सिंहासन छत्तीसी : मिनिस्टर बनने विधायक की बगलामुखी मंदिर में तंत्र पूजा,मंत्री का पीए बनने 50 पेटी का ऑफर,चुनावी सर्वे से सनसनी
दूसरी तरफ मंत्री का पीए बनने के लिए लाखों के ऑफर मिल रहे हैं। खबर है कि पीए बनाने के लिए मंत्री को 50 लाख के चढ़ावे की पेशकस भी कर दी गई है। अब जब चढ़ावा 50 लाख का होगा तो कमाई कितने की होगी इसका अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। चुनाव से बहुत पहले ऐसा सर्वे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस सर्वे में अगले चुनाव में कौन जीतेगा,कौन हारेगा इसका पूरा एग्जिट पोल बताया गया है। इस सर्वे ने हड़कंप मचा दिया है। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों को जानने के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।
मंत्री पद के लिए तंत्र साधना
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों मंत्री पद की कुर्सी का तापमान कुछ ज्यादा ही बढ़ा हुआ है। विधायक जी को भी शायद लगा कि सियासी समीकरणों से बात नहीं बन रही तो थोड़ा आध्यात्मिक समीकरण आजमा लिया जाए। बस फिर क्या था पहुंच गए मध्यप्रदेश के नलखेड़ा के प्रसिद्ध बगलामुखी मंदिर। वहां मंत्री पद की मनोकामना लेकर बाकायदा तांत्रिक पूजा करवाई गई।
अब पूजा कितनी असरदार रही यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन इतना जरूर है कि मंत्रिमंडल की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अब सियासी गणित के साथ तंत्र का गणित भी आजमाया जा रहा है। वैसे भी राजनीति भी कमाल की चीज है। यहां विधायक बनने के लिए जनता का आशीर्वाद चाहिए, पार्टी का टिकट चाहिए, चुनाव जीतना पड़ता है। लेकिन मंत्री बनने की बारी आते ही समीकरण कुछ और पेचीदा हो जाते हैं।
किसका नाम आगे है, किसका पीछे, किसका वजन कितना है और किसकी किससे बनती है इन सवालों के बीच शायद विधायक जी ने सोचा होगा कि एक दरवाजा धरती पर है तो दूसरा ऊपर भी खुला रखना चाहिए। क्योंकि मंत्री पद की कुर्सी ऐसी चीज है, जिसके लिए सियासी लॉबिंग से लेकर समीकरण, संपर्क और अब साधना तक सब कुछ आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। बता दें कि यह विधायक इन दिनों बहुत चर्चा में है कभी सीबीआई जांच को लेकर तो कभी कांग्रे से संपर्क को लेकर तो कभी सोशल मीडिया में अपनी मौजूदगी को लेकर।
मंत्री का पीए बनने बड़ा चढ़ावा
सत्ता के गलियारों में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिनमें फाइलें कम और किस्से ज्यादा चलते हैं। एक साहब की कहानी भी इन दिनों कुछ ऐसी ही चर्चा में है। कहा जाता है कि साहब की ओएसडी बनने की यात्रा इतनी दिलचस्प है कि इसे सरकारी सेवा की जगह सत्ता सेवा का पाठ्यक्रम माना जा सकता है। साहब पर फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र के सहारे नौकरी का लाभ लेने के आरोप भी लगते रहे हैं।
सत्ता के गलियारों में साहब की असली पहचान मंत्री जी के ओएसडी के तौर पर बनी। ओएसडी बने तो फिर काम भी बड़ा मिल गया। सप्लाई से लेकर ट्रांसफर-पोस्टिंग तक की व्यवस्थाओं में साहब की सक्रियता की चर्चाएं होने लगीं। धीरे-धीरे साहब ने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर ली कि मंत्री जी का दफ्तर एक तरफ और साहब की अपनी व्यवस्था दूसरी तरफ चलने लगी।
कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब साहब ने मंत्री जी के हिस्से का माल भी अपने पास ही रोक लिया। बात जब मंत्री जी तक पहुंची तो फिर सत्ता की भाषा में हिसाब-किताब हुआ। साहब की ऐसी खातिरदारी हुई कि शिकायत ऊपर तक पहुंच गई। नतीजा साहब को राजधानी से उठाकर दिल्ली की हवा खिलाने का इंतजाम कर दिया गया। फिर व्यवस्था बनाकर प्रदेश वापसी का रास्ता तलाश लिया।
साहब को फिर ओएसडी बनने की ऐसी बेचैनी हुई कि एक मंत्री जी के दरबार में पचास पेटी का चढ़ावा तक पहुंच गया। साहब को शायद भरोसा रहा होगा कि इस बार फाइल भी चलेगी और सेटिंग भी। लेकिन किसी शुभचिंतक ने मंत्री जी के कान में धीरे से फूंक मार दी। मंत्री जी, संभलक साहब कमीशन में आत्मनिर्भर बताए जाते हैं।
कहीं ऐसा न हो कि आपका हिस्सा भी आत्मनिर्भर भारत की तर्ज पर आत्मनिर्भर होकर साहब के पास ही रह जाए! बस फिर क्या था! मंत्री जी ने पचास पेटी की तरफ देखा, फिर साहब की तरफ देखा और फैसला सुना दिया। अपना माल वापस ले जाइए हमारे यहां आपके लिए कोई काम नहीं है। अब खबर है कि अगला दरबार तलाशा जा रहा है। दूसरे मंत्री जी के यहां ओएसडी बनने की कोशिशें जारी हैं।
वायरल सर्वे से सनसनी
विधानसभा चुनाव में अभी दो साल से ज्यादा वक्त बाकी है। लेकिन सर्वे और एग्जिट पोल अभी से आने लगे हैं। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक सर्वे वायरल हो रहा है। इस सर्वे ने सत्ताधारी दल बीजेपी के नेताओं का ब्लड प्रेशर बढ़ा दिया है। इस सर्वे में बताया गया है कि बीजेपी के मौजूदा 54 विधायकों में से अगले चुनाव में महज 15 ही जीत पाएंगे बाकी 35 की स्थिति गड़बड़ है। इसमें यह भी बताया गया है कि अधिकांश मंत्री हार जाएंगे।
इस सर्वे के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है। लोग इस पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि यह कांग्रेस का सर्वे है जो अभी से खुशफहमी की गलतफहमी में चला गया है। वहीं कुछ लोगों की राय है कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी और नौकरशाही की मनमानी से तो यही लगता है कि अगली बार बीजेपी की हालत पतली रहेगी। बहरहाल असलियत तो चुनाव में सामने आएगी लेकिन लोगों को बैठे बिठाए चर्चा का नया टॉपिक मिल गया है।