सिंहासन छत्तीसी : भाजपा नेत्री का राज्याभिषेक,मंत्री का गर्ल्स कॉलेज पर आया दिल
RAIPUR : छत्तीसगढ़ में जो कुछ हो रहा है वो कमाल है। यहां तो विधायक बनने की चाहत में अपना राज्याभिषेक भी कराया जाने लगा है। दरअसल यह महत्वाकांक्षा भी पार्टी के बड़े नेता जगाने लगें तो फिर इतना करना तो बनता है।
यहां की एक बीजेपी नेत्री ने अपने जन्म दिन पर अपना ही राज्याभिषेक करा लिया। अब वे इसे जो भी नाम दें लेकिन तरीका तो कुछ इसी तरह का था।
खैर सियासत में सबकी इच्छा होती है उपर उठने की लेकिन यह सब सार्वजनिक हो जाए तो थोड़ा गड़बड़ हो जाता है। वहीं एक और मंत्रीजी की कहानी सियासत की नदी में तैर रही है।
मंत्रीजी को कुछ गर्ल्स कॉलेज पर ज्यादा ही दिलचस्पी हो गई है। उनकी मेहरबानी इन कॉलेजों पर बरस रही है। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।
विधायकी के लिए राज्याभिषेक :
हमने सुना है कि राज्यअभिषेक अक्सर भगवान या राजा का होता है। लेकिन आजकल राजनीति में बड़ा पद पाने के लिए भी राज्याभिषेक होने लगा है। एक भाजपा नेत्री ने अपने जन्मदिन पर अपना ही राज्याभिषेक करवा लिया। हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वो जिस तरह से हुआ उसे राज्याभिषेक ही कहते हैं।
बड़ी सी थाल में बैठकर मंत्रोच्चार के साथ आचार्यों से शंख से दूध दही स्नान कराया गया। ऐसा कुछ तो सिनेमा में ही दिखाई देता है जब राजा का राज्याभिषेक होता है। तो क्या यह भी कुछ इसी तरह की उद्घोषणा थी कि सिंहासन खाली करो कि अब हम आते हैं।
ये नेत्री शायद पार्षद से विधायक बनने की तैयारी में हैं। और इसी की ये शुरुआत है। विधानसभा भी इन्होंने उत्तर चुनी है। संगठन के कुछ बड़े नेताओं ने इनको भरोसा भी दिलाया है।
खैर राजनीति में महत्वाकांक्षा पालना कोई बुरी बात नहीं है। हर नेता आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन सियासत का दूसरा पहलू ये भी है कि यदि सार्वजनिक तौर पर इस तरह की बातें सामने आने लगीं तो नुकसान भी हो सकता है। खैर धार्मिक अनुष्ठान तो हो गया अब बस राजनीतिक अनुष्ठान की बारी है।
मंत्रीजी की गर्ल्स कॉलेज पर मेहरबानी :
आज कल एक मंत्रीजी की गर्ल्स कॉलेज में बड़ी दिलचस्पी हो गई है। इन कॉलेज से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्र कहते हैं कि प्रदेश में तीन ऐसे प्रायवेट महिला महाविद्यालय हैं जिन पर मंत्रीजी की मेहरबानी है। दो कॉलेज रायपुर और एक कोरबा में है। इनको साल में सरकार की तरफ से करोड़ों का ग्रांट मिलता है।
सूत्र इसके पीछे की बड़ी वजह भी बताते हैं। दरअसल इस ग्रांट पर फिफ्टी फिफ्टी की डील है। यानी जो ग्रांट सरकार से मिलता है उसमें आधा हिस्साा कॉलेज का और आधा हिस्सा मंत्रीजी और विभागीय साहब का होता है। यह राशि सीएम स्वेच्छानुदान से दी जा रही है।
वैसे छत्तीसगढ़ में कई ऐसे कॉलेज हैं जो मापदंडों पर इन कॉलेजों से उपर हैं लेकिन उन पर मंत्रीजी की मेहरबानी नहीं है। खैर जहां पर कमाई होगी वहीं पर तो मेहरबानी होगी क्योंकि यहां तो सुशासन चल रहा है।
चढ़ावे का हिसाब मांगना पड़ा भारी :
आस्था बड़ी चीज है। मंदिर में चढ़ाया गया एक रुपया भी श्रद्धालु के लिए सिर्फ रुपया नहीं होता, उसके साथ भरोसा जुड़ा होता है। इसलिए जब कोई पूछे कि मंदिर में कितना चढ़ा, कहां खर्च हुआ और हिसाब-किताब क्या है, तो सवाल का जवाब हिसाब की भाषा में मिलना चाहिए।
लेकिन छत्तीसगढ़ विधानसभा परिसर से जुड़ी यह कहानी कुछ अलग ही इशारा करती है। यहां एक कर्मचारी ने मंदिर में आने वाले चढ़ावे का हिसाब मांग लिया। सवाल भी कोई बहुत भारी-भरकम नहीं था। श्रद्धालुओं की आस्था से आने वाले पैसे का हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं है। बस फिर क्या था, सवाल मंदिर के चढ़ावे से निकलकर कर्मचारी की नौकरी की फाइल तक पहुंचता दिखाई देने लगा।
अब इसे संयोग कहिए या सवाल का साइड इफेक्ट, लेकिन चर्चा यही है कि चढ़ावे का हिसाब मांगने वाले की सेवा का हिसाब-किताब भी खंगाला जाने लगा है। यानी मंदिर के दानपात्र में कितने पैसे आए, यह पूछना अलग मुद्दा था और कर्मचारी की नौकरी का रिकॉर्ड अलग। मगर दोनों की फाइलें एक ही मेज पर आती दिखें तो सवाल तो उठेंगे ही।
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