सिंहासन छत्तीसी : IPS अफसर ने रसूख का इस्तेमाल कर कौड़ियों में खरीदी करोड़ों की जमीन, मंत्री के पावर से रुक गया डीजीपी का ऑर्डर
Raipur. छत्तीसगढ़ के एक सीनियर आईपीएस अफसर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर 500 करोड़ की संपत्ति बना ली है। प्रॉपर्टी की डिटेल में भले ही इन्होंने 2 करोड़ की संपत्ति बताई हो, लेकिन असल में ये 500 करोड़ के मालिक हैं। इन्होंने अपनी पत्नी और खुद के नाम से करोड़ों की जमीन कौड़ियों में खरीदी है।
वहीं एक पावरफुल मंत्री के पावर ने प्रभारी डीजीपी को परमानेंट डीजीपी बनाने का ऑर्डर रोक दिया। ऑर्डर होने ही वाला था, लेकिन मंत्री जी ने अपना वीटो लगा दिया और मामला जस का तस रुक गया। एक और कमाल की बात है कि कलेक्टर की जांच डिप्टी डायरेक्टर कर रहे हैं।
अब बताइए भला कि क्या नहाएंगे और क्या निचोड़ेंगे। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।
आईपीएस अफसर ने कौड़ियों में ली करोड़ों की जमीन
छत्तीसगढ़ के एक सीनियर आईपीएस अफसर करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं। संपत्ति की सार्वजनिक जानकारी में इन्होंने अपनी संपत्ति 2 करोड़ की बताई है, लेकिन असल में ये 500 करोड़ के मालिक हैं। साहब ने मैडम यानी अपनी पत्नी के साथ मिलकर अचल संपत्तियों का एक महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो हासिल किया है, जो इनके रसूखदार होने का सर्टिफिकेट दे रहा है।
इन्होंने अपने रसूख से करोड़ों की जमीनों को कौड़ियों के दाम खरीदा है। इनकी जमीनें रायपुर, बिलासपुर और धमतरी के अलावा दिल्ली, मुंबई में भी हैं। इनकी ये जानकारी जिम्मेदार लोगों के पास भी पहुंच गई है। रायपुर के पास 49 लाख की कीमत पर एक घर के साथ 2.64 हेक्टेयर सिंचित भूमि खरीदी गई, जबकि खरीद के समय इसका बाजार मूल्य लगभग 20 करोड़ रुपए था।
बिलासपुर के पास 40 लाख की कीमत पर 2.18 हेक्टेयर डाइवर्टेड भूमि खरीदी गई, जबकि इसका बाजार मूल्य लगभग 15 करोड़ रुपए था। धमतरी जिले में दो लाख 60 हजार 485 रुपए की कम कीमत पर 0.16 हेक्टेयर सिंचित भूमि खरीदी गई, जबकि बाजार मूल्य लगभग 5 करोड़ रुपए था। रायपुर के पास ही दो लाख 45 हजार रुपए की घोषित कीमत पर खेती योग्य सिंचित भूमि खरीदी गई, जबकि वास्तविक बाजार मूल्य लगभग एक करोड़ था।
आरोप है कि उन्होंने रायपुर, लखनऊ, दिल्ली एनसीआर, बिलासपुर, पुणे, नासिक और मुंबई सहित प्रमुख स्थानों पर 500 करोड़ से अधिक की संपत्ति जमा की है। यह साहब भूपेश सरकार के करीबी अफसरों में शुमार थे। इनका नाम छत्तीसगढ़ के एक बड़े घोटाले में भी सामने आया है।
मंत्री ने रोकी डीजीपी की फाइल
छत्तीसगढ़ सरकार के एक मंत्री इन दिनों बहुत पावर में हैं। पावरफुल मंत्री के इसी पावर ने प्रभारी डीजीपी को परमानेंट डीजीपी बनाने वाली फाइल रोक दी। जब मंत्री का पावर हो, तो कैसे निकलेगा ऑर्डर? जब सबकुछ तय हो गया था और मंत्रालय से परमानेंट डीजीपी बनाने का ऑर्डर निकलने ही वाला था, तब मंत्री जी ने उसे रोक दिया।
दरअसल, मंत्री जी जिसे डीजीपी चाहते थे, वह नाम उस ऑर्डर में नहीं था। सरकार प्रभारी को ही स्थायी पुलिस मुखिया बनाने जा रही थी, लेकिन खबर है कि मंत्री जी की पसंद नंबर दो है। और वे नंबर दो को ही नंबर एक बनाना चाहते हैं। दिल्ली से भी जो पैनल आया है, उसमें भी दो ही नाम हैं। मंत्री जी के वीटो के कारण यह ऑर्डर आते-आते रुक गया। अब देखते हैं डीजीपी में किसकी चलती है - सरकार की या मंत्री जी की।
डिप्टी डायरेक्टर कर रहे कलेक्टर की जांच
कभी ऐसा होता है कि बड़े अफसर की जांच छोटे अफसर को दी जाए? शायद ऐसा आपने कभी नहीं सुना होगा। लेकिन यह छत्तीसगढ़ में मुमकिन है। कोरबा में डीएमएफ घोटाले की बड़ी चर्चा रही है। पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने भी डीएमएफ का मुद्दा खूब उठाया है। उनके अलावा कुछ व्हिसलब्लोअर ने भी इस घोटाले की शिकायत ऊपर तक पहुंचाई है।
नियम है कि डीएमएफ की राशि उसी जिले में खर्च की जाती है, लेकिन यहां रहे कलेक्टरों ने इस राशि की बंदरबांट कर ली। ऐसे ही एक कलेक्टर की शिकायत ऊपर तक पहुंची तो उसकी जांच बैठा दी गई। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि कलेक्टर की जांच विभाग के डिप्टी डायरेक्टर को सौंप दी। अब साहब के आगे डिप्टी डायरेक्टर भला क्या ही जांच करेंगे।
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