मैं इतना करती हूं फिर भी वो नोटिस नहीं करते… कैसे बचाएं अपनी लव लाइफ
आपने अपने परिवार में, रिश्तों में या अपने आसपास कई बार एक बात जरूर देखी होगी। हम अपने पार्टनर या किसी अपने को बहुत कुछ कहना चाहते हैं। उन्हें अपनी भावनाएं समझाना चाहते हैं, लेकिन हमारी बात उन तक वैसी पहुंच ही नहीं पाती जैसी हम चाहते हैं।
धीरे-धीरे यही स्थिति शिकायतों का रूप ले लेती है।
रिश्तों में आम शिकायतें- क्या आपकी भी यही है?
कोई कहता है, "मेरे पति मेरी बात सुनते ही नहीं हैं।" कोई कहता है, "मेरी पत्नी मेरी भावनाओं को समझती ही नहीं।" कई महिलाओं की शिकायत होती है कि, "मैं उनके लिए इतना कुछ करती हूं, लेकिन वे मुझे नोटिस ही नहीं करते।"
वहीं कई पुरुष भी यह महसूस करते हैं कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
अगर आप भी कभी ऐसी स्थिति से गुजरे हैं, तो हो सकता है कि समस्या (Conflict) उतनी बड़ी न हो, जितनी दिखाई देती है।
मनोवैज्ञानिक कारण क्या है?
इसके पीछे एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक कारण है।
हमारा मस्तिष्क दुनिया को पांच इंद्रियों के माध्यम से समझता है। जो कुछ भी हम देखते हैं, सुनते हैं, महसूस करते हैं, सूंघते हैं या स्वाद लेते हैं, वही जानकारी हमारे सबकॉन्शियस माइंड तक पहुंचती है।
लेकिन हर व्यक्ति का मस्तिष्क इस जानकारी को एक तरह से प्रोसेस नहीं करता। यहीं से रिश्तों (Relationship) में गलतफहमियां जन्म लेने लगती हैं।
असली समस्या इग्नोर नहीं, भाषा का अंतर है।
अक्सर हमें लगता है कि सामने वाला हमें इग्नोर कर रहा है। हमारी बातों को महत्व नहीं दे रहा या हमारी भावनाओं की कद्र नहीं करता। जबकि अधिकांश मामलों में वास्तविकता कुछ और होती है।
समस्या प्यार की कमी नहीं होती, बल्कि संवाद की भाषा का अंतर होता है। इसे आप प्यार की भाषा (Love Language) भी कह सकते हैं और मनोविज्ञान की संवाद भाषा भी।
दिल्ली दंपती का वास्तविक केस
इसी बात को समझाने के लिए मैं अपने पास आए एक वास्तविक केस का उदाहरण देना चाहूंगा।
यह दिल्ली के एक दंपती का मामला था। पहली मुलाकात में पत्नी की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि, "मेरे पति मेरी बात सुनते ही नहीं हैं। मैं कुछ भी कहूं, वे अनसुना कर देते हैं। कभी प्रतिक्रिया नहीं देते, कभी जवाब नहीं देते। ऐसा लगता है जैसे मेरी बात उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती।"
मैंने पति से भी अलग से बात की। दोनों का विस्तृत मनोवैज्ञानिक आकलन (Assessment) किया।
जब Assessment ने खोला सच
जब उनके व्यक्तित्व, संवाद करने के तरीके और जानकारी ग्रहण करने की शैली का विश्लेषण किया गया, तो एक रोचक बात सामने आई।
समस्या किसी एक व्यक्ति में नहीं थी।
समस्या केवल यह थी कि दोनों की संवाद की भाषा अलग-अलग थी।
चिड़ियों की भाषा वाला उदाहरण
हम अक्सर सोचते हैं कि अगर सामने वाला हमारी तरह बात नहीं समझ रहा, तो वह हमें समझना ही नहीं चाहता। जबकि वास्तविकता यह है कि हर व्यक्ति का सबकॉन्शियस माइंड जानकारी को अपने अलग तरीके से ग्रहण और प्रोसेस करता है।
इसे ऐसे समझिए- जैसे पेड़ों पर बैठी चिड़ियां लगातार आपस में संवाद करती रहती हैं। वे एक- दूसरे की भाषा समझती हैं, लेकिन हम उसे डिकोड नहीं कर पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि वे संवाद नहीं कर रहीं, बल्कि उनकी भाषा हमसे अलग है।
इंसानों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।
जब भाषा समझ आई, रिश्ता बदल गया
यदि हम यह समझ जाएं कि सामने वाला व्यक्ति किस प्रकार की भाषा में भावनाओं को ग्रहण करता है और किस माध्यम से वह सबसे बेहतर ढंग से समझता है, तो रिश्तों में संवाद बहुत आसान हो सकता है।
उसी दंपती के साथ भी यही हुआ। जब उनकी मनोवैज्ञानिक संवाद शैली को समझा गया, तब स्पष्ट हुआ कि पति और पत्नी दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन दोनों प्रेम व्यक्त भी अलग तरीके से कर रहे थे और समझ भी अलग तरीके से रहे थे।
यहीं से उनके रिश्ते में सकारात्मक बदलाव शुरू हुआ।
"मैं सजती हूं पर वो देखते ही नहीं"- क्या यह सच है?
