जंगल काटो, पट्टा पाओ की चर्चा से मचा हड़कंप, अबूझमाड़ पर मंडराया बड़ा खतरा
बस्तर को 31 मार्च 2026 को वामपंथी उग्रवाद मुक्त घोषित किए जाने के बाद अबूझमाड़ के जंगलों को लेकर एक गंभीर चेतावनी सामने आई है। दावा किया गया है कि नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में वन अधिकार अधिनियम को लेकर फैली एक कथित अफवाह के कारण बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं। स्थिति इतनी चिंताजनक बताई जा रही है कि प्रतिदिन 50 से 70 हेक्टेयर तक वन क्षेत्र काटे जा रहे हैं। वहीं वन विभाग के अधिकारियों ने इस मामले में हाथ खड़े कर दिए हैं।
आरटीआई एक्टिविस्ट नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सड़क निर्माण, वन भूमि को कृषि भूमि में बदलने, पेंदा (झूम) खेती के नाम पर जंगल साफ करने और इमारती लकड़ी की तस्करी के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही है।
कई जगहों पर जेसीबी, डोजर और अन्य भारी मशीनों से प्राकृतिक वन तेजी से साफ किए जा रहे हैं। सिंघवी का कहना है कि स्थानीय लोगों के बीच यह बात फैलाई जा रही है कि यदि 31 मार्च 2026 से एक वर्ष के भीतर जंगल काटकर उस पर कब्जा कर खेती शुरू कर दी जाए तो वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत उस भूमि का पट्टा मिल सकता है। इसी कथित अफवाह के कारण लोग तेजी से जंगल साफ कर रहे हैं और खेती योग्य जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
अफवाह और सच
जानकारों के मुताबिक वन अधिकार अधिनियम के तहत अनुसूचित जनजातियों को अधिकार प्राप्त करने के लिए 13 दिसंबर 2005 या उससे पहले का कब्जा साबित करना जरूरी है, जबकि अन्य पारंपरिक वन निवासियों को तीन पीढ़ियों यानी लगभग 75 वर्षों से वन पर निर्भरता और निवास का प्रमाण देना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में सेटेलाइट इमेजरी और रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि किसी भूमि पर वास्तविक कब्जा कब से है। ऐसे में आज जंगल काटकर नया कब्जा करने से किसी को भी वन अधिकार अधिनियम के तहत वैधानिक लाभ नहीं मिल सकता।6 हजार वर्ग किलोमीटर का जंगल
अबूझमाड़ लगभग 6000 वर्ग किलोमीटर में फैला मध्य भारत का सबसे बड़ा सतत वन क्षेत्र माना जाता है। यह देश के उन चुनिंदा विशाल प्राकृतिक वनों में शामिल है जो बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी कारण पर्यावरणविद इसे भारत के फेफड़े जैसी संज्ञा देते हैं। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु जंगली भैंसा, बाघ, तेंदुआ, भालू और कई दुर्लभ वन्यजीवों का महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास भी है।
डीम्ड फॉरेस्ट, फिर भी कट रहे पेड़
सिंघवी ने अपने पत्र में कहा है कि अबूझमाड़ का आज तक पूर्ण भूमि सर्वेक्षण नहीं हुआ है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि कौन-सी भूमि राजस्व विभाग की है और कौन-सी वन विभाग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित टी.एन. गोदावर्मन मामले का हवाला देते हुए कहा कि प्राकृतिक रूप से वनाच्छादित क्षेत्र प्रथम दृष्टया डीम्ड फॉरेस्ट की श्रेणी में आते हैं। इस आधार पर अबूझमाड़ का विशाल हिस्सा भी डीम्ड फॉरेस्ट माना जा सकता है। इसके बावजूद भूमि की कानूनी स्थिति स्पष्ट हुए बिना सड़क निर्माण और अन्य अधोसंरचना परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में बड़े वृक्षों की कटाई की जा रही है। उनका कहना है कि विकास कार्यों का विरोध नहीं है, लेकिन सर्वेक्षण पूरा होने से पहले जंगलों का नुकसान भविष्य में पर्यावरणीय और कानूनी दोनों तरह के विवाद पैदा कर सकता है।
अधिकारी भी मानते हैं कार्रवाई मुश्किल
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने कथित तौर पर माना कि यदि एक मामले में कार्रवाई की जाती है तो ऐसे सैकड़ों या हजारों मामलों में कार्रवाई करनी पड़ सकती है, जिससे व्यापक असंतोष और सर्वेक्षण कार्य प्रभावित होने की आशंका है। वहीं वन विभाग के एक अधिकारी ने कथित रूप से स्वीकार किया कि कई इलाकों में रेंजर, डिप्टी रेंजर और वनरक्षक तक पदस्थ नहीं हैं जिसका कुछ लोग फायदा उठा रहे हैं।
हमारे नियम कायदे नहीं चलते
इस मामले में नारायणपुर के डीएफओ वेंकटेश का कहना है कि यह ऐसा इलाका है जिसका अभी तक सर्वे नहीं हुआ है। यह फारेस्ट में आता है या फिर राजस्व में, यह तय होना बाकी है। चूंकि यह हमारे क्षेत्र में नहीं आता है इसलिए हमारे नियम कायदे यहां नहीं चलते हैं।
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