सिंहासन छत्तीसी : डॉली से क्यों परेशान है पूरा महकमा, मंत्री की नहीं सुनते विभाग के अफसर
RAIPUR : छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारे में डॉली की इंट्री हो गई है। इस डॉली ने पूरे विभाग को परेशान कर दिया है। डॉली ऐसी गायब हुई है कि ढूंढे नहीं मिल रही। दरअसल यह उन परेशान कर्मचारियों की मददगार है जिनको कहीं हेल्प नहीं मिल रही। आखिर कौन है यह डॉली,अफसरों की जुबां पर एक ही सवाल है।
वहीं छत्तीसगढ़ के मंत्री अपने मातहत अफसरों से ही परेशान हैं। मंत्री की नोटशीट तक का असर नहीं हो रहा। बीजेपी संगठन ने अब उन नेताओं को काम पर लगा दिया है जिनको मलाईदार निगम मंडल सौंपे हैं।
यानी इतनी गर्मी में भी नेताजी का आराम हराम हो गया है। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र पर पढ़िए सिंहासन छत्तीसी।
डॉली-किसी की मददगार,किसी की परेशानी :
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य महकमे की डॉली इन दिनों खूब चर्चा में है। इस डॉली से पूरा महकमा परेशान है। ऐसा नहीं है कि सभी परेशान हैं बल्कि कई लोग कानों तक खुश हैं। डॉली से परेशान अफसर हैं और खुश कर्मचारी। आये दिन डॉली की लिखी शिकायतें एचओडी से लेकर सचिव स्तर के अधिकारी तक पहुंच रही हैं।
इन शिकायतों में वो सब कुछ है जिससे कर्मचारी परेशान हैं। कर्मचारी किस बात से परेशान हैं, किस अधिकारी से परेशान हैं और विभाग में क्या काला पीला चल रहा है और यह काला पीला कौन कर रहा है। यह सब बातें डॉली के शिकायत पत्र में होती हैं। परेशान अधिकारियों ने इस डॉली को तलाश करना शुरु किया। तलाश के बाद यह नतीजा निकला कि विभाग में डॉली नाम की कोई है ही नहीं।
इसके बाद अधिकारियों का माथा ठनका कि आखिर डॉली बनकर कौन उनकी शिकायतें कर रहा है। अब उसकी तलाश हो रही है जो डॉली के नाम पर शिकायतें कर रहा है। खैर जो भी हो लेकिन कर्मचारी तो खुश हैं कि उनकी बातें तो कम से कम उपर तक पहुंच गईं।
अफसरों के सामने लाचार मंत्री :
परिवहन और वन विभाग में इन दिनों फाइलों का ऐसा वनवास चल रहा है कि मंत्री भी कृपया प्रतीक्षा करें मोड में दिखाई दे रहे हैं। सिस्टम में कुछ ऐसे घाघ खिलाड़ी बैठ गए हैं, जिनकी पकड़ इतनी मजबूत बताई जा रही कि मंत्री की कलम चल जाए, सचिव की मुहर लग जाए, मगर आदेश बाहर निकलने से पहले ही किसी रहस्यमयी सुरंग में गायब हो जाते हैं। परिवहन विभाग में हर छह महीने में इंस्पेक्टरों का रोटेशन होता है। इस बार भी परिवहन मंत्री ने 100 इंस्पेक्टरों के तबादले वाली नोटशीट पर हरी झंडी दिखाकर नीचे सरका दी।
परिवहन सचिव ने भी सरकारी परंपरा निभाते हुए अनुमोदन कर दिया। अब होना यह था कि आदेश निकलता इंस्पेक्टर बोरिया-बिस्तर बांधते और नए जिलों की ओर रवाना हो जाते। मगर तभी सिस्टम में बैठे किसी शक्तिमान ने ब्रेक लगा दिया। अब मई आधा बीतने को है लेकिन आदेश फाइलों के जंगल से बाहर नहीं निकल पाया। विभाग में हर कोई वही पुराना सवाल पूछ रहा है कि आखिर रोका किसने। लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं।
दिलचस्प बात यह है कि यही हाल वन विभाग में भी बताया जा रहा है। वहां प्रोबेशन पूरा कर चुके एसडीओ ट्रेनिंग खत्म होने के बाद से पोस्टिंग का सपना आंखों में सजाए बैठे हैं। महीने भर से बैग पैक है, परिवार तैयार है, मगर आदेश का कहीं अता-पता नहीं। ऐसा लग रहा है मानो फाइलें किसी साइलेंट मोड वाले कमरे में ध्यान साधना कर रही हों। इन घाघ लोगों के सामने मंत्री लाचार हैं।
बहुत हुआ आराम,अब काम करो :
बीजेपी संगठन ने अपने नेताओं को काम पर लगा दिया है। फरमान सुना दिया गया है कि बहुत हुआ आराम अब काम करो। ये वे नेता हैं जिनको मलाईदार निगम मंडल मिले हैं। निगम मंडल तो वैसे भी सत्ताधारी पार्टी के अपने लोगों को उपकृत करने का साधन हुआ करते हैं। गाड़ी,बंगला और मंत्री दर्जा मिलते ही नेताजी का रसूख सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
अब इन रसू्खदारों को बीजेपी संगठन ने एक एक विधानसभा की जिम्मेदारी सौंप दी है। साथ इनको ताकीद कर दिया है कि आगे कुछ और चाहते हो तो इन विधानसभा में जीत की जिम्मेदारी लो। अब नेताजी परेशान हैं कि इस भरी गर्मी में एसी कैबिन में बैठकर नेतागिरी चमकाने की बजाय तपती धूम में विधानसभा क्षेत्र में डेरा डालने का फरमान आ गया है।
तकलीफ तो ये भी है कि जीत की जिम्मेदारी वो भी किसी और की। लेकिन यह बंगाल जीत का असर है जो सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ पर पड़ा है। छत्तीसगढ़ में भी अब बंगाल फॉर्मूला से अगली जीत पक्की करने की कवायद की जा रही है।