कई महिलाओं की शिकायत होती है, "मैं अपने पति के लिए अच्छे से तैयार होती हूं, सजती-संवरती हूं, लेकिन वे मेरी ओर ध्यान ही नहीं देते।"
अगर आपके मन में भी कभी ऐसा विचार आया है, तो जरूरी नहीं कि इसका अर्थ यह हो कि आपके पति आपको महत्व नहीं देते या आपसे प्रेम नहीं करते।
हो सकता है कि उनकी प्रमुख संवाद शैली विजुअल (Visual) न हो।
कंप्यूटर जैसा है हमारा दिमाग
अर्थात उनका मस्तिष्क देखने से मिलने वाली जानकारी को उतनी तेजी से प्रोसेस नहीं करता, जितना किसी दूसरे व्यक्ति का करता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वे आपको देखते नहीं हैं।
वे देखते हैं, लेकिन उस जानकारी को समझने, उसका अर्थ निकालने और उस पर प्रतिक्रिया देने में उनके मस्तिष्क को थोड़ा अधिक समय लगता है।
ठीक वैसे ही जैसे किसी कंप्यूटर में कोई भारी सॉफ्टवेयर चल रहा हो। सॉफ्टवेयर काम तो करता है, लेकिन उसकी प्रोसेसिंग में समय लगता है। हमारे मस्तिष्क की भी अपनी-अपनी प्रोसेसिंग स्पीड होती है।
थोड़ा इंतजार, बड़ा बदलाव
ऐसी स्थिति में यदि आप तुरंत प्रतिक्रिया की अपेक्षा रखेंगी, तो संभव है कि आपको निराशा हो। लेकिन यदि आप उन्हें थोड़ा समय दें, तो वही व्यक्ति कुछ देर बाद आपकी तारीफ भी कर सकता है, आपकी भावनाओं को समझ सकता है और अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकता है।
रिश्ते केवल इस बात से नहीं चलते कि सामने वाला क्या कह रहा है, बल्कि इस बात से भी चलते हैं कि वह कैसे समझता है और कैसे प्रतिक्रिया देता है।
संवाद भाषा समझना- रिश्ते मजबूत करने का रास्ता
जब हम अपने जीवनसाथी या अपने प्रियजनों की संवाद भाषा को समझना शुरू कर देते हैं, तो रिश्तों को निभाना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाता है।
रोज-रोज की छोटी-छोटी नोकझोंक, शिकायतें और अनावश्यक तकरार कम होने लगती हैं। क्योंकि तब हम केवल शब्द नहीं सुनते, बल्कि सामने वाले के मन की भाषा को भी समझने लगते हैं।
FAQ
- पार्टनर मेरी बात क्यों नहीं सुनता?
हर व्यक्ति की संवाद भाषा (Communication Style) अलग होती है। जो आप Visual तरीके से समझाती हैं, वह उनकी Auditory या Kinesthetic भाषा से मेल नहीं खाता। यह इग्नोर करना नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग का अंतर है। - लव लैंग्वेज और कम्युनिकेशन स्टाइल में क्या फर्क है?
लव लैंग्वेज यह बताती है कि आप प्यार कैसे देते और लेते हैं। कम्युनिकेशन स्टाइल बताती है कि आपका दिमाग जानकारी कैसे ग्रहण और प्रोसेस करता है। दोनों मिलकर रिश्ते की भाषा बनाते हैं। - अगर पति-पत्नी की संवाद भाषा अलग हो तो क्या करें?
सबसे पहले यह पहचानें कि दोनों में से कौन Visual, Auditory या Kinesthetic है। फिर उसी की भाषा में संवाद करने की कोशिश करें। काउंसलिंग इस प्रक्रिया में बहुत मदद करती है। - क्या पुरुष सच में भावनाएं नहीं समझते?
नहीं। पुरुषों की प्रोसेसिंग स्पीड अलग हो सकती है। वे समझते हैं, लेकिन प्रतिक्रिया देने में समय लग सकता है। तुरंत जवाब न मिलने का मतलब उदासीनता नहीं है। - Visual, Auditory, Kinesthetic का मतलब क्या है?
ये तीन मुख्य संवाद शैलियां हैं। Visual लोग देखकर समझते हैं, Auditory सुनकर, और Kinesthetic महसूस करके। हर व्यक्ति में इनमें से कोई एक प्रमुख होती है जो उनके रिश्तों को प्रभावित करती है।
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