इस पर अधिकारियों ने जांच की बात कहकर फिलहाल मामला ठंडा करने की कोशिश की है।
सिंधिया की पुरानी सियासी आदतें
तीसरे मामले को हम भी अभी छोड़ देते हैं और बात दो मामलों की करते हैं। जो ये इशारा कर रही है कि सिंधिया ने पार्टी भले ही बदली है, लेकिन पुरानी सियासी आदतें अब भी नहीं छोड़ पाए हैं। जो बार-बार सवाल खड़े कर देती है। आप खुद ही याद करके देखिए।
पिछले चुनाव से लेकर अब तक आपने कितने कार्यक्रम ऐसे देखे हैं जिसमें सीएम मोहन यादव और सिंधिया एक साथ एक मंच पर नजर आए हैं। जबकि शिवराज के सीएम रहते सिंधिया कार्यक्रमों में उनकी बराबरी से नजर आते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता। क्या पार्टी ने उनके दौरे सीमित कर दिए हैं या फिर सीएम और सिंधिया के बीच सबकुछ सामान्य नहीं है।
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सिंधिया समर्थकों के लिए पदों की जंग
निगम मंडलों की लिस्ट को लेकर भी ऐसी ही खबरें आ रही हैं। इसलिए सवालों को वाजिब कहा ही जा सकता है। बीजेपी ने जयभान सिंह पवैया को वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया है। ये भी इसी बात का संकेत है कि सिंधिया विरोधियों को बीजेपी में नई लाइफलाइन दी जा रही है।
खबरें ये भी हैं कि सिंधिया की जिद की वजह से ही निगम आयोग में नियुक्ति की बात आगे नहीं बढ़ पा रही है। सिंधिया अपने पांच समर्थक इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, ओपीएस भदौरिया, गिरीराज दंडोतिया और मुन्ना लाल गोयल के लिए पद चाहते हैं।
अंदर की खबर ये है कि पार्टी तीन नामों पर सहमत है, लेकिन दो नामों पर असहमति बनी हुई है। इसलिए लिस्ट अटकी है। इससे उलट 2021 में 25 निगम मंडलों में सिंधिया समर्थक काबिज थे। उस वक्त सिंधिया और उनके समर्थक नए नए पार्टी का हिस्सा बने थे। इसलिए उन्हें फाइव स्टार ट्रीटमेंट भी दिया जा रहा था। शायद इसलिए इतने पद दिए गए थे।
सिंधिया की धाक लिस्ट बताएगी!
सिंधिया को लेकर सवाल तो कई हैं। अब उनकी धाक कितनी बची है। इसका अंदाजा निगम मंडलों की लिस्ट के साथ ही हो सकेगा। देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी भी महाराज को सिर आंखों पर बिठाती है या फिर आम मंत्री या सांसद की तरह ही उनके साथ पेश आती है।